Gulabkothari's Blog

जुलाई 17, 2011

बचेगा क्या?

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00
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केन्द्रीय सरकार जिस ताबड़-तोड़ ढंग से नए-नए कानून पास कर रही है और जिस तरह विदेशी कम्पनियों को अंधाधुंध तरीके से भारत में आने को प्रेरित कर रही है; उससे यह तो स्पष्ट ही है कि उसका ध्यान भारतीयों के हितों से दूर है। यह आश्चर्य ही कहा जाएगा कि देशवासियों द्वारा चुनी हुई सरकार देशवासियों के हितों के विपरीत कानून पास करे। सही अर्थो में तो इसे “वफादारी” नहीं कहा जा सकता। अभी जिस मुद्दे पर चर्चा चल रही है वह है भारतीय खुदरा बाजार में विदेशी कम्पनियों का, वालमार्ट जैसी, निवेश खोलने का।

क्या सरकार में बैठे हुक्मरानों को यह अनुमान है कि इस निर्णय के देश पर क्या दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे? लगता है उनको तो तत्कालीन स्वार्थ के आगे झांकने की आवश्यकता ही नहीं लगती। विदेशी कम्पनियां भारतीय व्यापारियों की लॉबी के जरिए सरकार पर दबाव बना रही हैं। मीडिया के लोगों को सैर सपाटे के लिए विदेश यात्राएं करवा रही हैं। फिर दोनों की चिन्ता करने की जरूरत कहां? एक ओर जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देश हैं जहां खुदरा व्यापार वहीं के नागरिकों के लिए सुरक्षित है। दूसरी ओर न्यूयार्क शहर जहां लाख कोशिश करके भी वालमार्ट प्रवेश नहीं कर पाया।

वालमार्ट तो सन् 1997 में जर्मनी में प्रवेश कर तो गया था, किन्तु सन् 2006 मे वापस भागना पड़ गया। जर्मन कानून के अनुसार कोई भी लागत मूल्य से कम दाम पर अपना माल नहीं बेच सकता। हमारे यहां तो नेता अफसर सब बिक जाते हैं। जर्मनी में सारे श्रमिक वहीं के होंगे, यह भी एक शर्त है। शाम 6.30 बजे जब देश के बाजार बन्द होते हैं, वालमार्ट भी बंद होगा। कहां दुकानें खुलेंगी, यह भी सरकार तय करेगी। फिर तो भागना ही था। हमारे देश का खुदरा व्यापार 16 लाख करोड़ रू. प्रति वर्ष का है। 2जी स्पेक्ट्रम का दस गुना।

इसमें ढाई करोड़ नागरिक एवं 12-13 करोड़ लोगों का जीवन यापन होता है। कृषि के बाद देश का दूसरा बड़ा रोजगार का क्षेत्र है। इनको अन्य कोई कार्य करना आता भी नहीं। इस क्षेत्र में विदेशी निवेश लोगों के जीवन से खिलवाड़ ही साबित होगा। कुछ अमरीकी व्यापारियों अथवा नीति निर्घारकों को प्रसन्न करने के लिए नए सिरे से लाल झण्डे का पोषण भी विचारणीय है। यह भी सरकारी भुलावा ही है कि किसानों को उचित मूल्य मिलेगा। हमारी सरकार में तो किसान आत्म हत्या कर रहा है और विदेशी व्यापारियों से दया की उम्मीद कर रहे हैं? जैसे-जैसे ये व्यापारी बड़े होते जाएंगे, किसानों पर दादागिरी बढ़ाते जाएंगे। आज तो हमारे ही जनप्रतिनिधि बड़े होकर जनता के साथ सामन्ती और संवेदनहीनता का व्यवहार कर ही रहे हैं। हर सरकार लोकतंत्र के नाम पर उनको आश्रय देती ही है।

एक और तथ्य समझना चाहिए। हमारे यहां 94 प्रतिशत सड़कें गांवों और शहरों में है। राष्ट्रीय राजमार्ग मात्र दो प्रतिशत। बिजली की कमी और कटौती के कारण भण्डारण सुचारू नहीं हो सकता। कोल्ड़ स्टोरेज के इस अभाव के कारण सफाई ठीक नहीं होगी। देश का परिवहन अधूरा भी है और महंगा भी। माल वाहन कार्य में रेलवे अगर आवश्यकता पूरी नहीं कर पाया। तब होगा क्या? हमें देखना चाहिए कि अन्य देशों में इन विदेशियों ने क्या किया। विश्व में जहां भी सबसे सस्ता माल मिले, ये वही लाकर हमारे यहां बेचेंगे। इनका उद्देश्य सस्ता खरीदकर 8-9 गुणा महंगा बेचना है।

स्थानीय उत्पादकों को भी बड़ा झटका लग जाएगा। देश के खुदरा व्यवसाय को अनेक संकटों से गुजरना होगा। बेरोजगारी तो निश्चित है ही। हमारा चर्म एवं वस्त्र उद्योग इसके जीवन्त उदाहरण हैं। हमारी जीवन शैली पूरी तरह तहस-नहस हो जाएगी। दीर्घकाल में राजनीति, समाज-संस्कृति और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे सामने आयेंगे, जिनकी हम आज कल्पना भी नहीं कर सकते। नई व्यवस्था में चन्द लोगों के साथ हमारे नीति-निर्घारकों की शामें भले ही रंगीन हो जायें, हमारा धन तो विदेशी ले ही उड़ेंगे।

जो अपने माल को इतना महंगा बेचने वाले हैं, वे मुद्रास्फीति को कम करने में मदद करेंगे, यह तो कपोल कल्पना ही है। इसके विपरीत, कुछ वर्षो बाद तो हमें इनकी मर्जी के भावों पर उत्पाद खरीदने को मजबूर होना पड़ेगा। यह एक नई तरह की महंगाई की मार होगी। इस दुर्दशा का श्रेय केन्द्र सरकार को जाएगा, जो इसमें केवल अच्छाइयां ही देख पा रही है। यथार्थ में तो देश गिरवी हो जाएगा।

गुलाब कोठारी

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