Gulabkothari's Blog

अगस्त 1, 2011

उघड़ता चेहरा

जिस प्रकार श्रीमती इन्दिरा गांधी ने आपातकाल लागू करके कांग्रेस को सदा-सदा के लिए मुक्त कर दिया, उसी प्रकार वर्तमान भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी एवं पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी पार्टी पदों को अपराधियों से प्रतिष्ठित देखा, मूक रहे, मुट्ठी भर लोगों के लिहाज में लोकतंत्र को नंगा होते देखने का गुनाह किया और कर रहे हैं। संघ की चाल, भाजपा का चलन लोकतंत्र के चेहरे का पर्दा बन गया।

आज यह कहना कतई सही नहीं होगा कि यह भाजपा कोई राजनीतिक दल भी है। पिछले सालों में केन्द्रीय समिति, संसदीय कार्य समिति या अन्य राष्ट्रीय बैठकों पर शोध किया जाए तो समझ में आ जाएगा कि इनमें कौनसे मुद्दे छाए रहे। केवल अपने भ्रष्टतम नेताओं, मुख्यमंत्रियों या पार्टी पदाधिकारियों के मुद्दे थे। पूरा सत्र बीत जाता है और मुद्दे ज्यों के त्यों।

संघ ने शीर्ष का अहंकार भोगा। भाजपा शीर्ष व्यापारी बन गई। भाजपा नेतृत्व को आज भाजपा के लोग ही भ्रष्टाचारी और कुशासक बता रहे हैं। गलत भी नहीं है। हास्यास्पद बात तो यह हुई कि किसी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री को भ्रष्ट बता दिया और भाजपा नेतृत्व ने इस आरोप को स्वीकार करके उनसे जबरन इस्तीफा भी मांग लिया। भाजपा शीर्ष ने यह भी नहीं पूछा कि येçaयूरप्पा ने लोकायुक्त को अपने बयान में क्या कहा। सच्चाई तो यह है कि माननीय न्यायाधीश ने प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से भी आरोपी का बयान लेने की जरूरत नहीं समझी।

उनकी नियुक्ति भाजपा ने थोड़े ही की थी जो उन्हें बचाने का प्रयास करते। अथवा राज्यपाल को भी लोकायुक्त (म.प्र.) नावलेकर की तरह गलत रिपोर्ट भेजकर मामले को नत्थी कर देते। इस निर्णय से भाजपा नेतृत्व ने स्वीकार कर लिया कि जो पकड़ा जाएगा, उसे चोर मान लिया जाएगा। नहीं तो सभी साहूकार ही हैं। भाजपा में अचानक ऎसा क्या हो गया कि जो अटलजी के समय तक ढका था, सब उघड़ गया? क्यों सारे राष्ट्रीय नेता बदनाम होकर भी शीर्ष पदों पर बैठे हैं? क्या भाजपा कांग्रेस की तरह कुछ लोगों की पार्टी बनकर रह जाएगी? आज तो जिनको भी इस नेतृत्व का आश्रय प्राप्त है, वे निरंकुश, भ्रष्ट, माफिया और हत्यारे तक भी हो गए।

सुरा-सुन्दरियों का मोह, भुज-बल और सत्ता की मदान्धता ने कांग्रेस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। कांग्रेस तो भाजपा से हजारों गुणा भ्रष्ट साबित हो चुकी है, किन्तु दस जनपथ के आगे सबकी आवाज बन्द रहती है। वहां के किसी निर्णय की सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं होती। भाजपा में कोई नेता है ही नहीं। बल्कि शीर्ष द्वारा पोषित हर नेता अपनी गली में भिण्डरावाला, बाल ठाकरे अथवा दाऊद जैसा दिखाई देता है। यही हाल इनके चहेते अधिकारियों के हैं। जहां किसी पर ये नाराज हुए कि भोपाल के मीनाल मॉल की तरह डायनामाइट से उड़ा देने का दु:साहस तक कर देते हैं। मुख्यमंत्री की मौन स्वीकृति तो रहती ही है। जैसे ही मुख्यमंत्री बदलता है, इनकी भाषा रातों-रात बदल जाती है।

मध्यप्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तो अपनी सीट देकर फरार चहेते को विधायक बना लाए। भाजपा नेतृत्व ऊपर तक मौन भी है और गौरवान्वित भी। मुख्यमंत्री अनदेखी करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। वे तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के आक्रामक रूख का प्रतिकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यही भाजपा की भितरघात का प्रमाण भी है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों ने भाजपा को सत्ता सौंपी और भाजपा ने आज तक कांग्रेस के विरूद्ध कोई मुकदमा दायर तक नहीं किया।

क्योंकि स्वयं यह सरकार भी उतनी ही बड़ी भ्रष्ट है। अब तो जनता को ही इनके खिलाफ जनहित याचिकाएं लगानी पड़ेंगी। शायद न्यायपालिका जनता का साथ दे। अभी तक तो उच्च न्यायालयों में भी सरकार के विरूद्ध बड़े निर्णय नहीं हुए, जिनमें भ्रष्ट मंत्रियों/अधिकारियों को सजा मिली हो या बर्खास्त किया गया हो। उच्चतम न्यायालय जरूर अपवाद बनता जा रहा है।

जिस दिन घड़ा भर जाएगा, स्वयं भाजपा शीर्ष मोहरा बदल देगा। आज तो सारी नियुक्तियों का आधार शीर्ष सेवा रह गया है। शीर्ष नेता निजी कार्यक्रमों में भी हवाई जहाजों में भर-भरकर भीड़ की तरह घण्टा-आधा-घण्टा रूकते हैं और चले जाते हैं। अगली बैठकों में इन्हीं मेजबानों को हटाने की चर्चा भी कर लेते हैं। बस चले जहां तक बचाते भी रहते हैं। ऎसे चहेते यदि चुनाव भी हार जाएं तो राज्यसभा के द्वार तो खुले ही हैं। पिछले 15-20 वर्षो में किन-किन को भाजपा ने राज्यसभा में भेजा और क्यों? उन्होने देशहित में किन-किन मुद्दों पर काम किया?

कर्नाटक की घटना इस बात का प्रमाण है कि जिस अंग्रेजी-दां कांग्रेस संस्कृति से मुक्त होने के लिए देश ने संघ को विकल्प माना था, वह जरासंघ हो गया। जनता, देश, लोकतंत्र सबको भूलकर स्वयं के भ्रष्ट लोगों की अमरबेल में उलझ गया है। कुल मिलाकर परिदृश्य यह बना कि दोनों ही दल अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि से बाहर निकल गए। जनसमस्याएं इनकी चर्चा का मूल विष्ाय ही नहीं रहा।

संसद का उच्च सदन अधिकांशत: गैर राजनीतिक, व्यापारिक अथवा चुनाव में हारे हुए सेवानिवृत्ति योग्य नेताओं का जमघट बनने लग गया। जिसमें राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सोच एवं प्रतिबद्धता का अभाव टी.वी. पर जनसाधारण को भी दिखाई देता है। तब क्या इन दलों को हमारे लोकतंत्र के राजनीतिक दलों की परिभाषा में जोड़ना उचित होगा?

गुलाब कोठारी

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