Gulabkothari's Blog

अगस्त 5, 2011

अंग्रेजी बनाम अंग्रेजियत

इस देश पर अनेक सांस्कृतिक आक्रमण हुए, साम्राज्य कायम रहे फिर भी देश की अखण्डता अक्षुण्ण रही। पहली बार अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए देश में क्रान्ति का वातावरण बना और सफलता भी मिली। आजादी के संग्राम में अंगे्रजों को तो विदा कर दिया, किन्तु अंग्रेजियत को यहीं रोक लिया गया। बस आज तक यह देश इस अंग्रेजी-सभ्यता की मार खा रहा है। अंग्रेजी शासन में अंग्रेजी भाषा माध्यम के रूप में काम आती थी। आज अंग्रेजी जीवन-शैली ने हमारे नागरिकों को अपने ही देश में विदेशी बना दिया और उनको बाहर निकाल पाना संभव भी नहीं है।

 

इसके विपरीत आज तो अंग्रेजी का प्रभाव अमरीकी डालर से भी तेज गति से बढ़ रहा है। पूरे विश्व में इण्टरनेट संवाद का माध्यम अंग्रेजी भाषा बन गई है। विश्व की प्रत्येक भाषा और संस्कृति के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा जान पड़ रहा है। कौन कह सकेगा कि दो-तीन पीढ़ी बाद अन्य भाषाओं और संस्कृतियों का क्या हाल होगा! भाषा के रूप में अंग्रेजी से किसी अन्य भाषा को खतरा नहीं रहा, किन्तु आधुनिक शिक्षा से जुड़कर अंग्रेजी ने जो ताण्डव करना शुरू किया, जीवन के प्रति सोच की दिशा ही बदल गई। हर घर की नई पीढ़ी अपने दादा-दादी की संस्कृति से स्वत: ही अलग हो गई और किसी को कानों-कान खबर नहीं।

 

आजादी के बाद भी लगभग 20-25 वर्ष तक देश के संविधान, कानूनों की व्याख्या और निर्माण अंग्रेजी से ही प्रभावित रहे। वही नींव का निर्माण काल था। जिसका प्रभाव आज तक यह देश भुगत रहा है। उच्च शिक्षा, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर तो अभी तक अंग्रेजी ही हावी है। पिछले साठ वर्षो में यह तबका शेष भारत से वैचारिक रूप से कट गया। इस तबके ने मूलत: अंग्रेजी ही पढ़ी। साहित्य भी, व्यवसाय भी और जीवन शैली भी। जो कुछ परिवर्तन पश्चिम में होते रहे, उनसे नियमित संपर्क में भी रहे और प्रभावित भी होते रहे। इन्हीं लोगों ने नए भारत की नीतियां भी बनाई। इन नीतियों में आज तक विदेशी संस्कृति की प्राथमिकता देखी जा सकती है। व्यक्तिगत जीवन के कानूनों में भी।

 

शिक्षा को धर्म निरपेक्षता के नाम पर मानवीय मूल्यों से ही विहीन कर दिया। धीरे-धीरे क्षेत्रियता को भी बाहर कर दिया- वैश्वीकरण के नाम पर। स्थानीय इतिहास-भूगोल-संस्कृति-सामाजिक मूल्य आदि सभी गायब हो गए। शिक्षा से मानवता का रिश्ता टूट कर विषयों तक सीमित रह गया। मानव मशीन बनने लगा। अंग्रेजी माध्यम ने इन मशीनों पर ‘हॉलमार्क’ का काम किया। अब बड़े होकर ये बच्चे अपनी दादी-नानी से संवाद करने मे अक्षम दिखाई पड़ते हैं। उनके ज्ञान की खिल्ली भी उड़ा देते हैं। भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के समकक्ष मानते ही नहीं हैं। आज तो अपने बच्चों को भारत में रहने तक को प्रेरित नहीं करते हैं। धन की इनके पास कमी है नहीं।

 

इसका दूसरा पहलू बहुत भयंकर साबित हुआ। इस देश का अंग्रेजी मीडिया इस अंग्रेजीदां तबके का अभिन्न अंग बन गया। शेष भारत से इसका भी सम्पर्क टूट गया। अंग्रेजी मीडिया में देश दिखाई नहीं पड़ता। भिन्न-भिन्न भाषाओं और संस्कृतियो से सजे धजे इस देश को अंग्रेजी एवं अंग्रेजीदां लोगों ने खूब मारा। किसी भी भाषाई प्रदेश का चित्रण दिल्ली के अखबारों में नहीं होता था। सन् 1970 तक जब केवल अखबार ही एकमात्र प्रतिनिघि था मीडिया का। भाषाई अखबारों का दिल्ली तक प्रभाव था ही नहीं। राज्य सरकारें अंग्रेजी दैनिकों के जरिए अपनी बात पहुंचाती थीं। तब इनका अंग्रेजी पत्रों के साथ घनिष्ठ सम्बंध बन गया। अत: जो कानून बने वे अंग्रेजी पत्रों से अघिक प्रभावित होकर बने।

 

इनमें से अघिकांश तो आज भी देश में प्रभावी नहीं हैं।  कर्नाटक या पश्चिम बंगाल में क्या हो रहा है यह दिल्ली सरकार तक कितना पहुंचे मीडिया के जरिए यह प्रदेश की सरकारें और अंग्रेजी अखबार ही तय करते थे। राज्य सरकारें इस कार्य की कीमत निरन्तर चुकाती रहती थीं। आज भी अंग्रेजी अखबारों की सरकारी विज्ञापनों की दरें अन्य भाषाओं की तुलना में कई गुना अघिक हैं। क्यों हैं? कोई खुद को जवाबदेह नहीं मानता।

 

हर राज्य की सरकार ने गुपचुप तरीकों से अंग्रेजी अखबारों से ही सम्पर्क बनाकर रखा। दिल्ली तक अपनी बात पहुंचाने का एक ही जरिया था। स्थानीय भाषाई पत्रों की आवाज वहां तक पहुंच ही नहीं सकती थीं। टीवी तब तक देश में आया ही नहीं था। मात्र एक अंग्रेजी ने ही इस देश में दिल्ली को अन्य प्रदेशों से जोड़कर रखा। अत: राज्यों एवं केन्द्र के बीच नीति-निर्घारण में सेतु का कार्य किया। सम्पूर्ण देश मूलत: एक ही दल कांग्रेस के हाथ में था। अंग्रेजी ही लोकतंत्र के इन स्तंभों को जोड़े हुए थी। उस काल के अघिकांश कानून भारतीयता के विपरीत चिन्तन वाले ही बन पाए। हमारे संविधान को भारतीय जामा इन लोगों ने पहनने ही नहीं दिया। समय के साथ ये सारे अंग्रेजी सोच वाले इस देश के साथ अपनी संवेदना भी खोते चले गए। अनपढ़ा/ अल्पशिक्षित जन प्रतिनिघि भी इनके हाथ की कठपुतली बनकर रह गया। आज वह भी इनसे बाहर जीने का साहस नहीं जुटा पाता।

 

राडिया जैसे प्रकरण टू-जी घोटाला या खेल घोटाला इन्हीं के दिमाग की उपज है। इनमें कोई देशवासी का अभिन्न अंग नहीं जान पड़ता। न उनके लिए काम ही करता है। हां, करता सब उन्हीं के नाम पर है। हर साल बीपीएल की संख्या बढ़ाने का श्रेय अंग्रेजी को ही जाता है। विकास के नाम पर विनाश, कर्ज की रणनीति, अफसरों का पालन-पोषण, पेंशन आदि का आकलन करें तो इनकी भारत विरोधी और अंग्रेजियत की समर्थक दृष्टि दिखाई पड़ जाएगी।

 

अंग्रेजी मीडिया भी इन्हीं अंग्रेजीदां लोगों के हाथ में है। इनकी सांस्कृतिक विरासत भी पश्चिमी जीवन शैली है। हमारे शास्त्रों ने भारत को कर्मभूमि का दर्जा दिया है और पश्चिम को भोग भूमि का। कहने में तो यह बात दकियानूसी लगती है, किन्तु यदि वहां जाकर व्यवहार में देखा जाए तो उनका भौतिकता के प्रति लगाव एक पक्षीय जीवन का आधार दिखाई पड़ जाएगा। यही आधार यहां अंग्रेजी के माध्यम से फैला है और फैलता जा रहा है। भ्रष्टाचार का मूल सूत्र धन-जन (भुज) बल ही तो है। अंग्रेजी मीडिया ने इस संस्कृति को हवा दी।

 

अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए राष्ट्रभाषा अभियान पर सदा उदासीन ही रहे। राजनेताओं का स्वार्थ भी इसी से सिद्ध होता था। अत: स्थानीय भाषाई मीडिया सशक्त होने के बाद भी केन्द्र राज्य सम्बन्धों में प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाया। सरकारें बदलने में तो प्रभावी रहे, किन्तु अंग्रेजीदां अघिकारियों की मानसिकता नहीं बदल पाए। ये स्वयं विदेशी सपने देखते रहते हैं। इनकी बनाई नीतियों के कारण ही आज देश का यह हाल हुआ। राजनेता और मीडिया भी इनकी चपेट में आ गए। शनै: शनै: सबका व्यापारिक स्वरूप हो गया। लोकतंत्र को भी व्यापार बना दिया। आज सरकार का हर एक संस्थान व्यापारिक ढंग से कार्य कर रहा है। पैसा दो, काम करवा लो। सरकारें सेवा नहीं करतीं। जनता के धन से, जनता के नाम पर, जनता के साथ ही व्यापार करती हैं। यही नया लोकतंत्र है।

 

इसका एक ही अर्थ है। जो हालात और नई जीवन शैली उभरकर आ रही है, वह किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर पाएगी। इसके विपरीत अंग्रेजी मानसिकता के लोग सत्ता में बैठकर भारतीयता का दोहन करेंगे। मीडिया भी व्यापार बनकर रह जाएगा। जनता एक तरफ और चारों पाए एक तरफ। आश्चर्य होगा यदि हम अगली (बाईसवीं) सदी में कहीं भारतीय संस्कृति के अवशेष पर्यटकों के लिए भी बचा पाएं! जनता भी बिना कुछ किए सुख के सपने देखने लगी है, पर भूल रही है कि पराधीन सपनेहुं सुख नाहिं। अंग्रेजों के चले जाने से गुलामी नहीं गई। वह तो आज भी देश में राज कर रही है।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

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