Gulabkothari's Blog

अगस्त 7, 2011

वर्तमान

मुझे नहीं मालूम कि मैं अतीत से आता हुआ अनागत में जा रहा हूं अथवा अनागत से वर्तमान में आता हुआ इतिहास बनता जा रहा हूं। वर्तमान क्या है, किसका नाम है, क्या उसका स्वरूप है, नहीं जानता। इतिहास काल हजारों-लाखों वर्षो का है। भविष्य में भी अनन्त काल गणना है। वर्तमान तो बस पलक झपकना मात्र है। क्षण है। पिछले सभी क्षण इतिहास बन चुके। अब नहीं लौटेंगे।

 

जीवन को उतना छोटा कर गए। किसी ने सही कहा है कि इतिहास एक कब्रिस्तान है, जिसमें अतीत दफन रहता है। जो भी था, बस था। है नहीं, और होगा भी नहीं। कैसे समझा जाए कि कहां इतिहास है और कहां वर्तमान शुरू होता है। कहां वर्तमान समाप्त होकर भविष्य वर्तमान बनता है। कैसे पकड़ा जाए क्षणों की इस संघि को! शास्त्र कहते हैं वर्तमान में जीओ। आप आज जो कुछ हो, पिछले किए कर्मो के कारण हो। आज जो करोगे, वैसा ही तुम्हारा भविष्य होगा। भविष्य पर अलग से कोई नियंत्रण संभव नहीं है। प्रारब्ध भी रहता है भविष्य में। ग्रहों का प्रभाव भी, प्रकृति के आवरण भी। इन सबके साथ वर्तमान कर्मो के फल भी। कैसा वर्तमान?

 

क्या शाम को हम वही होते हैं, जो सुबह थे? संभव ही नहीं। शरीर के सारे रसायन बदल चुके। विचारों के विषय बदल गए। भावनाओं में कई उतार-चढ़ाव आ गए। अनेक प्राणी नए मिले और अपना प्रभाव छोड़ गए। कई छूट गए। इतिहास बन गए। शाम को सोचने पर लगता है, सारा दिन तो इतिहास बन गया। सुबह यही संध्या भविष्य में थी। दिनभर में जो कुछ किया, खाया-पीया, गाया सब कुछ तो इतिहास बन चुका। क्या निर्माण किया भविष्य का, दिनभर में? क्या खोया, क्या पाया? क्या मुझे याद है कि किस प्रकार मेरा वर्तमान इतिहास बनता जा रहा था। सारा कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ है।

 

क्या मुझे खाने का स्वाद याद है। किसने बनाया था, कहां से आया था, क्या मुझे इस बात का ध्यान था। क्या मुझे याद है कि मैंने कोई सब्जी थाली से बाहर निकाल दी थी और क्यों? क्या शरीर में खाने के साथ कुछ स्पन्दन भी थे? क्या मन कहीं और था, दिमाग में अनेक प्रश्A चल रहे थे। कहीं जाने की, किसी से मिलने की उतावल थी। मुझे पता भी नहीं चला क्या खाया, किसने बनाया होगा। मैं थाली पर नहीं था। वर्तमान के बजाए भविष्य में डूबा हुआ था। पता ही नहीं चला वर्तमान कब बीत गया।

 

सुबह मां कह रही थीं उनके आज कोई व्रत है। हम दोनों को भी मन्दिर में जाकर पूजा करनी है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ करके आना है। मुझे आज तक यह बात समझ में नहीं आ पाई कि हम इक्कीसवीं सदी में पांच हजार साल पुराने रिवाज क्यों पाले हैं। हर बड़े धर्म के प्रवर्तक हजारों साल पहले पैदा हुए। गीता के कृष्ण पंाच हजार वर्ष पूर्व द्वापर में हुए। उनके उपदेशों पर आज अमल करना क्या वर्तमान में जीना है? हर संत यही प्रयास करता है कि हम वही चर्या अपनाएं, जो हजारों वर्ष पहले उनके प्रवर्तक ने प्रचारित की थी। वही पाठ, वही प्रार्थनाएं, वही अनुष्ठान! क्या भविष्य में भी हम यही जीवन शैली चाहते हंै, जैसी कि आज है? यदि कुछ नया चाहते हैं, तो नया करना भी पड़ेगा। मैं पंाच हजार वर्ष पूर्व के जीवन से आज कैसे जुड़ सकता हूं। वह मेरा इतिहास है। मुझे वर्तमान में जीना है।

 

मेरा वर्तमान वैसा नहीं हो सकता जैसा त्रेता या द्वापर में था। मेरे सामने जीवन की चुनौतियां हैं। स्पर्द्धा है, कैरियर है, विज्ञान का धरातल है, वैश्वीकरण है। उपभोग की आजादी है। नारी भी स्वतंत्र है। उसे भी कंधे से कंधा मिलाकर जीना है। आज वह भोग की वस्तु नहीं रह गई।

 

मेरा कैरियर मुझे स्थायी रूप से एक स्थान पर रहने नहीं देगा। कई शहर, देश, धर्म, समाज के बीच रहता चलूंगा। हां, अनभिज्ञ रहूंगा, उन लोगों की जीवन शैली से भी, क्यों नहीं आता मुझे वर्तमान में जीना। मैं और मेरा परिवार ; यही होगा मेरा संसार। कानून भी सामाजिक नहीं, व्यक्तिगत होंगे। मैं स्वयं अपना मालिक। यही अहंकार का पर्दा चट कर जाता है मेरे वर्तमान को। यह मुझे स्वीकार करने नहीं देता कालचक्र को। काल की गति को। मैं नहीं मानता स्वयं को प्रकृति का अंग या ईश्वर का अंश। मैंने नहीं पढ़ा कि पृथ्वी-जल-अगिA-वायु-आकाश चलाते हैं मेरे शरीर को। मैंने नहीं देखा बुद्धि को, मन को, आत्मा को। जानता हूं बस शरीर को।

 

मैंने पढ़ा है कि शरीर ही सारी उपलब्घियों का साधन है। पहला सुख निरोगी काया को ही माना है। विश्व की सर्वश्रेष्ठ काया भी मानव देह को ही माना है। मुझे क्या आवश्यकता वर्तमान को जानने की। कैरियर मेरा भविष्य है। मेरे स्वयं के हाथ में है। जो गया, सो गया ; जो आएगा, आ जाएगा।

 

इस देश में एक और अवधारणा भी है। कुछ कर्मो के फल सैंकड़ों वर्ष बाद भी आते हैं। उनको भी हमें भोगने के लिए वहां रहना पड़ता है। किसी न किसी देह में। तब क्या करेंगे हम? क्या बाहर हो सकते हैं प्रकृति के इस काल चक्र से? क्या पता हम त्रेता में रहे हों, द्वापर में रहे हों और अपने कर्म फलों को भोगने के लिए कलियुग में पैदा हो गए हों। तब प्रश्A यह भी उठता है कि भूत, भविष्य और वर्तमान की अवधारणा प्रकृति में भी हैं क्या? या मात्र काल की निरन्तरता है। तब वर्तमान में जीने का क्या अर्थ है? काल को, कर्म को जीवन में कैसे जोड़कर देखा जाना चाहिए। इसके लिए तो फिर उसी वर्तमान की अवधारणा पर आना पड़ेगा। आकलन के लिए कोई आधार तो होना चाहिए।

 

मेरे साथ क्या हो रहा है वर्तमान में? मैं कुछ नहीं करूं तब भी कुछ हो रहा है। मां आई, खाने का पूछकर चली गई। छत से चूने का प्लास्टर गिरा, पांव में लग गई। बेटे ने आकर बताया साइकिल किसी से भिड़ गई। मरम्मत के लिए पैसे चाहिए। मित्र ने आकर कुछ उधार मांगने की बात कर डाली। मैं कुछ नहीं कर रहा हूं। मेरा वर्तमान फिर भी व्यस्त है। क्या भविष्य बनेगा इसमें से। बिना कुछ किए भाग्य कभी नहीं बनता। पहले के किए कर्मो के फल आ रहे हैं। प्रारब्ध बनकर। अभी कुछ और भी संचित हैं। आगे फल देंगे। जो कर चुके उसके परिणाम हैं।

 

सही बात यदि समझने की है, तो वह है परिणाम या फल। व्यक्ति इन्हीं को तो ध्यान में रखकर कर्म करता है। जब तक फल नहीं आ जाता, कर्म समाप्त नहीं होता। व्यक्ति यह भी नहीं जानता कि फल कब आएगा। मृत्यु के बाद भी कई कर्म जारी रहते हैं। कई जन्मों के बाद भी फल प्राप्त होते रहते हैं। तब काल की इस परिभाषा को कैसे समझा जाए। कैसे कर्म और काल का समन्वय किया जाए।

 

भारतीय दर्शन व्यक्ति को कर्म के माध्यम से कालातीत होने का मार्ग दिखाता है। कर्म से फल छोड़ दे, उसे ईश्वर के हवाले कर दे। कर्म से ही कामना का आधार भी निकाल दे। निष्काम भाव से कर्म करता रहे। लगता है बहुत कठिन कार्य है। असंभव भी लग सकता है। कामना नहीं तो व्यक्ति कर्म क्यों करेगा। कर्म में कैसे प्रेरित होगा? कर्म करेगा तो फल क्यों नहीं चाहेगा? युग की दृष्टि से दोनों ही प्रश्A महत्वपूर्ण हैं। उत्तर है वर्तमान, यानी वह क्षण जिसे वर्तमान कहा जा रहा है। क्या मैं उस क्षण को देख सकता हूं? इसके लिए स्थितप्रज्ञ होना ही पड़ेगा। इन क्षणों की संघि को पकड़ने के लिए ही त्रिकाल संध्या की जाती है। वर्तमान का यह क्षण ही व्यक्ति को कालातीत करने में सहायक है। वर्तमान पर दृष्टि कर्म से हटकर कारण पर ले जाती है। प्रज्ञा बन जाती है।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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