Gulabkothari's Blog

अगस्त 14, 2011

रूपान्तरण

भौतिकवाद, भोगवाद और स्वच्छन्दता की मार से व्यक्ति आज बेचैन हो उठा है। लगता है उसका दम घुट जाएगा। विश्वभर में आज शान्ति सम्मेलनों की बाढ़-सी आ गई है तथा परिणाम ठीक विपरीत दिखाई पड़ते हैं। चारों ओर आतंकवाद और साम्प्रदायिक कट्टरवाद की ऊंची उठती लपटें। क्यों? हर सम्मेलन में लगभग सभी धर्मो के शीर्ष पुरूष भी होते हैं और बुद्धिजीवी भी।

 

दोनों के ही वहां होने के अपने-अपने कारण होते हैं। ऎसे बड़े सम्मेलनों में भाग लेने का एक सीधा लाभ तो शैक्षणिक योग्यता के क्षेत्र में छवि बढ़ना ही है। अपने प्रवास में आप इनकी गतिविघियों को देखेंगे तो समझ में आ जाएगा कि विश्व शान्ति के बारे में बोलना तो चाहते हैं, किन्तु उसके प्रति चिन्तित नहीं है। अघिकांश चर्चा का आधार अहंकार के तुष्टिकरण का ही रहता है। तर्क, बहस, उद्धरण आदि बौद्धिक धरातल के विषयों की बाढ़ देखने को मिलेगी।

 

बुद्धि शान्ति का धरातल नहीं होती। वह तो टकराव का धरातल है। वहां मिठास नहीं होता। वाणी में रस होता ही नहीं। तब शान्ति का सन्देश किसी के मन को छूता ही नहीं। शान्ति, प्रेम, भाईचारा सब तो मन में रहते हैं। यदि हमें शान्ति एवं प्रेम के प्रयास करने हैं तो पहले मन के धरातल को खोलना पड़ेगा। यह भी समझना पड़ेगा कि मन क्यों अशान्त होता है। अनेक कारण होंगे। इन सबको श्रेणीबद्ध करना पड़ेगा। मन और बुद्धि पर पड़े आवरणों के बीच से यथार्थ को जानने का प्रयास करना पड़ेगा।

 

मन चंचल है। इन्द्रियों का राजा है। हर इन्द्रिय के अपने विषय होते हैं। भौतिक सुखों के लिए अर्थ प्रधान जीवन ने मनुष्य को धन से ही छोटा कर दिया। व्यक्ति शरीर जीवी बन गया। जैविक सन्तान बन गया। केवल मानव देह पा लेना काफी नहीं। भीतर भी मानव का होना जीवन की अनिवार्यता है। शान्ति उसी मानव की जरूरत है। उसके अभाव में सभी शरीर पशु-भाव का आश्रय बनने लग गए। वे ही जाते हैं शान्ति सम्मेलनों में। उनकी आवश्यकता होती ही नहीं है। तब शान्ति किसके लिए आएगी?

 

शान्ति के प्रयासों में रूपान्तरण करने की आवश्यकता होती है। शरीर और बुद्धि मात्र से यह कार्य नहीं किया जा सकता। मन के धरातल पर होने वाले इस कार्य में भावना एवं दृढ़ संकल्प पहली आवश्यकता है। प्रतिभागियों में बुद्धि का अहंकार इतना अघिक होता है कि वे या तो दूसरे की बात पर चिन्तन ही नहीं करना चाहते या अपनी ही बात पर अडे रहना चाहते हैं। कुछ वक्ता अपने पवित्र शास्त्रों के उद्धरणों को ही विश्व शांति का संदेश मानकर प्रस्तुत करते हैं।

 

रूपान्तरण के लिए एक निश्चित वातावरण चाहिए। आप यूं भी कह सकते हैं कि व्यक्ति के चारों ओर जिस प्रकार का वातावरण होता है, धीरे-धीरे वह उसी दिशा में रूपान्तरित हो जाता है। हर सम्प्रदाय को उसके शीर्ष पुरूष ने वातावरण के अनुसार ही स्वरूप प्रदान किया। कोई सम्प्रदाय संस्कृति या जीवन शैली के बाहर कैसे टिका रह सकता है। आज अशान्त वातावारण का एक कारण यह भी है कि अनेक सम्प्रदाय उपलब्ध वातावरण को स्वीकार नहीं करना चाहते। वे आज भी पुरातन नियमों के आधार पर समाज को खड़ा रखना चाहते हैं। यह स्थिति टकराव का मार्ग प्रशस्त करती है। इसी में से कट्टरवाद पैदा होता है। अन्य समुदायों अथवा देशों की जीवन शैली का सम्मान नहीं होता। मानव समाज में ही मानवता के शत्रु पैदा हो जाते हैं। विश्व पटल पर देवासुर संग्राम का ताण्डव बना ही रहता है।

 

शान्ति सम्मेलनों में अशान्ति के एक नहीं, अनेक कारणों पर चर्चा होती है। गरीबी, असमानता, अशिक्षा, भेदपूर्ण व्यवहार, युद्ध, अर्थ-शास्त्र का नेतृत्व आदि। फिर भी इनके मूल में तो मानव संस्कृति ही है। ये कारण तो हर युग में रहे हैं और आगे भी रहेंगे। इसमें बहुत कुछ योगदान प्रकृति एवं प्रारब्ध का भी है। बहुत कुछ प्रभाव कर्म क्षेत्र एवं भोग क्षेत्रों का भी रहता है। जिस प्रकार कर्म योनि (मनुष्य) एवं भोग योनि का अन्तर रहता है, चूंकि आज शिक्षा में और हर देश की जीवन शैली में भौतिकवाद प्रमुख हो गया है तथा मानवीय दृष्टिकोण पीछे छूटता जा रहा है, वहां मन की विकलता बढ़ रही है। अर्थ युग का जीवन कामना प्रधान हो गया। धर्म का अंकुश हट गया।

 

मर्यादाहीन जीवन ही मानव को पशु-श्रेणी में ले जाता है। जीवन शैली तथा समय के अनुरूप मर्यादाएं व्यक्ति को संयम पथ पर बनाए रखती हैं। उसी का एक अंग है-दूसरों का ध्यान रखना, उनका आदर करना, उनकी सहायता करना। जो आपको अपने लिए सही लगे वही व्यवहार दूसरों के साथ भी करना। जहां इस तरह का वातावरण है, मानवता प्रधान संस्कृति है, वहां आज भी शान्ति है। एक जैसा सोच रखने वाले समाज एवं प्रदेश में शान्ति ही रहती है। नेतृत्व भी यदि संयमी और चरित्रवान है, तब भी शान्ति को उपलब्ध हुआ जा सकता है।

 

किन्तु जहां अहंकार दूसरों को बराबर सम्मान के लायक नहीं मानता अथवा अपमान करने पर उतारू रहता है, वहां शान्ति कैसे संभव है? ऎसे हाल तो एक छोटे से परिवार को भी अशान्त कर देते हैं। शिक्षा से मानव के विषयों का, मूल्य परक जीवन शैली का बाहर हो जाना ही मानवता से दृष्टि को हटा देता है। तब किसी मानव के प्रति दया-करूणा-प्रेम जैसे भाव पैदा ही कैसे होंगे। हम स्वयं के जीवन-कैरियर-परिवार में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि पड़ौसी के बारे में भी नहीं सोच पाते। विश्व शान्ति जैसे विषयों पर तो हमारा चिन्तन मूलत: यांत्रिक ही रहता है। हम मंच से वैसे ही बोलते हैं जैसे कक्षा में कोई प्रोफेसर पढ़ाता है। उसे विषय पर केद्रित रहना होता है, आदमी पर नहीं। अन्त में घड़ी देखकर कक्षा से चला जाता है।

 

शान्ति मूल रूप से तृप्ति का विषय है। तृप्ति कामनाओं की पूर्ति से भी जुड़ी है। जीवन के यथार्थ में कामना का स्वरूप समझ में आ जाने के बाद ही कामनाओं में ठहराव आने लगता है। इसमें ज्ञान-ज्ञाता-ज्ञेय तीनों की भूमिका स्पष्ट रहती है। बिना तृप्ति के तृष्णा-ईष्र्या-लोभ जैसी वृत्तियां घेरे रहती हैं। अघिकांश वक्ता भी इनसे पार नहीं होते। तब वक्ता की अपनी कामनाएं उसके कथ्य पर आवरण डाले रहती हैं।

 

भले ही उसको इसकी अनुभूति हो या न हो। वह यदि ध्यान से श्रोताओं पर दृष्टिपात करेगा तो देख लेगा कि कौन-कौन उसे सुन रहे हैं। जब वह स्वयं अपने लक्ष्य को ध्यान में रख कर, सोच-विचार करके बोल रहा है, और साथ ही कुछ अपेक्षा भी रखता है, तब तो उसकी बात किसी के मन को छू ही नहीं सकती। वह भी श्रोता के बुद्धि पटल से टकराकर लौट आएगी। तब उसका ह्वदय परिवर्तन कहां हुआ? वक्ता का शान्ति का सन्देश किसी को प्रभावित ही नहीं कर पाया।

 

तब कैसे सफल हो सकते हैं इस तरह के सम्मेलन। वक्ता का श्रोता से जुड़ाव होना बड़ी जरूरत है। यदि वक्ता अपरिचित की तरह पेपर पढ़ कर चला जाएगा, तब कैसे जुड़ पाएगा श्रोता से? वक्ता को आधा घण्टा मिले बोलने का तथा दो घण्टे तक श्रोताओं से संवाद किया जाए। प्रश्नोत्तर हों। विषय के साथ श्रोताओं का जुड़ाव, भागीदारी, अनुभवों का आदान-प्रदान सभी आवश्यक है। वक्ता के लिए यह भी जरूरी है कि वह हर श्रोता को विशेषज्ञ मानकर उसकी बात का पूरा सम्मान करे। नहीं तो उसके बाद वह प्रश्न करने खड़ा ही नहीं होगा। श्रोताओं के अनुभव से वक्ता वंचित रह जाता है। आप प्रत्येक सम्मेलन में स्वयं वक्ता को ही सबसे अशान्त देख सकते हैं।

 

वैसे शान्ति का विषय तर्क-वितर्क से अघिक आत्मसात करने का है। ध्यान करने का है। स्वाध्याय में उन कारणों पर चिन्तन करने का है जो शान्ति में बाधक दिखाई देते हैं। उन्हें समझकर उनका निवारण किया जाना चाहिए। इसके लिए बाहर तथा भीतर दोनों तरफ साथ-साथ काम होना चाहिए। किसी भी सम्मेलन में भीतरी रूपान्तरण को अघिक महत्व नहीं दिया जाता। व्यक्ति तीन चौथाई भीतर जीता है, एक चौथाई बाहर।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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