Gulabkothari's Blog

अगस्त 21, 2011

क्रन्दन

जीवन द्वैत पर टिका है, युगल तžव पर टिका है। एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह। यथार्थ में सिक्का तो एक ही है। चूंकि हमारे मन की गतियां दोनों ओर रहती हैं- ऊध्र्वगामी एवं अधोगामी, अत: प्रत्येक भाव भी दो रूप में दिखाई देता है। इन्हीं का एक आयाम है हंसना और रोना। मूल में दोनों भिन्न नहीं है। किसी अवसर पर जब हमें जोर का रोना आ रहा हो और हम उसे रोकने का प्रयास करें, तो मुंह से जोर से हंसी छूट जाती है। इसी प्रकार प्रेम और क्रोध को भी आगे पीछे देख सकते हो। प्रत्येक भावना वासना रूप भी देखी जा सकती है।

 

सृष्टि आनन्द से शुरू होती है। आनन्द भाव की गति का विस्तार सृष्टि का निमित्त है। तब क्रन्दन या रोना भी कहीं न कहीं सृष्टि क्रम से जुड़ा होगा। जो सृष्टि आनन्द से निकले, तथा बच्चा एक क्रन्दन के साथ पैदा हो, कुछ तो समन्वय होगा ही। आनन्द अव्यय (कृष्ण) पुरूष की प्रथम कला है। यह प्रथम सृष्टि है। माया के द्वारा सम्पादित होती है। माया ही ब्रह्म के एक अंश को घेरकर बांध लेती है। उसकी स्वतंत्रता छीन लेती है। अव्यय मन तभी से मुक्त होने के लिए छटपटाता है। क्रन्दन करता है। मां को मनाता है कि किसी तरह उसे फिर से मुक्त कर दे। बीच-बीच में मन बाहरी जगत की चकाचौंध में रमण करने लग जाता है। इन्द्रियों के सुखों के जाल में क्रन्दन भूलकर खेलने लग जाता है। इसी कारण अनेक ऎसे कर्म करता रहता है कि एक के बाद एक जन्म लेता हुआ चौरासी लाख योनियों से गुजरता रहता है। योनि वासना की सूचक है। इसी का दूसरा ऊध्र्वगामी भाव है भग, जो व्यक्ति को भगवान बनाने का, मुक्त होने का, मार्ग देता है।

 

मां तक क्रन्दन पहुंचे और इतना पहुंचे कि उसका मन द्रवित हो जाए। इसके लिए ध्रुव या प्रहलाद या द्रोपदी का क्रन्दन सीखना पड़ेगा। हाथी की चीत्कार सीखनी पड़ेगी जिसका पांव मगरमच्छ ने पकड़ लिया था। चीत्कार की एक क्रिया भी होती है, जैसे चोट लगने या घायल होने की अवस्था में हर व्यक्ति करता है। वह किसी मां के कान तक ही पहुंचेगा, बुद्धि तक पहुंचकर ठहर जाएगा। मन और आत्मा के धरातल तक नहीं पहुंच सकता।

 

द्रोपदी का क्रन्दन तो उसी समय शुरू हो गया था, जब दु:शासन उसे घसीटने लगा था। चीर खींचते समय भी क्रन्दन था, अहंकार भी था। पाण्डवों के लिए उसके नेत्रों में चुनौती भी थी। धीरे-धीरे उसने एक-एक को हारते देखा। दु:शासन के आगे उसकी शक्ति भी हार गई। तब उसने कृष्ण को पुकारा और पूर्णत: समर्पित हो गई। किसी भी प्रकार का कोई प्रतिरोध आगे नहीं जताया। अब उसका क्रन्दन शरीर का नहीं था। बच्चा भी क्रन्दन करता है। भूख से, भय से, दर्द आदि अनेक कारणों से। हर क्रन्दन पर मां स्वयं नहीं भागती है। जब वह भागती है, तो क्रन्दन तुरन्त ठहर जाता है।

 

जीवन में हम क्रन्दन को दुख का पर्याय मानते हैं। सुख से छूटने पर भी रोना आता है। रोना दया-करूणा आदि कल्याण भावों के साथ भी जुड़ा होता है।

हंसने की तरह रोना भी कई तरह का होता है। बाहर और भीतर का रोना भिन्न-भिन्न होता है। रोना शरीर और बुद्धि को नहीं आता। रोता तो मन ही है। पर जीवन में सत, रज, तम के प्रभावों के रोने के स्वरूप भी बदलते रहते हैं। झूठ भी होता है रोने में। मगरमच्छी आंसू भी बहते हैं। बिना आंसू के आत्मा का क्रन्दन भी होता है। अनेक प्राणियों को आप तड़पता देखकर उनके भीतर का क्रन्दन सुन सकते हैं। भीतर के क्रन्दन को मनुष्य भी दबाकर ही रखना चाहता है। वह उसे बहुत प्यारा भी होता है। इससे भी गहरा प्रभाव उस क्रन्दन का होता है जो जीवन की ठोकरों और विफलताओं से उत्पन्न होता है। ह्वदय के घावों का क्रन्दन मार्मिक भी होता है और दीर्घजीवी भी।

 

यह कविताओं का उद्गम स्थल बनता है। वैसे कुछ लोग स्वभाव से रोते ही रहते हैं। उनको जीवन से कभी संतुष्टि होती ही नहीं। अभावग्रस्त की तरह जीते हैं, भले ही ईश्वर ने उनको सब कुछ दिया हो। इस कारण वे मिले हुए सुख को कभी भोग नहीं पाते। जिसको भोगना आता है, वह कभी अभावग्रस्त नहीं रहता। या तो वह परिस्थितियों को बदलने की क्षमता रखता है या फिर उनको स्वीकार लेने की। जैसे विवाह के बाद पत्नी की स्थिति होती है। नए घर में आकर रोते रहने का अर्थ है कि न तो वातावरण को बदल सकी, न ही खुद को, तब वहां सुख कहां! भले ही दोष किसी के सिर डाला जाए, उसका जीवन तो अभाव ग्रस्त ही रहेगा। उसके चेहरे पर न शान्ति, न ही कान्ति। वह वर्तमान से ज्यादा अतीत भी जीने के कारण वर्तमान का उपयोग नहीं कर पाती। जिसको वर्तमान में जीना आ गया, अतीत और अनागत से जो मुक्त हो गया, वह सदा अपने सपने साकार करता है।

 

रोना कब आता है, किसको आता है, क्यों आता है? कष्ट (व्याघि) का रोना शारीरिक क्षमता की कमी से तथा आघि का रोना मानसिक परिप`ता की कमी से आता है। इसमें व्यक्ति की सुख-दुख की अवधारणा जुड़ी है। ये दोनों ही अवधारणाएं यथार्थ से परे हैं। इनके आधार पर खुश होना, दुखी होकर रोने बैठ जाना दोनों ही यथार्थ नहीं हैं। इनकी अवधारणा का आधार प्रकृति (सत, रज, तम) है। अत: जिन कारणों से व्यक्ति दुखी होता है, उनको इस संदर्भ में समझना पड़ेगा।

 

दूसरी बात यह भी है कि ये सारी स्थितियां जीवन में व्यक्ति द्वारा स्वयं पैदा की हुई होती हैं। उसके अपने कर्मो के फल ही होते हैं। यदि इस बात को वह स्वीकार कर ले, तो हंसते हुए परिस्थिति से गुजरा जा सकता है। रोना निराकरण नहीं है। यह पलायन भी हो सकता है और दु:ख का दोष किसी अन्य के सिर भी गढ़ा जा सकता है। कायर व्यक्ति स्थितियों से डरता है।

 

संघर्ष करने अथवा तपने से डरता है। जिसे जूझना आता है व न तो रोता है, न हार ही मानता है। अपनी क्षमताओं का सही आकलन, उनका विकास और जीवन के प्रति विश्वास चाहिए। हर व्यक्ति आवरण लेकर पैदा होता है, जिनके कारण दृष्टि भेद होता है। इनको एक बार समझ लेना ही इनको हटाना है। फिर द्वैत समाप्त, प्रतिबिम्ब समाप्त। जो शेष रहेगा, वह आनन्द ही होगा। रोना सदा-सदा के लिए विदा हो जाएगा। इसके लिए भक्ति, समर्पण का ही मार्ग सुलभ है। मां के आगे बैठकर उससे प्रार्थना, उसके आगे क्रन्दन तो करना ही पड़ेगा। सारे आवरण इसी के तो होते हैं। अत: यह प्रसन्न होगी तभी आवरण हटेंगे। तभी इसकी गोद में स्थान मिलेगा। तभी रोना मिटेगा।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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