Gulabkothari's Blog

अगस्त 22, 2011

बंशी द्वार है कृष्ण का

भारतीय शास्त्र कहते हैं कि देश में एक मात्र पूर्ण अवतार श्रीकृष्ण हुए हैं। और कृष्ण स्वयं यह कहते हैं कि मैं अव्यय पुरूष हूं। मेरे ही अंशों को केन्द्र में रखकर सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण होता है। तब क्या हम सब कृष्ण के अंशावतार नहीं हैं? कृष्ण यह भी कहते हैं कि सब कुछ छोड़कर मेरी शरण आ जा। क्या कृष्ण यह नहीं कह रहे कि अपने भीतर मुझे ढूंढ़ ले। कृष्ण विष्णु के अवतार कहे गए हैं। वे स्वयं विष्णु भी हैं, अवतार भी हैं और मानव रूप वसुदेव-देवकी के पुत्र भी हैं। विष्णु सृष्टि के प्रथम अक्षर पुरूष हैं, जिनकी नाभि से ब्रह्मा प्राण उत्पन्न होता है। ब्रह्मा-विष्णु प्राण इन्द्र प्राण रूप सूर्य को उत्पन्न करते हैं, जो शिव रूप में सर्वत्र पूजित है।

 

कृष्ण को पूर्णावतार मानने के पीछे सबके अपने मत हैं, किन्तु मेरे जैसे साधारण व्यक्ति को इतना ही समझ में आया कि कृष्ण पूरी उम्र प्रसन्न मुद्रा में रहे। प्रकृति के प्रतिनिघि रहे। तटस्थ भी रहे, धर्म का व्यावहारिक रूप (साम, दाम, दण्ड, भेद) भी समझा गए। प्रकृति की हर चीज हंसती गाती है। हवा, पानी, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, आकाश आदि सबका अपना संगीत है। सबकी अपनी मुस्कान है, जिसे देखकर हर किसी का मन प्रसन्न हो जाता है।

 

यह मुस्कान किसी चेहरे पर आसानी से नहीं आ सकती। इसके लिए मन बहुत पवित्र चाहिए। अहंकार मुक्त होना चाहिए। मन में कुछ दूसरों के लिए करने का भाव होना चाहिए। वापिस कुछ मांगे बिना, बिना अपेक्षा भाव के। आज इस मुस्कान का स्थान गंभीरता ने, अहंकार ने, अकेलेपन या व्यष्टि भाव ने ले लिया है। हर कोई गंभीर चिन्तक नजर आना चाहता है। हंसना-गाना तो बच्चों से भी छीना जा रहा है। मां-बाप स्वयं साक्षी बनते हैं।

 

कृष्ण ने हर परिस्थिति को हंसकर जिया। परिस्थिति कभी कृष्ण पर हावी नहीं हो पाई। कृष्ण सदा स्वयं के नियंत्रण में रहे। शायद इसी कारण वे सामाजिक मर्यादाओं को भंग कर सके। कभी स्वयं को लाचार नहीं माना। जीवन को स्वाभाविक ढंग से, खेल-खेल में जी कर दिखा गए। उन्होंने किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति को अच्छा बुरा नहीं माना। छोटा-बड़ा नहीं माना।

 

हर छोटी से छोटी क्रिया के मूल में सूक्ष्म को देखते रहे। अत: उनकी दृष्टि में सदा यथार्थ बना रहा। कृष्ण सदा हंसते रहे। आनन्द के पर्याय बने रहे। सृष्टि का निर्माण आनन्द के बिना नहीं हो सकता। अव्यय पुरूष की तो प्रथम कला ही आनन्द है। दूसरी विज्ञान कला ही बुद्धि योग है। जब व्यक्ति का मन बुद्धियोग के द्वारा आनंद से जुड़ता है, वही आत्म-साक्षात्कार है। कृष्ण ने ही इसका भी सरलतम मार्ग हमें दे दिया। वह है नाद। कृष्ण की बंशी ही इसका प्रमाण है।

 

जो व्यक्ति सदा प्रसन्न रहता है, आनंद भाव में रहता है, वह गाता है, बजाता है, नृत्य करता है। इनका आधार नाद ही है। नाद आकाश की तन्मात्रा है, गुण है। इसी से सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण होता रहता है। सम्पूर्ण सृष्टि इसी में लीन होती रहती है। कृष्ण इसी नाद के पर्याय बने रहे। गाना या गुनगुनाना नाद ही है। गुंजन शब्द नाद वाचक है। भौंरा, मधुमक्खी, मच्छर, झींगुर आदि गुंजन के उदाहरण है।

 

प्राणायाम में भी शुरू और अन्त में गुंजन कराया जाता है। गुंजन को, स्पन्दन रूप नाद को, भीतर बाहर आने-जाने का आलम्बन माना गया है। शरीर की शिथिलता, विचारों का तंत्र सब इससे प्रभावित होते हैं। कृष्ण की बंशी की धुन के स्पन्दन श्रोता के शरीर-मन के पार आत्मा तक पहुंच जाते थे। यहां प्रश्न मुक्त भाव का भी है। बिना पात्रता के ग्रहण कैसे हो सकता है? नाद और आत्मा दोनों शाश्वत हैं। शरीर और मन नश्वर हैं।

 

आत्मा ब्रह्म का अंश है और नाद शक्ति का। फैलाव शक्ति करती है। नाद ही मार्ग है ब्रह्म तक पहुंचने का। पूरा का पूरा भक्ति मार्ग नाद ब्रह्म की साधना है। बिना गीत-संगीत-ताल के भक्ति मार्ग गतिशील नहीं दिखाई पड़ता। हमारी आराधना-प्रार्थना-वेद वाचन-नृत्य आदि संगीत पर ही आधारित रहे हैं। वही संगीत कृष्ण स्वरूप के केन्द्र में है। गीत का माधुर्य सुनने वाले के लिए बाहरी विद्या है।

 

गाने वाले के लिए भीतर की विद्या है। दोनों के अनुभव एक नहीं हो सकते। यह अलग बात है कि गाने वाला श्रोताओं को प्रसन्न करने के लिए गा रहा है अथवा प्रभु को प्रसन्न करने के लिए। फिर भी गाना तो गाना ही है। गीत-संगीत-नृत्य जैसी लीनता, खो जाने का भाव अन्य कलाओं में नहीं होता। लीनता स्वत: ही ध्यान बन जाती है। भक्त खुद अपनी सुध-बुध भूलकर ईश्वर में लीन हो जाता है। सम्पूर्ण वातावरण पर इस लीनता का प्रभाव दिखाई पड़ेगा। संगीत का चरम यही लीनता है। मीरा की तरह, चैतन्य महाप्रभु की तरह, सूरदास की तरह, नरसी मेहता की तरह। इस लीनता का अर्थ ईश्वर से साक्षात्कार ही है। अत: अध्यात्म में प्रवेश संगीत से होता था।

 

हमारा उपासना क्षेत्र नाद पर ही आधारित रहा है। हमारा जप, माला और ध्यान सभी इस नाद पर आधारित हैं। हमें गुरू बीज मंत्र देता है। अभ्यास के द्वारा इसे वृक्ष रूप बड़ा किया जाता है। अक्षरों एवं व्यंजनों के बीच अवकाश कम करने का अभ्यास कराया जाता है। इन स्वरों को यह अवकाश जोड़ता है। इसमें सृष्टि का एक केन्द्रस्थ नाद रहता है। स्वरों के मध्य इस नाद को पकड़ना ही मन (ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र प्राण=ह्वदय) से बाहर होना है। कृष्ण की बंशी का संदेश स्पष्ट है। बंशी के सुरों में, संगीत में खो मत जाना। उसमें जो सूत्र रूप कृष्ण तत्व बह रहा है, उसे पकड़ना है। बंशी हमारा लक्ष्य नहीं है। भक्ति संगीत भी लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य है आल्हाद। यह आनन्द ही कृष्ण रूप है। सब तो अदृश्य है।

 

भीतर के इस सूक्ष्म नाद को सुनने के लिए ही महाप्राण ध्वनि (भ्रामरी) का प्रयोग कराया जाता है। वाचिक, उपांशु और मानस जप के तेज गति वाले अभ्यास कराए जाते हैं। ताकि शरीर शिथिल हो सके। विचारों की श्रृंखला टूट सके। मन से हम कट सकें। तब जो बचता है वही कृष्ण है। मैं ही हूं। नाद की गहनता, संकल्प की दृढ़ता तथा अभ्यास की निरन्तरता वहां पहुंचा देती है। इस मार्ग पर यदि कोई बाधा है, तो वह है अहंकार।

 

हम शरीर के सहारे आगे बढ़ते हैं। यह आत्मा का मन्दिर है। जैसाकि हमारे गांव में एक मन्दिर होता है। हम मन्दिर में प्रवेश के पूर्व घण्टा बजाते हैं और बाहर आते समय भी घण्टा बजाते हैं। इस घण्टे की गूंज के वही अर्थ हैं, जो भ्रामरी के हैं। मन्दिर भीतर से खाली होता है। नाद गूंजता है। उसी के बीच प्रवेश होता है। ओशो ने ‘एक ओकार सतनाम’ में इसका विस्तार किया है।

 

मानस जप को साक्षी भाव का क्रिया रूप माना है। गुरू नानक की वाणी की विवेचना में ओशो लिखते हैं:- अनेक नाद हैं और असंख्य बजाने वाले हैं। असंख्य गायक हैं, अनन्त राग-रागनियां हैं। धर्मराज जैसे गंभीर चिन्तक, भले-बुरे का ज्ञान रखने वाले भी नृत्य कर रहे हैं और हिसाब-किताब रखने वाले चित्रगुप्त भी। नानक कहते हैं- नाद, ओंकार तेरा द्वार है। उसी में छिपा हुआ तू (ईश्वर) सारे जगत को संभाले हुए है। ओकार से पहले भीतर एक सन्नाटे का सा नाद सुनाई देता है। झीगुंर जैसा। इसी को सçच्चदानन्द कहा है। ध्यान में नाद में होकर आत्म साक्षात्कार होता है।

 

नानक कहते हैं कि परमात्मा बनाता है। बना-बना कर अपनी सृष्टि को देखता है। उसे बड़प्पन देता है। यदि तुम्हें यह बात समझ में आ जाए कि तुम्हें परमात्मा ने बनाया है और देता चल रहा है, तुम्हे बड़प्पन। महिमा दे रहा है, तो तुम्हारे जीवन से पाप अपने आप विसर्जित हो जाएंगे। तुम उस तरह बोलोगे, व्यवहार करोगे, जिसको परमात्मा ने बनाया है। परमात्मा जिसे बचा रहा है। तुमसे प्रसन्न भी है। नहीं तो मिटा देता।

 

नाराज नहीं होता। इसके बदले हमको उसकी रजा, उसके हुकम की सीमा में रहना है। वरना दुख पाओगे। ध्यान तुम्हें अन्त:करण तक ले जाता है। अन्त:करण परमात्मा से जुड़ा है। तुम्हारा सोचना पूर्ण रूप से बन्द होना चाहिए। तभी अन्त:करण की ध्वनि सुनाई देगी। यही कृष्ण की बंशी का रहस्य है। यही कृष्ण तक पहुंचने का द्वार है। प्रश्A यही है कि जब पक्षी गाते हैं, हवाएं गाती हैं, झरने गाते हैं, प्रकृति गाती है, तब आदमी क्यों गाने से डरता है। क्या इसके बिना कृष्ण तक पहुंच पाना संभव है?

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

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