Gulabkothari's Blog

अगस्त 24, 2011

कब झुकोगे?

भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर किया जा रहा अन्ना हजारे का अनशन धीरे-धीरे एक देशव्यापी संघर्ष या क्रान्ति जैसा स्वरूप लेता जा रहा है। शुरू में अडियल रूख दिखाने वाली सरकार अनेक मांगों पर सहमत होती दिख रही है। इस आन्दोलन की विशेषता भी यही है कि यह पूर्णत: गैर राजनीतिक है। कांग्रेस सरकार सब तरह से ताल ठोककर देख चुकी है।

 

आज स्वयं को हारी हुई अनुभव तो कर रही है, किन्तु स्वीकार नहीं कर पा रही है। इसके बाद भी सरकार ने जो रूख दिखाया है, उसके कारण आशा की किरण दिखाई पड़ती है। स्वयं प्रधानमंत्री का यह कहना कि वे भी सशक्त लोकपाल बिल के समर्थक हैं। इससे भी एक कदम आगे स्व. जवाहर लाल नेहरू की अवधारणा भी लोकपाल बिल के पक्ष में थी।

 

इस तरह के समाचार अपने आप मीडिया में नहीं आ जाते। ये संकेतक का कार्य करते हैं। कांग्रेस इस दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग ढूंढ़ रही है। देश में चारों ओर से सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। जो बातचीत का लचीलापन शुरू में दिखाई पड़ रहा था, दबाव के साथ-साथ घटता जा रहा है। इसमें सर्वाघिक दबाव देश के युवा वर्ग का है। देश के 35 वर्ष से कम उम्र के 65 प्रतिशत युवा अन्ना का समर्थन कर रहे हैं। यही अभियान का भविष्य है।

 

पर्दे के पीछे भी कुछ घटनाक्रम होता जान पड़ रहा है। भाजपा स्वयं को पूरी तरह असहाय मान बैठी है। हाल ही में हुई सप्ताहभर की उज्ौन बैठक में संघ भी कोई राष्ट्रीय स्तर का निर्णय ही नहीं कर पाया। उसके अपने मुद्दों के आगे समय कम पड़ गया राष्ट्रीय मुद्दों के लिए। भाजपा, भ्रष्टाचार, लोकसभा चुनाव के हीरो जैसे मुद्दों में ही उलझी रही। अब भाजपा को शायद बहुत जोर लगाना पड़ेगा।

 

अब तक चुप रहने की कीमत भी चुकानी पड़ेगी। अन्ना टीम ने भाजपा को दूर रहने का इशारा पहले ही कर दिया था। वरना बाबा रामदेव के आन्दोलन की तरह इसे भी ले डूबती। भाजपा के सामने अब दुविधा यह भी आएगी कि, उसे राजग को एकजुट रखना है। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में अगले लोकसभा चुनाव लड़ने का निर्णय राजग की एकता पर भारी पड़ रहा है। इन्हीं सब स्थितियों में भाजपा इतनी कमजोर हो गई है कि, अब वामपंथियों का मुंह ताक रही है। अकेले खड़ी नहीं रह सकती। वामपंथी भी इसी स्थिति में हैं। प.बंगाल में चुप्पी छा जाने के कारण राष्ट्रीय मुद्दों पर भी गौण हो गए।

 

दोनों दल इस मुद्दे पर दिल्ली में एक साथ भारत बन्द जैसा कोई आयोजन करने की सोच सकते हैं। बन्द की तारीख दोनों दल एक ही रखने की सोच सकते हैं, किन्तु प्रदर्शन अलग-अलग स्थानों पर रखना चाहेंगे। उसी दिन शायद यह घोषणा भी कर दें कि भविष्य में साथ-साथ भागीदार रहेंगे। वे मानते हैं कि युवा इससे भ्रमित होकर उनकी बात स्वीकार लेगा। उनके साथ जुड़ेगा। जब इतना बड़ा गैर-राजनीतिक आन्दोलन गतिमान है तब कौन इससे अलग होना चाहेगा? कौन दलगत स्वरूप ग्रहण करना चाहेगा?

 

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता भी कूदने की तैयारी में दिख रही हैं। आज तो यह भी दोनों दलों से अलग हैं। पूर्व मुख्यमंत्री करूणानिघि के विरूद्ध कार्रवाई के लिए केन्द्र सरकार पर भी अपना दबाव बनाए हुए हैं। अमरीकी विदेश मंत्री की इनके साथ लम्बी मुलाकात का भी कोई तो मतलब होगा। इतना समय उन्होंने न तो प्रधानमंत्री को दिया, न ही  सोनिया गांधी को।

 

उधर सोनिया गांधी की बढ़ती बीमारी अलग चिन्ता है कांग्रेस की। इस बीच यू टयूब पर सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वढ़ेरा के विरूद्ध ढेर सारी सूचनाएं और जानकारियां उपलब्ध होने लग गई, जो भ्रष्टाचार के मुद्दे को नई परिभाषा भी दे सकती हैं। यू टयूब का दावा है कि पिछले वर्ष उसे भारत में अपने जो 12400 से अघिक वीडियो प्रतिबंघित करने पड़े, उनमें से 12200 तो अकेले गांधी परिवार से जुड़े भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों के थे। जन लोकपाल के बाद भी अन्ना हजारे के पास आंदोलन आगे बढ़ाने के कई मुद्दे बाकी हैं।

 

जैसे-जैसे अन्ना का आन्दोलन आगे बढ़ेगा, प्रादेशिक सरकारों की भूमिका भी नया रूप लेती चली जाएंगी। शीर्ष पर बैठे कुछ परिवारों के निजी विवाद भी आने वाले समय में देश की राजनीति को प्रभावित करते दिखाई देते हैं। एकमात्र रॉबर्ट वढ़ेरा पुराण का प्रभाव भी सोचा जा सकता है। कुछ नेताओं को विभिन्न दलों ने भी अपने-अपने स्तर पर दरकिनार कर रखा है।

 

उनके तेवर, उनके भ्रष्टाचार की गाथाएं लगता है शीघ्र देश के सामने आने वाली हैं। ऊपर से सब कुछ नेतृत्वविहीन! केन्द्रीय सरकार अन्ना के नजारे देख चुकी है। आगे हठधर्मी बनी रही तो देश को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। सरकार में चेहरे बदलना तो तय हो ही गया है। देश के आगे तो झुको!

 

गुलाब कोठारी

 

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