Gulabkothari's Blog

अगस्त 29, 2011

देशहित में झुके रहें

जो कुछ स्थितियां द्वापर में कंस के शासन में थीं, लगभग वैसी ही देश में व्याप्त थीं। भ्रष्टाचार, राजनीति का अपराधीकरण, जातिवाद, संाप्रदायिकता, चारो ओर निराशा का वातावरण। राजनीतिक दलों में विचार, नैतिकता व नेतृत्व का अभाव तो इस आंदोलन मे सामने आ ही गया। और यह भी कि कोई भी साधारण, संकल्पवान व्यक्ति, बेदाग छवि और जीवट के सहारे, भटकती युवा पीढ़ी में भी नैतिकता के पांचजन्य से प्राण फूंकसकता है। मात्र 12 दिनों के अल्पकालीन अनशन ने देश को झकझोर दिया।

 

सरकार ही नहीं, संसद भी नतमस्तक हो गई। इस आंदोलन ने अहिंसा की आणविक शक्ति फिर से विश्व को समझा दी। आधुनिक संचार माध्यमों का सकारात्मक उपयोग सामने आया। अन्ना ने देश प्रेम की भावना, देश के लिए संघर्ष करने का जज्बा दिखाकर युवा पीढ़ी के सामने आजादी-गांधी-अहिंसक क्रांति में विश्वास जगा दिया। हर प्राणी में परमात्मा का अंश है, कम ज्यादा भले ही हो, अत: ठान ले तो क्या नहीं किया जा सकता।

 

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरूद्ध युद्ध छेड़ा था। जल्द ही जीत भी गए। यूपीए सरकार अपनी ही शकुनि मामा की खोटी नीतियों, सत्ता के दुरूपयोग तथा दाब-धौंस के प्रयासों के कारण बदनाम भी हुई और करारी हार का मंुह भी देखना पड़ा। संसद में शनिवार को सरकार ने जनभावनाओं के दबाव के आगे समर्पण कर दिया। घुटने भी टेके, अपमानित भी हुई और सरकार की भी भत्र्सना हुई। सरकार की मंशा शुरू से ही आंदोलन को कुचल देने की रही थी। भ्रष्टाचारियों को डर था कि यह बिल उनके पर कतर देगा।

 

अन्ना की गिरफ्तारी, छोड़ने का नाटक, सत्ता के सिपहसालारों की भाषा और दंभ देखने वाला था। एक नेतृत्व विहीनता का वातावरण। ‘ऊपर से प्रधानमंत्री का मौन’ अथवा ‘मैं तो बेईमान नहीं हूं।’ लोकतंत्र की खिल्लियां उड़ा रहे थे। देश टके-टके के भ्रष्ट नेताओं को आपके (प्रमं) प्रशस्ति के नाम पर सुन रहा था, क्योंकि वे सत्ता में थे। दूसरा मूर्खतापूर्ण कार्य हुआ कि गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने सारा ठीकरा दिल्ली पुलिस और केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के सिर फोड़ने का दुस्साहस दिखाया। इसी के साथ भ्रष्टतम नेताओं ने अन्ना टीम की बेदाग छवि पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने शुरू कर दिए। कौरव राज भी ऎसा ही था। यहां द्रौपदी के रूप में लोकतंत्र था।

 

सरकार की दुर्दशा के कारण भी सरकारी भोंपू ही रहे। ये जितना बोलते, उतनी अघिक जनता अन्ना के साथ हो जाती। देश ने अपनी पीड़ा और सत्ता से त्रस्त दबे हुए आक्रोश की अभिव्यक्ति अन्ना को सौंप दी। चुने हुए प्रतिनिधियों को न केवल नकारा बल्कि उनसे लोहा लेने के लिए अन्ना को नेतृत्व संभलाया और देश स्वयं उनके साथ हो लिया। विश्व के लिए एक आदर्श उदाहरण! शायद गांधीजी की नमक यात्रा (दांडी मार्च) के बाद किसी एक व्यक्ति के पीछे देश के गांव-गांव, गली-गली में चलने वाला यह पहला कारवां था। बिना दांडी के।

 

कांग्रेस ने धृष्टता बरतने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी और यहां तक कह गए कि अन्ना संसद की मर्यादा को ही कम कर रहे हैं। अब क्या वे थूक कर चाटेंगे? जब दो सप्ताह पूर्व ही स्पष्ट हो गया था कि सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा, उसी समय यह निर्णय हो जाता तो सरकार का भ्रष्ट चेहरा भी ढका रह जाता। भाजपा तो इस आंदोलन में पूरी तरह मार खा गई। नदारद ही रही जिसके कारण उसे राजनीतिक दल का दर्जा देने में भी अब देशवासियों को दिक्कत आने लगी है।

 

प्रश्न तो आज भी यही है कि जो राजनीति पूरी तरह भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, वह भ्रष्टाचार को खत्म करने केलिए कोई कदम उठाएगी? लोकपाल तो एक संस्था का ही नाम है, जिसे व्यक्ति भी भ्रष्टाचार का जामा पहनाएंगे। कांग्रेस में ऎसे व्यक्तियों की कहां कमी है, भावी संघर्ष में बहुत अवरोध आएंगे। भ्रष्ट नेता सत्ता को आसानी से नहीं छोडेंगे। एक-एक करके हटाना होगा।

 

बाकी को चुनाव में। जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर फूट डालने की कोशिश तेज हो जाएगी। समझदार युवाओं को आंदोलन का नेतृत्व हाथ में लेना चाहिए। अनीति का मुकाबला नीति से करना है। नया नेतृत्व तैयार करना है। जनता हमेशा साथ देगी। अन्ना के पास समय कम है। राजनीतिक दलों के पास अब जीवट वाले, सच्चरित्र नेता नहीं हैं।

 

भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष की शुरूआत हो गई है। मुद्दे अनेक हैं। 60 साल में लोकतंत्र के नाम पर भ्रष्टाचार की फसलें ही काटी गई हैं। अब फिर से देश जागा है। फिर नींद न आ जाए। आपका भविष्य आपके हाथ में रहना चाहिए। जो इससे खिलवाड़ करे, चाहे नेता, अघिकारी, उद्योगपति, शिक्षक या कोई भी, तो अन्ना टीम निपटा दे उसे।

 

लोकतंत्र के बारे में 45 साल पहले ओशो ने कहा था- ‘हिन्दुस्तान की एक जलती समस्या है पाखंड, सब तरह का पाखंड। जो व्यक्ति पक्का अहंकारी है, वह हाथ जोड़कर कहता है, मैं तो कुछ नहीं हूं, आपके पैर की धूल हूं। वह भीतर तिजोरी बड़ी करता जा रहा है, वस्त्र सादे पहने हुए है। पैदल चलता है और विदेशों में धन जमा करता है। यहां बैठकर चरखा कात रहा है। बहुत अजीब मामला है।’

 

लोकतंत्र तभी सार्थक होता है जबकि नियंत्रण लोक के द्वारा होता है। जनता का और जनता के लिए क्या होता है, वह तो इस सरकार ने खूब साबित कर दिया। इस सारे दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम के लिए प्रधानमंत्री को देश से क्षमा मांगनी चाहिए और भविष्य के प्रति देशवासियों को आश्वस्त भी करना चाहिए।

 

गुलाब कोठारी

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1 टिप्पणी »

  1. VERY VERY THANKS TO SHRI KOTHARI JI FOR YOUR BLOGS

    टिप्पणी द्वारा DINESH — अगस्त 29, 2011 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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