Gulabkothari's Blog

सितम्बर 2, 2011

अन्याय

इस जगद्गुरूदेश की संस्कृति को किसी की नजर लग गई है। कैसी-कैसी अनहोनी घटनाएं हो रही हैं। अभी तो अन्ना हजारे की क्रांति आधे रास्ते ही पहुंची है। इस बीच एक और कानून-क्रांति के अंकुर फूट रहे जान पड़ते हैं। राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी देने के मुद्दे पर तमिलनाडु उच्च न्यायालय ने 8 सप्ताह की राहत दे दी।

 

शायद उसका दिल मुख्यमंत्री जयललिता के उस करूण रूदन से पसीज गया, जब उन्होंने कहा था कि, राज्य सरकार के पास सहायता करने का कोई उपाय नहीं है। ऎसा लग रहा है कि, जयललिता इस मुद्दे को कावेरी जल विवाद की तरह क्षेत्रीयता के तराजू पर तोल रही हैं, जबकि अपराधी की कोई जाति, धर्म या राज्य नहीं होता। वह अपराधी ही होता है। लगता यह भी है कि मुख्यमंत्री प्रवाह में बह गई अन्यथा ऎसे मामलों में वह हों या अन्य कोई, होना यह चाहिए कि, सम्बंघित संस्था तक सरकार या संगठन अपनी बात पहुंचा दे और जो भी निर्णय हो उसे माने। उसकी अवहेलना करने की कोशिश कभी नहीं हो, कहीं नहीं हो।

 

तमिलनाडु उच्च न्यायालय का फैसला संविधान की मर्यादा का उल्लंघन करता जान पड़ रहा है, इसके कारण विभिन्न प्रदेशों में एक नई बहस छिड़ गई है जो कि देश के लिए नासूर का काम करेगी। जिस मुद्दे पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने, अपना फैसला दे दिया, मंत्रिमण्डल ने हरी झण्डी दे दी, महामहिम राष्ट्रपति ने ‘क्षमा’ करने से इंकार कर दिया, उसके बाद क्या किसी भी प्रदेश के उच्च न्यायालय को यह अघिकार रह जाता है कि, इन सब उच्च संवैधानिक संस्थाओं की अवज्ञा कर सके? क्या सर्वोच्च न्यायालय की यह अवमानना नहीं, जिसको जन लोकपाल बिल से बाहर रखने के लिए इतना संघर्ष चल रहा है? क्या देश के राष्ट्रपति पद का अपमान नहीं है यह?

 

इसी फैसले की प्रतिक्रिया स्वरूप ही तो जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री ने यह कह दिया कि, यदि जम्मू-कश्मीर विधानसभा भी तमिलनाडु की तर्ज पर अफजल गुरू को लेकर ऎसा ही कोई प्रस्ताव पारित करती तो उस पर भी इसी तरह की मूक प्रतिक्रिया होती? हर्गिज नहीं! क्या इस वक्तव्य का अर्थ देश के कर्णधारों को समझाना पड़ेगा? आज पंजाब में भी सिख संगठनों की ओर से ऎसा ही प्रश्न उठाया गया।

 

जिस पर पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर युवक कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मनिंदर जीत सिंह बिट्टा पर प्राणघातक हमला (जिसमें 9 लोगों की मृत्यु हो गई) करने के आरोपी देवेन्दर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा माफ करने की अपील की है। अचरज की कोई बात नहीं है कि तमिलनाडु की तरह यहां भी कांग्रेस और अन्य संगठनों के नेता इस अपील पर उनके साथ हंै। गुजरात सरकार में मंत्री रहे हरेन पण्डया की हत्या का मामला भी ऎसा ही है जिसमें सरकार स्वयं पुनरीक्षण याचिका दायर करने की बात कह रही है।

 

अगर हर प्रदेश अपने-अपने मुद्दों/ अपराघियों को फांसी की सजा से बचाने के लिए ऎसे कदम उठाएगा, तब क्या राष्ट्र के विखण्डन का रास्ता नहीं खोलेगा? देश में अभी 22 मामले अटके हैं, फांसी के। और बरस लग गए इन पर निर्णय होते-होते। कभी वोट की राजनीति बीच में आ जाती है, तो कभी भाषा या क्षेत्रीयता। देश की प्राथमिकता सदा ही पिछली सीट पर बैठी नजर आती है।

 

क्या वोट मांगने वाले संविधान की रक्षा नहीं करेंगे? क्या वोट मांगने का अन्य लक्ष्य भी है? चीन की संसद पर कोई हमला कर दे तो क्या हमलावर 24 घंटे जीवित रह सकते हैं? किसी देश के प्रधानमंत्री रहे व्यक्ति के हत्यारों को बचाने के लिए, उसी देश का, कोई नागरिक आगे आ सकता है, यह बात तो सोच के दायरे के भी बाहर है। ऎसे नागरिकों के विरूद्ध तो देशद्रोह का मुकदमा चलाना भी वाजिब होगा।

 

देश के मुख्य न्यायाधीश भी चुप हंै, केन्द्र सरकार और यहां तक कि, राष्ट्रपति भवन भी मौन है? लगता है कि, नागरिक भी गलत सोच रहे हैं। अन्ना हजारे को भी इसमें भ्रष्टाचार अथवा असंवैधानिकता की दुर्गध नहीं आई। सर्वोच्च न्यायालय को तुरंत प्रभाव से ऎसे न्यायाधीशों के खिलाफ कदम उठाने चाहिएं ताकि ऎसे दुस्साहस को अंकुरित होते ही कुचला जा सके वर्ना यह अमरबेल लोकतंत्र को भी लील जाएगी!

 

गुलाब कोठारी

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