Gulabkothari's Blog

सितम्बर 7, 2011

चिकित्सा में विकल्प तो हो!

अंग्रेजियत का भूत इस देश की आत्मा को दिन-प्रतिदिन चट किए जा रहा है। इस देश की नीतियां संस्कृति, परम्परा अथवा जीवनशैली को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जातीं। न आम आदमी की आर्थिक स्थिति के परिपे्रक्ष्य में बनाई जाती हैं। आज तो एक श्रेणी विशेष के लोगों की चर्चा अथवा विदेशी परिवेश को ध्यान में रखा जाता है। देशवासियों के प्रति हमारे नीतिकार संवेदनशील नहीं हैं। हमारी विरासत से भी नीतिकार अनभिज्ञ होते हैं, क्योंकि इनके शिक्षण-प्रशिक्षण में भारतीयता अल्पतम ही होती है। इनके सपने भी भोगवादी संस्कृति का ही प्रतिनिघित्व करते हैं।

 

उदाहरण के लिए हमारे यहां कहा जाता है- ‘पहला सुख निरोगी काया।’ इस विषय में भारत का आयुर्वेद और अष्टांग योग आज भी सम्पूर्ण विश्व में छाया हुआ है। सिवाय हमारी शासन व्यवस्था के। आधुनिक चिकित्सक तो इनको शत्रु मानते हैं। इनमें भौतिकवाद के समावेश को स्थान नहीं है। अत: आज तो शिक्षित-स्नातक वैद्य भी इस ज्ञान से दूर होते जा रहे हैं।

 

प्रश्न यह नहीं है कि कौन सी पद्धति सही है या गलत, प्रश्न यह है कि कौन सी पद्धति आम आदमी तक सुलभ हो सकती है। उसकी सीमा में हो सकती है और उसकी जीवनशैली से जुड़कर उसे निरन्तर स्वस्थ रख पाने में सफल हो सकती है। हमारा देश बड़ा भी है, आर्थिक दृष्टि से पश्चिम की तरह सम्पन्न भी नहीं है। अत: किसी भी एक पद्धति के भरोसे सवा सौ करोड़ लोगों को स्वस्थ नहीं रखा जा सकता। हमें एक से अघिक पद्धतियों को मान्यता देनी चाहिए। उनकी शिक्षा, शोध, प्रशिक्षण एवं व्यवसायीकरण की भी व्यवस्था करनी चाहिए। वैकल्पिक चिकित्सा का क्षेत्र भी आज बहुत बड़ा और वैज्ञानिक हो गया है। इसमें भी कई प्रकार के शोध होते रहते हैं। कई देशों में इनको शिक्षा में शामिल कर लिया है। डिग्रियां दी जाती हैं, सरकारी मान्यता प्राप्त हैं।

 

कहने को तो हमारे देश में आयुर्वेद चिकित्सा प्रचलन में है। किन्तु सरकार या उसके नीति निर्घारक मन से ऎसा करते नहीं हैं। वे रसोई की सामग्री, वर्षो के अर्जित ज्ञान का उपयोग होते भी देखना नहीं चाहते। कोई भी सरकार ईमानदारी के साथ आयुर्वेद का विकास नहीं चाहती। जड़ी-बूटियों में मिलता क्या है? वैद्यों की जीवनशैली से जान जाएंगे। आधुनिक चिकित्सा को विकास के साथ जोड़कर बड़ा उद्योग बना दिया। चारों और धन की बरसात हो रही है। शिक्षा, दवा खरीद, जांच (टेस्ट) आपरेशन आदि सभी रास्ते कुबेर के घर पर मिलते हैं। भले ही देश के अघिकांश नागरिक चिकित्सा के अभाव में पीडित रहें या मर जाएं। सदा ही मरते रहे हैं अथवा भाग्य में लिखाकर लाए हैं।

 

क्या लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार का इस ओर कोई दायित्व नहीं है? क्या मात्र कागजी योजना बनाकर रस्म अदायगी कर देना काफी है? क्या शेष भारत के लिए सस्ती, वैकल्पिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना सरकार का कार्य नहीं है? क्या संविधान में केवल पाश्चात्य चिकित्सा या एलोपैथी की अनिवार्यता है? क्या प्राकृतिक चिकित्सा, प्राणायाम, योग, आयुर्वेद, चुम्बक, ध्वनि, गंध आदि प्रामाणिक चिकित्सा, एक्यूप्रेशर/पंचर/मेजोशियात्सु जैसे प्रचलित चिकित्सा ज्ञान का समावेश नहीं किया जाना चाहिए? क्यों आम गरीब, महंगाई से त्रस्त और अभावग्रस्त व्यक्ति को एक ही पद्धति से इलाज कराने के लिए कोई भी सरकार बाध्य करे? क्या चीन, जापान, कोरिया जैसे देशों ने अपनी-अपनी चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक स्वरूप नहीं दिया है? वे भी एलोपैथी की टक्कर में खड़े हैं। स्वास्थ्य प्रत्येक व्यक्ति से जुड़ा विषय है। प्रकृति से भी जुड़ा है, भौतिक जीवन चर्या से भी।

 

शरीर को मन, बुद्धि और आत्मा का दर्पण मानकर रोगों पर विचार होता है। प्राणों की क्रियाएं, मन की भावनाएं आदि को भी रोग का कारण माना है। मन-प्राण-वाक्, ऋक्-यजु-साम, सत-रज-तम, वाक-पित्त-कफ आदि के आधार पर निदान और चिकित्सा के नियम बने हैं। हम किसी एक चिकित्सा पद्धति को इतने बड़े देश पर नहीं थोप सकते। नित्य स्वस्थ रहने की अवधारणा में चिकित्सा कहीं भी जुड़ी नहीं होनी चाहिए, तब योग के बारे में विचार करने की आवश्यकता पड़ती है।

 

स्कूलों और महाविद्यालयों में यदि योग के साथ वैकल्पिक विषयों का ज्ञान उपलब्ध कराया जा सके, तो चिकित्सा की समस्या को काफी हद तक निपटाया जा सकता है। चिकित्सा के लिए भी हर सरकार को पहले परम्परागत पद्धति की शिक्षा देनी चाहिए, जिसको गरीब तथा अनपढ़ भी जानता है। शायद किसी ने इस स्थिति का सर्वे नहीं किया कि एक पद्धति की चिकित्सा के कारण कितने लोगों के बर्तन तक बिक गए और आदमी को भी नहीं बचा सके। सेवा कहलाने वाले इस पेशे ने आज विकल्प के अभाव में शुद्ध व्यापारिक स्वरूप ग्रहण कर लिया है। चारों ओर दलाल खड़े हो गए। गांवों से मरीज पकड़ने के लिए भी दलाल हो गए हर गांव में।

इस स्थिति में आम आदमी सुरक्षित नहीं है। विशेष रूप से आर्थिक पक्ष के परिप्रेक्ष्य में। क्या सरकार गरीबों को सस्ते उपाय देना ही नहीं चाहती? क्या सरकार के हिसाब से गरीब का तो मर ही जाना उचित है। न सरकार अस्पताल खोल सकती, न डाक्टर भेज पाती, दवाईयां मरीज स्वयं लेकर आता है। ऊपर से डाक्टर तो देखने की फीस लेता है।

 

गांवों में तो यह सब है ही नहीं। ग्रामीण किसी दवा के बारे में कुछ जानता नहीं। स्वतन्त्र रूप से निरोग रहने वाला व्यक्ति आज कितना पराश्रित हो गया है। केवल इसलिए कि कोई भी सरकार न उसकी जीवनशैली की, आर्थिक स्थिति, परम्परा तथा न चिकित्सा की उपलब्धता का ध्यान करती है। यदि देश के हर व्यक्ति को निरोग रखना है, उसकी सोच एवं स्थिति के अनुरूप सम्मान से कार्य करना है तो उसे अनेक विकल्प देने होंगे। वह स्वयं तय करे कि उसे कौन सा विकल्प चुनना है। हमारे लिए सभी विकल्प अपने-अपने स्वरूप में उपयोगी हैं। हर विकल्प के लिए शोध, विकास, प्रसार, प्रयोग, सुविधाएं आदि उपलब्ध करानी होगी।

 

इसका एक बड़ा लाभ यह भी होगा कि हर वैकल्पिक चिकित्सा के लिए व्यक्ति को इतनी महंगी पढ़ाई भी नहीं करनी पड़ेगी। न डाक्टरों और अस्पतालों पर इतना अघिक दबाव ही रहेगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी एक नया आयाम जुड़ेगा। मध्यम एवं निम्न वर्ग को बड़ी राहत भी मिल पाएगी। अनेक पद्धतियां आसानी से गांवों तक पहुंच जाएंगी। कई तो ऎसी भी हैं जिनमें बिजली तक की आवश्यकता भी नहीं पड़ती।

 

कई जनजीवन से जुड़ी तो हैं, किन्तु उनका ज्ञान व्यवस्थित नहीं है। सरकार के जरा से प्रोत्साहन से देश स्वस्थ हो सकता है। दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए बस। वरना ये व्यापारी आपका आश्रय पाकर उन्मुक्त बने रहेंगे। सेवा के नाम पर संवेदनहीन ही बनेंगे क्योंकि आप जनता को कोई विकल्प नहीं देना चाहते। सरकार चाहें तो स्वर्ग का निर्माण कर लें, या फिर नर्क तो है ही। ये ही सरकार का योगदान माना जाएगा। आज तो न जीने के लिए विकल्प है, न ही मरने के लिए।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

 

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