Gulabkothari's Blog

सितम्बर 11, 2011

रूप-2

हमने देखा कि भू-पिण्ड का भाग शरीर बनाता है। चन्द्रमा का अंश मानव का मन कहलाता है। बुद्धि सूर्य से आ रही है। जो आत्मा है वह अव्यक्त है। इसी को मनु तžव कहा है, जिसके विकास से ही ‘मानव’ शरीर का नाम मानव हुआ। आत्मा-बुद्धि-मन-शरीर, इन चारों की समन्वित अवस्था का नाम मानव है। मानव योनि को सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ योनि कहा गया है।

 

क्योंकि इसी में रहकर व्यक्ति कर्म करता है। कर्म को लक्षित कर सकता है। शेष योनियां नर्क-त्रिर्यच-देव आदि भोग योनियां कही गई हैं। इनमें व्यक्ति कर्म-फल भोगकर जीता है। मानव योनि में कर्म एवं चिन्तन की स्वतंत्रता इसको विशिष्ट योनि बना देती है। शरीर, मन और बुद्धि में अनेक प्राणी मानव से आगे हो सकते हैं, किन्तु आत्म भाव के साथ इन तीनों को जोड़कर कर्म करना केवल मनुष्य की ही विशिष्टता है।

 

मनुष्य योनि को ही आत्म दर्शन का लक्ष्य भी प्राप्त है। धर्म को समझकर, धारण करके, जीवन की कामनाओं को अर्थ के सहारे पूरी करता हुआ पुनर्जन्म के चक्र से बाहर निकल सके। इसके लिए मानव आकृति-प्रकृति एवं अहंकृति विशिष्ट रूप लिए हुए है। बाहर और भीतर के जीवन को केवल मानव ही आत्म भाव के सहारे संतुलित कर सकता है।

 

माया एवं पुरूष के संघर्ष की योनि है मानव। पुरूष छटपटाता है मुक्त होने को और माया चाहती है अपना साम्राज्य। तभी माया को इतनी सुन्दर, देव-स्वरूप आकृति दी है कि व्यक्ति उसमें अटका ही रहे। यही आकृति असुर संहार के लिए भी उपयोगी होती है। जब व्यक्ति का दृढ़ संकल्प स्पष्ट हो जाता है-मुक्ति के लिए, तब माया भाव भी समर्पण कर देता है। सहयोगी बन जाता है। तब शरीर गौण हो जाता है।

 

भावनात्मक धरातल का श्रद्धात्मक संप्रेषण शुरू हो जाता है। वही माया पुरूष को आवरणों से मुक्त करती है। मातृ रूप में किस प्रकार उसकी विदाई की तैयारियां करवाती हैं, किस प्रकार नए आवरणों और बन्धनों से बचाती हुई, मीरां बनकर पुरूष से एकाकार हो जाती है। क्या मीरां को देखकर किसी के मन में जरा भी वासना का संचार हो सकता है? यही आकृति की शुद्धता हर प्राणी के आभामण्डल को शुद्ध करती है। लोक कल्याण के स्पन्दनों का प्रसार करती है। इसी आकृति में मनुष्य अपनी प्रकृति का प्रतिबिम्ब देखता हुआ अपनी अहंकृति की गांठें खोल सकता है। अपने आत्म भाव में प्रविष्ट हो सकता है। कामनाओं से मुक्त हो सकता है।

 

रूप के साथ अन्य तथ्य भी जुडे हैं। एक-इसके देखने के लिए नेत्र या चक्षु की जरूरत पड़ती है। दो-प्रकाश की उपस्थिति में ही रूप को देखा जा सकता है। अंधकार में सारे स्वरूपों एवं आकृतियों के भेद समाप्त हो जाते हैं। सारी गतियां ठहर जाती हैं। इसी का तो नाम प्रलय है। रात्रि प्रलय है।

 

प्रकाश सारा सूर्य से जुड़ा है। अंगिरा तžव भी हमें सूर्य से प्राप्त होता है। सृष्टि की सभी आकृतियां भी अगिA रूप हैं। यहां तक कि जो आकृतियां सौम्य जान पड़ती हैं, वे भी अगिA रूप ही होती हैं। सूर्य हमारा पिता है, बीज रूप है। अत: अहंकृति भी सूर्य से ही जुड़ी होती है। प्रकृति का मूल कार्य क्षेत्र मन है। अत: प्रकृति का जुड़ाव चन्द्रमा से बना रहता है। सूर्य की कलाएं परिवर्तनशील नहीं हैं। मन सदा चन्द्रमा की कलाओं के साथ बदलता रहता है। यह बदलने का गुण ही जीवन यात्रा का लक्ष्य तय करता है। इसी कारण प्रकृति को बदलकर आकृति और अहंकृति में परिवर्तन लाया जाता है।

 

आत्मा को आवरणमुक्त किया जा सकता है। बदलती कलाएं भी मन को चंचल बनाती हैं और सुन्दरता का पुजारी भी। इनके स्पन्दनों का प्रभाव भी आकृति को प्रभावित करता है। शब्दों के स्पन्दन भी शरीर में बदलाव का कारण बनते हैं। जो हम बोलते हैं, वे शब्द भी, तथा जो हम सुनते हैं, वे ध्वनियां भी। तब संगीत, भक्ति, उपासना, प्रार्थना आदि का महत्व समझ में आता है। भले लोगों को पहचानने में भूल हो सकती है, किन्तु आसुरी रूप दूर से ही समझ में आ जाता है। उसको देखते ही हमारा मुंह बिगड़ जाता है।

 

शरीर सिकुड़ जाता है। इसका अर्थ है कि हमारी आकृति हमारे कार्यों से भी प्रभावित होती है, वहीं दूसरों के व्यवहार से भी। सरल आत्माओं की आकृति सदा मोहक लगती है। बिना किसी सौन्दर्य प्रसाधन के। रूप की सुन्दरता का यही रहस्य है। व्यक्ति जैसे यथार्थ को छिपाकर जीता है, वैसे ही रूप को प्रसाधनों से ढकता है। सही स्वरूप भी दिखाना नहीं चाहता। जबकि सबसे पहले तो मेकअप ही दिखाई देता है। झूठ का प्रमाण-पत्र ही तो है। बड़े घरों में छिपाने को ज्यादा होता है।

 

रूप कान्ति से चमकता दिखाई देता है। आभामण्डल की शुद्धता से दिव्य जान पड़ता है। प्राणवान विचार और लोकहित के भाव ही हैं जो रूप को मानवीय धरातल से ऊपर उठाते हैं। मोह पैदा करने वाला रूप यहां पहुंचकर व्यक्ति को रूपातीत होने में सहायक बन जाता है। साथ में यदि गुणातीत करने वाले गुरू का सान्निध्य मिल जाए तो शेष रह ही क्या जाएगा।

 

गुलाब कोठारी

लेखक पत्रिका समूह के प्रधान संपादक हैं

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