Gulabkothari's Blog

सितम्बर 17, 2011

चलो, घर चलें!

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00

राजनेता अपनी “कथनी और करनी” के भेद को कैसे बनाकर रखते हैं, कैसे अवसरवादिता की अभिव्यक्ति होती है, कैसे समय देखकर अपनी बात से पलट जाते हैं, कैसे पल्ला झाड़ लेते हैं आदि प्रश्नों के उत्तर पिछले 72 घण्टों में हमारे समक्ष आ गए। गुरूवार के मीडिया कवरेज में आडवाणी की रथ यात्रा के भरपूर चर्चे रहे। भाजपा और संघ की सहमति के हवाले भी थे। इसी के बीच राजस्थान पत्रिका/ पत्रिका के मुख पृष्ठ पर सम्पादकीय “माननीय” भी प्रकाशित हुआ था। इसे लेकर अभी तक जितने फोन पत्रिका कार्यालयों में, एजेंटों, शुभचिंतकों या परिचितों के जरिए हमें प्राप्त हुए वे सूचना क्रान्ति के युग में भी किसी बाढ़ से कम नहीं थे। इनमें भी आश्चर्यजनक रूप से भाजपा एवं संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी भी सम्मिलित थे, जो स्वयं व्यक्तिगत रूप से बधाई भी दे रहे थे और आभार भी ज्ञापित कर रहे थे। जो कार्य भाजपा की केन्द्रीय कार्यकारिणी और भाजपा अध्यक्ष नहीं कर सके, वह कार्य स्वत: ही पटल पर आ गया। पूरे देश ने इस सम्पादकीय के सकारात्मक एवं निष्पक्ष, साहसी स्वरूप को उचित माना। इसके लिए ह्वदय से आभार।

गुरूवार के समाचारों में बुधवार के मुकाबले विरोधाभास रहा। एक ओर संघ की नाराजगी तथा दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी का यह वक्तव्य कि “वरिष्ठ नेता के नाते उन्हें सीधे इनकार करना मेरे लिए कठिन था” अध्यक्ष पद की गरिमा को कम करता है। आडवाणी तो समय-समय पर हल्का व्यवहार करते ही रहे हैं। विडम्बना ही है कि देश के शीर्ष राजनीतिक पदों पर बैठे लोग भी ऎसा व्यवहार करने से नहीं चूकते। और वह भी अपने अहंकार की तुष्टि के लिए। ताजा खबरों ने स्पष्ट कर दिया कि कल तक संघ और भाजपा दोनों ही आडवाणी के पक्ष में झूठ बोल रहे थे। कोई भी रथ यात्रा का समर्थन नहीं कर रहा था। यह बात उसी दिन स्पष्ट हो गई थी, जब संघ ने उन्हें लोकसभा से इस्तीफा देकर यात्रा पर जाने की सलाह दी थी। फिर भी यह फैसला आडवाणी ने क्या सोचकर किया, ईश्वर ही जाने; अथवा अनंत कुमार। संघ फैसला कर चुका है कि वह इस यात्रा में शामिल नहीं होगा। इसके बिना क्या किसी भी प्रदेश में स्वागत होगा? असंभव! लगता है आडवाणी के मन में भय बैठ गया है। कहीं उनकी पार्टी का युवा चेहरा प्रधानमंत्री नहीं बन जाए। उन्हे राहुल अथवा कांग्रेस से भय नहीं है। कांग्रेस उनको आगे निकलती दिखाई भी नहीं पड़ती। चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री बनते नजर आने लगे थे, तब मोरारजी ने स्वयं को आगे धकेला था और प्रधानमंत्री बन गए थे। हालांकि आडवाणी अब तक हर मोर्चे पर विफल ही रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने भी सी.बी.आई. को कुछ इस तरह काम में लिया था कि आडवाणी के भाजपा अध्यक्ष होते हुए चुनाव कराए तथा वाजपेयी प्रधानमंत्री बन गए। आडवाणी के लिए तो यह अन्तिम अवसर है। करो या मरो। अगले चुनाव तक पता नहीं क्या हो। रथ यात्रा के द्वारा स्वयं को देश के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयत्न कर लेना चाहते हैं। भाजपा एवं संघ दोनों के लिए विषम परिस्थिति है। आत्मघाती भी है। जो भी हो परिणाम देश के लिए भी सुखद नहीं होंगे। समय की चाल ही ऎसी है। सत्ता पक्ष सत्ता नहीं चला पा रहे। विपक्ष अपनी भूमिका नहीं निभा पा रहा। मतदाता के पास तीसरा विकल्प भी नहीं है।

इस स्थिति में आडवाणी के लिए उचित होगा कि वे ससम्मान इस दौड़ से बाहर निकल जाएं। अपनी महत्वाकांक्षा का बहुत पोषण हो चुका। अच्छा तो यह है कि आडवाणी अपनी यात्रा के निर्णय पर पुनर्विचार करें और त्याग दें। वर्ना इस बार कुछ बड़ा नुकसान हो जाएगा लोकतंत्र को। अब नई पीढ़ी को आगे लाने में सहायक बनें। जनता को उनमें अब कोई भविष्य नजर नहीं आता। कभी जनसंघ के लाड़ले रहे आडवाणी आज अनुशासनहीन (बिना अध्यक्ष की स्वीकृति के घोषणा कर देना) और बिगड़ैल नेता माने जाते हैं। इसमें संघ प्रमुख का भी बड़ा दोष है। संघ अभी भी हुंकार तो भरता है “जागो भारत” किन्तु खुद सोया हुआ है। लेकिन अब समय आ गया है, संघ के जागने का। देश नाना प्रकार के संकटों से घिरा है। सरकार घोटालों से घिरी है। किसी भी समस्या के समाधान पर ध्यान नहीं दे पा रही है। यहां तक कि साम्राज्यवादी एवं विस्तारवादी चीन की गतिविधियों एवं मंसूबों पर भी उसका ध्यान नहीं है। हर निर्णय के लिए अमरीका की ओर ताकती है। डरा-सहमा भारत महाशक्ति बनने का स्वप्न कैसे देखे? इसके विपरीत संघ एक राष्ट्रवादी संगठन भी है और सबसे बड़ा भी। वह भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। कन्नी तो काटता दिखाई देता है। क्योंकि वह भी कांग्रेस की तरह अपने पराए के चक्कर में पड़ गया है। इसीलिए भाजपा जैसी बड़ी विपक्षी पार्टी के शीर्ष पर संघ के स्वयंसेवक बैठे हुए हैं। उनके प्रति मोह संघ की दृष्टि को धुंधला किए हुए है।

यह भी कारण है कि संघ के बहुत से बच्चे बिगड़ैल हो गए हैं। गलत हरकतों में पड़े दिखाई देते हैं। आडवाणी, गडकरी इन्हीं के शीर्ष पुरूष हैं। संघ प्रमुख उनकी करतूतों को ढंकने की कोशिश में रहते हैं। शायद स्वयं भी लाचार हो गए हैं। प्रचारकों का राजनीति में दखल एवं सत्ता भोग आम बात हो गई हैं। अत: संघ के कार्यो की समीक्षा अनिवार्य हो गई है। संघ की कार्यपद्धति टीम भावना पर आधारित है। आडवाणी फे्रंच भाषा के शब्द “फेट एकम्पली” यानी फैसला लो और पार्टी पर थोप दो, पर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने ऎसे कई फैसले लिए हैं। संघ हर बार उनके सामने लाचार ही रहा है। पार्टी में काम कर रहे संघ के अधिकांश प्रचारक भी अब अपने-अपने स्तर पर ऎसे ही मनमाने निर्णय ले रहे हैं। जोड़-तोड़ करते हैं। तथ्यों के विपरीत रिपोर्ट संघ प्रमुख तक पहुंचाते हैं। इस सबमें संघ का आम स्वयंसेवक अपने आप को ठगा सा महसूस करता है। संघ को अब बड़े नेताओं के बजाय अपने लाखों स्वयंसेवकों को भरोसे में लेना चाहिए। उन्हीं की शक्ति से वह बिगड़ैलों को राह पर ला सकता है, देश को शक्तिशाली बना सकता है।

देश अब आडवाणी को नहीं गडकरी को देखेगा, जिनके हाथ में भाजपा की कमान है। यदि वे आज भी किसी व्यक्ति को पार्टी से बड़ा मानते हैं, देश हित में आदेश देने से डरते हैं, तो उन्हें भी पदभार किसी अनुभवी, साहसी और कत्तüव्यनिष्ठ नेता को सौंप देना चाहिए। देश सब कुछ सहन कर सकता है। दो में से एक बड़े राजनीतिक दल को व्यक्तिगत लिहाज के भरोसे नहीं छोड़ सकता। और यह भी स्वीकार्य नहीं कि इस पद पर बैठा व्यक्ति अपनी बात से चौबीस घण्टों में मुकर जाए अथवा शब्दों से खिलवाड़ करता रहे।

गुलाब कोठारी

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