Gulabkothari's Blog

सितम्बर 21, 2011

राजनीतिक चातुर्मास

हर वर्ष वर्षा ऋतु के चातुर्मास काल में पूरा देश व्रत-उपवास करता है। किन्तु इस बार यह परम्परा राजनीति में भी प्रवेश कर गई, यह देश के लिए नई घटना है और आश्चर्यजनक भी। किसी भी प्रदेश का मुख्यमंत्री, किसी भी कारण से, अपने ही प्रान्त में उपवास पर बैठ जाए, यह तो उपहास का कारण ही बनेगा। हुआ भी वही। लोग कम पहुंचे, तब भाजपा कार्यकर्ताओं को लाने की व्यवस्था करनी पड़ी। क्या मोदी के लिए इसका कोई अर्थ भी है या नहीं?

 

इसी घटना का एक कृष्ण पक्ष यह भी है कि लालकृष्ण आडवाणी अपनी यात्रा की चर्चा भी करवा गए। हालांकि बाद में यह समाचार रूकवा दिया गया। संघ और भाजपा दोनों की ही नाराजगी को धता बताकर अपने स्वभाव के अनुकूल अपना मत भाजपा पर थोप गए। मोदी के मंच के आगे आम जनता को नदारद देखकर इनकी समझ में आ गया होगा, कि इनकी यात्रा की गत क्या होगी। जरूरी नहीं कि भाजपा और संघ के कार्यकर्ता भी इनका साथ दें। आडवाणी को आज वार्ता के लिए नागपुर पहुंचना है। वहां वे पार्टी अध्यक्ष से तो मिलेंगे ही, संघ प्रमुख से भी मिलने का प्रयास करेंगे।

 

विश्व में किसी भी राजनेता के (लोकतंत्र में) अहंकार का यह चरम था। उनको तो पता भी नहीं चला होगा कि देशभर में क्या प्रतिक्रिया हुई। उनको तो वैसे सरोकार भी कहां है, इस बात से। एक अन्य घटना भी कोढ़ में खाज का काम कर गई। स्वयं नरेन्द्र मोदी ने शहर मुफ्ती के हाथ से टोपी पहनने से इनकार कर दिया। अल्पसंख्यकों को सीधे-सीधे कांग्रेस के खाते में शिफ्ट कर दिया।

 

चर्चा तो यह है कि यह मोदी के प्रचार प्रबंधकों की व्यवस्था का ही अंग था। सोमवार को एक समुदाय विशेष के लोगों को अलीगढ़ से ट्रेन भरकर दिल्ली जन्तर-मन्तर लाया गया। मोदी के विरूद्ध नारे लगवाए गए। ताकि बहुसंख्यकों का दिल जीता जा सके। दोनों नेताओं के स्वरूप, व्यवहार और अहंकार पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। भाजपा में भी हुई, संघ में भी हुई। दिल्ली में तो यहां तक चर्चा चल पड़ी कि आडवाणीजी कांग्रेस से मिल गए हैं। इसीलिए भाजपा के लिए आत्मघाती कदम उठाने जा रहे हैं। उधर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि, हमको तो इस पर सोचने की जरूरत भी महसूस नहीं होती।

 

ऎसा न हो पार्टी में बगावत के स्वर फूट पड़ें। यदि पार्टी को भी ऎसा लगने लगे तो आडवाणी की रथयात्रा उन्हीं के हवाले छोड़ देनी चाहिए। वे स्वयं ही संचालन करें और स्वयं ही खर्चा उठाएं। जनता के सिर बोझ लादने का अघिकार अब उनको नहीं दिया जा सकता। गडकरी में दम हो और अध्यक्ष के पद का महत्व बनाए रखना चाहते हैं तो आडवाणी को पार्टी से निकाला भी जा सकता है।

 

भाजपा को आज इस बात की चिन्ता नहीं है कि सी.बी.आई. जसवन्त सिंह के विरूद्ध जांच कर रही है, क्योंकि वे वित्त मंत्री रहे हैं, किन्तु चिदम्बरम के विरूद्ध कोई जांच नहीं? कहां खो गई भाजपा? किसी भी समस्या पर कोई क्रिया, प्रतिक्रिया नहीं! भावी दृष्टि भी नहीं! जो कुछ नाक के नीचे हो रहा है, वहां भी आंखें बंद! पार्टी में किसी को यह सोचने की भी फुर्सत नहीं बची कि, ऎसे में क्या-क्या हो सकता है?

 

शरद पवार, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता, डी.एम.के. आदि के साथ बैठकर मंथन किया जा सकता था। उनको सरकार से बाहर निकालकर नए नेता के नेतृत्व में नई सरकार का समर्थन करते। नेता चाहे नीतीश होते अथवा जयललिता होतीं। अगले चुनाव तक तो सरकार चल ही सकती थी!

 

क्या भाजपा को कांग्रेस की वर्तमान स्थिति का भान नहीं है? क्या सोनिया गांधी के स्वास्थ्य की अंदरूनी जानकारियां नहीं हैं? कांग्रेस भ्रष्टाचार के नाम पर जिस प्रकार घिरी हुई थी, क्या भाजपा के इन नाटकों ने टू-जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमण्डल खेल घोटाला जैसे मुद्दों को हल्का नहीं कर दिया है? क्या भाजपा नहीं जानती कि पेट्रोल के भाव बढ़ने के पीछे राज क्या है? जबकि भाजपा को कुछ समझ में नहीं आता, केवल आत्महत्या करने के, तो कौन रोक सकता है? मंचों पर खड़े होकर तालियां बजाना, नौटंकी करना, सामूहिक विवेक का निर्लज्ज प्रदर्शन आदि जनता को कुछ भी मंजूर नहीं है। सरकार देशहित को कहां नहीं देख रही, क्या विपक्ष देख रहा है? जनता तो नहीं मानती। जनता दु:खी है और जानना चाहती है कि देश में विपक्ष जीवित है या नहीं?

 

गुलाब कोठारी

 

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