Gulabkothari's Blog

सितम्बर 24, 2011

विरोध की भेंट चढ़ते सदगुण

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00

हर कार्य की निष्पत्ति से पूर्व कुछ न कुछ रोड़ा जरूर अटकता है। जैसे हर सड़क पर गति रोधक होते हैं। रोधक का ही नाम अड़चन है। रोध से ही अवरोध, विरोध आदि शब्द बनते हैं। अवरोध के कारण प्राकृतिक भी होते हैं, हमारे द्वारा निर्मित भी होते हैं। प्राकृतिक आपदाएं भी बाधाएं ही होती हैं। इनको पार करने के लिए चतुराई और साहस की जरूरत होती है। हां, कभी-कभी भाग्य भी आड़े आ जाता है। चूंकि भाग्य के निर्माता भी स्वयं हम ही होते हैं, अत: सारे अवरोध/विरोध के जनक भी हम ही होते हैं। हमारे काम में आने वाले अवरोध अलग, दूसरों के कार्यो में हमारे द्वारा पैदा किए जाने वाले अवरोध अलग होते हैं। कुछ अवरोध या विरोध लम्बे समय तक चलते हैं। सभी प्रकार के विरोध होते नकारात्मक ही हैं। विरोध सबसे बड़ा अवरोध होता है। इसमें प्रतिहिंसा, प्रतिरोध, प्रतिक्रिया अथवा अहंकार भी होता है। व्यक्ति उत्तेजित भी हो जाता है। विरोध प्रकट करने के तो स्वरूप भी कई प्रकार के होते हैं।

इनमें सामूहिक विरोध संकीर्णता का सूचक है। प्रवाह के साथ चलता है। भीड़ की मानसिकता के नियंत्रण में चलता है। अत: अन्त में स्वयं का ही नुकसान अधिक होता है। आज परिवारों में भी विरोध के स्वर आसानी से सुने जा सकते हैं। शादी के बाद भी पत्नी अब पति के साथ एकाकार नहीं होना चाहती। पति से अलग अपनी पहचान बनाए रखकर विरोध के स्वर को हवा देती है। पति के सम्मान को घटाकर भी अपने सम्मान को बनाए रखने की मुहिम के कारण उसके मन का स्त्रैण भाव, माधुर्य नष्ट हो जाता है। पौरूष्ा भाव का अहंकार उसका सुख सदा के लिए छीन लेता है। यही स्थिति साम्प्रदायिक स्तर पर देखी जा सकती है। नुकसान हमेशा विरोध करने वाले का अधिक होता है। जातिवाद, क्षेत्रवाद अथवा धर्म के विरोधों का तो यह देश अनेकों बार साक्षात् कर चुका है। आगे भी करता रहेगा। आरक्षण ने जाति आधारित विरोध की एक ऎसी आग देश में लगा दी है, जो देश को निरन्तर जलाती रहेगी। कैसी आश्चर्य की बात है कि जाति के या धर्म के नाम पर किस प्रकार देश की मुख्य धारा से कटकर भी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। मैं यदि कहता हूं कि मैं तो हिन्दू हूं या मुसलमान हूं या जैन हूं, तो मैं यह भी उद्घोष्ा करता हूं कि मैं बाकी सबसे अलग हूं। उनके लिए मेरे पास जगह नहीं है। किसी ने मेरे धर्म या जाति के खिलाफ कुछ भी कह दिया, तो तुरन्त मेरा शत्रु हो जाता है। मेरी बिरादरी यदि दो-तीन प्रतिशत ही है, तो भी मैं 97-98 प्रतिशत को शत्रु मानने को राजी हूं। उनके साथ जुड़ने का सपना तो राजनीति ने सदा के लिए तोड़कर रख दिया।
राजस्थान में गुर्जर-मीणा, हिन्दू-मुसलमान, राजपूत-जाट आदि के बीच कैसे-कैसे विरोध के स्वर फूटते रहे हैं। सारे निर्णय प्रवाह में लिए जाते हैं। यही कारण है कि ऎसी गतिविधियों का प्रभाव अगली पीढ़ी तक को भी भोगना पड़ता है। विरोध वैचारिक जड़ता का सूचक होता है। चाहे कर्मचारियों का सरकार के प्रति विरोध प्रकट करना हो, अथवा किसी समुदाय विशेष्ा का। हमारे संविधान में कई धर्म, सम्प्रदायों को अल्पसंख्यक की संज्ञा दी गई। किसी को भी बुरा नहीं लगा कि उसे शेष्ा भारत से अलग माना जाएगा। हुआ यह कि कई ने तो इस घोष्ाणा का स्वागत करते हुए जश्न तक मनाया। अपने ही देश में द्वितीय श्रेणी के नागरिक हो गए। इसका नुकसान यदा-कदा व्यवहार में झलकता भी है।

विरोध को यदि तुरन्त आपसी बातचीत से दूर करने का प्रयास नहीं किया, तो विरोध करने वाले को पीढियों तक नुकसान भोगना पड़ता है। विरोध कितना भी आक्रामक क्यों न हो, पूरी उम्र नहीं चल सकता। वह तो शत्रुता में बदल जाएगा। इसमें भी बड़ा नुकसान विरोध करने वाले का ही होता है। इसके घाव गहरे होते हैं, अत: क्षमा मांग लेने पर भी हरे ही रहते हैं। विरोध करने वाला अन्य समुदायों की नजर में भी गिर जाता है। सामाजिक सम्मान के मार्ग बन्द हो जाते हैं। रहना तो पूरी उम्र साथ पड़ता है। चाहे मोहल्ले में, चाहे गांव में। आज तो राजनीति में विरोध को ही प्राथमिकता मिलती है। उम्र भर का वैर बंध जाता है। सकारात्मक विचारों का मार्ग भी अवरूद्ध हो जाता है। समाज के चिन्तन में ईष्र्या-द्वेष्ा जैसे आसुरी भाव प्रवेश कर जाते हैं। समुदाय का निर्माण रूक जाता है। कभी-कभी यह भी होता है कि मैं मन ही मन किसी का विरोध करता हूं और उसके कोई फर्क ही नहीं पड़ता। किन्तु मैं तो तन-मन से बीमार हो जाता हूं। विरोध का विपरीत शब्द है सौहार्द। इसी से दिलों में मिठास बहता है। मन उदार होता जाता है।

विरोध में आक्रामकता होती है। एकपक्षीय दृष्टिकोण भी हो सकता है। स्वार्थ सिद्ध न हो तो भी विरोध जता दिया जाता है। सबसे बड़ी बात यह भी है कि विरोध का यथार्थपरक होना भी आवश्यक नहीं है। मन की अवधारणाओं, पूर्वाग्रहों और वातावरण मिलकर विरोध के स्वर को परिभाçष्ात करते हैं। इसमें क्रोध के जुड़ने से, द्वेष्ा की दिशा में व्यक्ति आसानी से भटक सकता है। क्योंकि संवेदना नहीं रहती। सामने वाले के प्रति अहित का भाव अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। विरोध के स्वर जब प्रखर होते हैं, तब हम शब्द शक्ति अथवा शब्द ब्ा्रह्म को भूल जाते हैं। हम भूल जाते हैं कि नकारात्मक शब्दों के प्रभाव से पानी में दुर्गध उत्पन्न हो जाती है। हमारे शरीर में 70 प्रतिशत पानी है। यह पानी हमारे नकारात्मक, हिंसक या मनश्छेदक शब्दों से विष्ौला होकर रक्त को रोगयुक्त बना देता है। आप जिसका विरोध करते हैं उसको शायद इसकी जानकारी भी नहीं होती। वह तो सदा स्वस्थ रहता है।

शब्द जब विरोध के डुबकी लगाते हैं, तब तामसिक हो जाते हैं। मन एवं बुद्धि को ढंक लेते हैं। आहार सारा तामसिक हो जाता है। विरोध क्रोध का संग्रहालय है। व्यक्ति के सदगुणों का ह्रास करके उसे पाशविक धरातल पर ले जाता है। ज्ञान के आइने में विरोध स्वयं के अज्ञान का सूचक ही दिखाई पड़ता है। इसका आधार परम्परागत भी हो सकता है, अज्ञान रूप भी हो सकता है, अपनी जीवन शैली अथवा अवधारणाओं पर भी आधारित हो सकता है। जब हम यह मानते हैं कि कोई हमारा अहित कर रहा है तब विरोध का भाव पैदा होता है। जब यह बात समझ में आ जाए कि मेरा भाग्य कोई नहीं बदल सकता, और न ही मैं किसी का भाग्य बदल सकता हूं, तब विरोध नहीं हो सकता। जो कुछ मुझे मिलता है, उसका कारण मेरे अलावा कोई नहीं हो सकता। यह विचार पैदा होते ही विरोध समाप्त हो जाता है। सृष्टि में अच्छा और बुरा नहीं होता। यह हमारे मन की उपज है। इसी प्रकार कर्म करने की इच्छा भी ईश्वर ही पैदा करता है। हम पैदा नहीं कर सकते। हां, कर्म जाना तो हमारे नाम से ही जाता है। इसीलिए हम किसी को अच्छा-बुरा कहने लग जाते हैं। राग-द्वेष्ा इसी से पैदा होते हैं। इससे मुक्त होने का मार्ग है क्षमा! पहले स्वयं अपनी आत्मा से क्षमा। फिर जिनको हम शत्रु मानते हैं। जिन लोगों ने हमारा अहित किया। इसके बाद उनसे क्षमा, जिनका हमने अहित करने का प्रयास किया। आहत किया, जिनके दिलों को ठेस पहुंचाई। वे भी हमें क्षमा कर सके, ईश्वर उनको ऎसी बुद्धि और शक्ति दे। तब अन्य प्राणियों से—मानव, पशु-पक्षियों से, पेड़-पौधों आदि से क्षमा मांगें। सारा अहंकार, जो विरोध का पर्याय था, गल जाएगा। मैत्री का सकारात्मक भाव जाग्रत हो सकेगा। आप किसी एक पौधे से नित्य मैत्री भाव के साथ बात करें। देखना, कितनी तेजी से बढ़ता है। फलता-फूलता है। विरोध जहां जीवन को नीचे गिराता है, वहीं मैत्री नए शिखर देता है। सेतु बनकर मनों को जोड़ता है। भाई-चारे का, संगीतमय जीवन का संदेश देता है। यही तो सब धर्मो का मूल है।
गुलाब कोठारी
पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

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