Gulabkothari's Blog

सितम्बर 25, 2011

विषैले पकवान

बिलाड़ा के सिविल न्यायालय ने शुक्रवार को जल संसाधन मंत्री महिपाल मदेरणा के विरूद्ध एएनएम भंवरी देवी से दुष्कर्म, अपहरण और हत्या की धाराएं जोड़ते हुए जांच करने के आदेश दिए। राजस्थान में किसका सिर ऊंचा हुआ? केवल उन सत्ताधीशों का, जो भंवरी देवी को अपने प्रतिशोध के लिए हथियार की तरह काम ले रहे थे। खेद की बात है कि इस मामले से जुड़े मंत्री और विधायक मलखान सिंह के परिवार राजनीति में पुराने और अनुभवी माने जाते हैं।

 अपने क्षेत्र में दोनों परिवारों की अपनी साख रही है। एक विधायक से अपने सम्बंधों के बारे में तो भंवरी देवी ने पुलिस से अपनी बेटी का डीएनए परीक्षण तक कराने की मांग की थी। इस घटना ने सब पर बट्टा लगा दिया। शर्म के मारे मदेरणा का परिवार तो जोधपुर में सरकारी घर छोड़ गया। जो तीसरा नेता सामने आया वह भी पूर्व में कांग्रेस का ही उपजिला प्रमुख था सहीराम। सत्ताधीशों की इस चारित्रिक गिरावट को क्या नाम दिया जाए, समझ में नहीं आता। इतने बड़े पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों पर इतने नीचे गिरकर अपने बच्चों जैसी प्रजा का यौन शोषण करने का आरोप लगे तो इनके तो धिक्कार का भी क्या असर पड़ेगा। ये तो पशु की श्रेणी से भी नीचे गिर गए।

 

 ऎसी घटनाओं से अनुमान लगाया जा सकता है कि क्यों राज्य में कन्या भ्रूण हत्या का वातावरण बना हुआ था। इसके आगे एन.डी. तिवारी का मामला बौना लग रहा है। ऎसा ही एक जघन्य काण्ड दिल्ली में हुआ था, जब सत्ता से जुड़े कुछ दरिन्दों ने नैना साहनी के शरीर के टुकड़े करके होटल के तंदूर में डाल दिए थे। भंवरी देवी काण्ड राज्य सरकार के लिए तो आत्मघाती ही सिद्ध होगा, क्योंकि इससे जुड़े सभी शीर्ष महापुरूष सत्ताधारी दल के हैं। सरकार अब तक मौन थी। अपराधियों को बचाने की ठान रखी थी। उसी के अनुसार पुलिस भी बहाने बनाती रही।

भला हो न्यायाधीश का, जिन्होंने इतना साहस दिखाया और सरकार की नाराजगी की चिन्ता न करते हुए वही किया, जो करना था। उनको साधुवाद। मदेरणा और विश्नोई पर लग रहे आरोपों के परिप्रेक्ष्य में सरकार से भी उम्मीद है कि वह तटस्थ व्यवहार करेगी, क्योंकि इसी समुदाय को सरकार भी बढ़-चढ़कर आगे लाने का प्रयास कर रही है। राजनीतिक नियुक्तियों से भी अनुमान हो जाएगा। कहां-कहां क्या-क्या लिहाज किए गए, कागजों पर हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों में और यौन शोषण के आरोपों में अन्तर है। इस सरकार में यौन उत्पीड़न के मामले भी बहुत सामने आए।

जो अधिकारी कह देता है, उसके आगे मंत्री किसी की सुनना ही नहीं चाहता। अभी एक शिक्षिका के तबादले को लेकर काम पड़ा, तो पता लगा कि राज्य के पश्चिमी जिलों में कार्यरत अध्यापकों का तबादला अन्य जिलों में हो ही नहीं सकता। पहले तो अफसरों ने कानून बना दिया। फिर हाईकोर्ट ने उस पर मोहर लगा दी। यानी वह शिक्षिका अपने पति और परिवार के साथ रह ही नहीं सकती। अपने प्रदेश में अपनी सरकार काले पानी जैसी सजा दे रही है।

 सबकी संवेदना मर गई। क्या यह यौन शोषण का तरीका नहीं है? एक-दो मामलों में तो मुझे स्वयं मुख्यमंत्री से सहयोग मांगना पड़ा। कौन देखता है कि महिलाओं के साथ कैसा हल्का व्यवहार करते हैं- ऊपर वाले। अब तो पुलिस जैसे विभाग में महिला कर्मचारियों के साथ बलात्कार होने लगे। कौन महिला आना चाहेगी सरकारी नौकरी में। क्या कोई महिला सरकार के “महिला सशक्तीकरण” के नारे पर विश्वास करेगी? प्रदेश भर में छाया हुआ और फलता-फूलता देह व्यापार भी दर्दनाक स्थिति है। इसका हिस्सा भी तो पुलिस के जरिए ऊपर तक जाता होगा। भंवरी देवी प्रकरण से एक चीख तो उठती है कि जिन लोगों ने उसकी मांसल देह का हंस-हंसकर भोग किया, क्या सोचकर उन्हीं लोगों ने उसे एक विष कन्या मानकर एक हिस्ट्रीशीटर के हवाले कर दिया। खुश भी हुए होंगे ये नर-पिशाच कि चलो सबूत भी दब जाएगा।

भंवरी देवी काण्ड कोई एक दिन में हुई घटना नहीं है। न ही पुलिस यह कह सकती है कि उसे इन गतिविधियों की जानकारी नहीं थी। इसका एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि सरकार के चहेतों को आपराधिक गतिविधियों के लिए संरक्षण प्राप्त है। पुलिस उनके कृत्यों को ढकने में सहायक होगी। कोर्ट तक में टालमटोल करती रहेगी। शायद यही कारण है कि एक के बाद एक मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरते जा रहे हैं और मुखिया हल्के से मुस्कराकर रह जाते हैं। बाबूलाल नागर, बीना काक, भरोसीलाल जाटव आदि नाम तो अब जनता की जुबान पर भी आ गए।

मुख्यमंत्री शायद अपनी ओर से पहल करके जनता को विश्वास में नहीं लेना चाहते। भले प्रतिक्रिया कुछ भी हो। यदि किसी भी मुद्दे के खिलाफ और वो भी भ्रष्टाचार, यौनाचार जैसे मुद्दों के विरूद्ध, तो यह सरकार का ही सार्वजनिक अपमान है। जनता के साथ अन्याय होता है तथा न्याय नहीं मिलता, तभी यह स्थिति बनती है। मामला किसी भी तहसील का क्यों न हो, प्रभाव पूरे प्रदेश में पड़ता है। क्या गोपालगढ़ की घटना का प्रभाव मात्र स्थानीय स्तर पर होकर रह जाएगा? एक बात और भी है। मुद्दा किसी नेता या अधिकारी से जुड़ा हो, नाम तो नेता (मुख्यमंत्री) का ही होता है। महिपाल मदेरणा ने देश भर में सरकार को सुर्खियों में ला दिया। कुछ और नेता तैयारी कर रहे हैं। समय किसी का सगा नहीं होता।

गुलाब कोठारी

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