Gulabkothari's Blog

सितम्बर 27, 2011

गले में घंटी

Filed under: Special Articles — gulabkothari @ 7:00
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जब भी किसी न्यायालय में सरकार के किसी विभाग से जुड़े प्रकरण पहुंचते हैं, तो अक्सर देखा जाता है कि उनके निपटारे में लम्बा समय लगता है और जब तक फैसला होता है, विषय स्वयं गौण हो जाता है। पिछले दिनों एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन सामने आया कि कुछ प्रकरणों में परिवादी सरकारी अघिकारी का पदनाम न लेकर उनके व्यक्तिगत नाम से मुकदमा दायर करने लगा है। अघिकारियों को नामजद किया जाने लगा है। मध्यप्रदेश हो, राजस्थान हो अथवा अन्य प्रदेश, इसका प्रभाव यह देखा गया कि इस कारण प्रशासनिक हलके में अफरा-तफरी तो मची, किन्तु जिस गति से क्रिया और प्रतिक्रिया सामने आई, वह इस देश के न्यायिक अध्याय में स्वर्ण रेखा का कार्य करेगी। अभी तक बड़े अघिकारी न्यायालय में पेश होने से बचते रहते थे। पद बदलने के साथ ही उनका उत्तरदायित्व स्वत: ही बदल जाता था। इस नई शैली मे मुख्य व्यक्ति ही नामजद होकर अन्त तक उत्तरदायी होगा। पदनाम गौण हो जाएगा।

 

 

आज भी कई अघिकारी अपनी गिरफ्तारी को लेकर फरार हैं। अपने कृत्य को स्वीकार भी नहीं कर पाते और न ही आत्म समर्पण कर पाते। मधुकर टण्डन और ए.के. जैन (ए.डी.जी.) तो बहुचर्चित उदाहरण हैं। निगरानी याचिका के जरिए अपने को बचाने की कोशिशों में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। पूरा सरकारी अमला इनको बचाने में जुट जाता है। पुलिस भी इनको ‘ढूंढ़’ नहीं पाती। कोर्ट की फटकार का असर होता ही नहीं।

 

कई अवमानना याचिकाएं चलती ही रहती हैं। राजस्थान सरकार ने तो लगभग एक साल पहले अघिकारियों/ राजनेताओं के विरूद्ध सभी आपराघिक मामले वापस ले लिए, जबकि कोर्ट इसके लिए मना कर रहा था। लोकतंत्र के इतिहास में यह घटना भी मील का एक पत्थर होगी। इस पृष्ठभूमि में अफसर पूरी तरह अपने को सुरक्षित मानकर चलता रहा है। समय के साथ अब हर स्तर पर न्यायालय भी करवट बदल रहे हैं। टू जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमण्डल खेल या कर्नाटक खनन प्रकरण इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। न्यायाधीश भी लीक से हटकर बड़े-बड़े अघिकारियों एवं राजनेताओं के विरूद्ध गिरफ्तारी वारण्ट जारी करने लगे हैं।

 

न्याय की दृष्टि से यही कदम उचित भी है और न्यायालय ने इसे कानूनी मान्यता देकर जनता को एक नया मार्ग दिखाया है। इसका अन्तर तो हो सकता है आगे की बहस में ही दिखाई भी पड़ जाए। न भी पड़े। किन्तु इतना प्रभाव तो भविष्य में दिखाई देगा कि कोई भी मुकदमा पद के विरूद्ध न होकर व्यक्ति विशेष के विरूद्ध होने लगेगा। न्याय सबके लिए बराबर है।

 

नामजद होने से नेता, मंत्री, अघिकारी आदि को सीधे नोटिस जारी किए जा सकते हैं, जिनके भी आदेशों पर हस्ताक्षर हो। भ्रष्ट व्यक्ति के बचने के मार्ग भी घट जाते हैं। सार्वजनिक सूचना भी उसके चरित्र की हो जाती है। बचने के कारण भी कई हो सकते हैं, किन्तु उनके सेवा के रिकार्ड पर मुकदमा अंकित हो जाएगा। विभिन्न पदों पर आसीन नेताओं तथा अघिकारियों के मन में डर तो रहेगा। जैसे गोपालगढ़ में एक पिता ने अपने पुत्र की हत्या के लिए अन्य के साथ भरतपुर के कलक्टर, एसपी के विरूद्ध भी मुकदमा दर्ज कराया है।

 

जिस प्रकार का प्रभाव नामजद मुकदमों का पड़ेगा, वैसा ही परिणाम पुलिस भी दे सकती है। नामजद गिरफ्तारी के मामलों में ढील बरतना, या गिरफ्तारी न करने का एक ही अर्थ होता है कि पुलिस अपराधी से मिल गई है या प्रभावित हो गई है। आम आदमी के लिए तो पुलिस ऎसा नहीं करती। इस पर रोक लगाकर राजनेताओं के प्रभाव में अपने सितारों (पदसूचक) को बट्टा लगने से बच भी सकती हैं।

 

नेता आते-जाते रहते हैं। उनका आदेश यदि जनहित में हो तो माना भी जा सकता है, किन्तु नितान्त निजी स्वार्थ अथवा अपराधी को बचाने में मानना अपनी ली हुई शपथ का ही अपमान होगा। ऎसी घटनाएं जीवन के उत्तरार्द्धकाल में मन को बहुत कचोटती हैं। हम सब पहले आदमी हैं, फिर कुछ और हैं। आइए, एक-एक करके हम सब इस तरह की मुहिम में जुड़ें। कुछ ही समय में वातावरण बदलने लगेगा। आने वाला समय कुछ और ही कहानी सुनाएगा नई पीढ़ी को। शुरूआत हो चुकी है।

 

गुलाब कोठारी

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