Gulabkothari's Blog

सितम्बर 28, 2011

प्रकृति : क्रंदन से मां का आह्वान

जब भी मुझे क्रोध आता है अथवा किसी को कष्ट देकर सुखी होना चाहता हूं, तब मैं रावण हो जाता हूं। जब गुरू के आगे बैठता हूं, तो पांव तले जमीन देखता हूं। राम और रावण दोनों मेरे ही भीतर हैं। एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों की आत्मा अभेद है। केन्द्र में दोनों के वही ब्रह्म और स्वरूप सारा माया भाव। राम भी माया भाव और रावण भी माया भाव। विद्या (धर्म-ज्ञान और वैराग्य-ऎश्वर्य) भी माया है और अविद्या (अज्ञान, अस्मिता, आसक्ति, अभिनिवेश) भी वही माया। यानी वही शक्ति रूपा मां जिसकी नवरात्र में पूजा करते हैं। हमारे अविद्या भाग का परिष्कार करके विद्या भाग को पोषित करने का प्रयास करते हैं।

 

 

राम का ममकार अथवा सीता के प्रति आसक्ति का भाव ही उन्हें रावण को भली भांति समझने में सहायक हुआ। हनुमान से परिचय, शबरी का माधुर्य अथवा सुग्रीव की मुक्ति तभी संभव हो पाई। रावण का होना समय-समय पर समाज में राम के स्वरूप की प्रतिष्ठा कराता रहता है। बिना कंस या शिशुपाल के कृष्ण की प्रतिष्ठा केवल रास से तो नहीं हो सकती थी। कंस तो वास्तव में कृष्ण को प्रकाशित करने के लिए पैदा हुआ था। तभी लोगों का ध्यान कृष्ण की ओर गया।

 

रावण कभी अकेला पैदा नहीं होता। उसके सारे नाते-रिश्तेदार भी साथ ही पैदा होते हैं, ताकि साधारण व्यक्ति भी लंका से परिचित हो सके। कृष्ण ने कहा था कि ईश्वर जिससे नाराज होता है, उसे खूब समृद्धि देता है, ताकि वह उससे (ईश्वर से) दूर हो जाए। नाना प्रकार के अनाचार में व्यस्त हो जाए। रावण पुलस्त्य ऋषि का वंशज होकर भी, शिव को प्रसन्न करके भी, अपने अहंकार को रोक नहीं पाया। वरना राम कैसे प्रकट होते। रावण को भी माया ही चलाती है। तब इस प्रकृति की शक्ति का अनुमान लगाना कठिन है।

 

व्यक्ति कदम-कदम पर भूल करता है। नित्य स्वाध्याय से उन पर विचार भी करता है। किन्तु परिवर्तन के लिए समय चाहिए। रावण को अपने भीतर पहचान सके। सीता को अशोक वाटिका में देख सके। अपनी विद्या को जाग्रत कर सके। जीवन-मृत्यु रूप नाभि (केन्द्र) पर ध्यान केन्द्रित कर सके। पंचकोश के आवरणों को एक-एक करके हटा सके। सारे अविद्या भावों को विद्या में बदल सके। तमस को सत्व में ढाल सके। अहंकार का रावण तमस ही तो है। सत्व भी मां है, तमस भी मां है।

 

इसी मां के स्वरूप को समझ कर तमस से सत्व की ओर बढ़ते हैं। राम के साथ लक्ष्मण, भरत आदि गुणवान शक्तियों का समूह रहता है। रावण के साथ मन्दोदरी भी हो सकती है, तो सूर्पणखां भी हो सकती है। मन्दोदरी उसे संयम पर टिके रहने को प्रेरित करेगी। सूर्पणखां आसक्ति भाव का पर्याय है। वह किसी की पत्नी बन जाए तो? सीता को राम पर दया नहीं आती, न स्वयं कभी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करती है। हर व्यक्ति के साथ यह माया भाव रहता है। सब लोग मिलकर व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब दिखाते जाते हैं। भीतर सबके वही ब्रह्म और माया है। प्रारब्ध है।

 

माया भाव का प्रथम रूप होता है क्षुधा अर्थात इच्छा (भूख लगना) अथवा अशनाया। माया ही इच्छा बनती है। हम अपने मन में इच्छा प्रकट नहीं कर सकते। इच्छा को पूरी कर सकते हैं अथवा छोड़ सकते हैं। पूरी करने के लिए हमारे पास दो मार्ग हैं- सतोगुणी (ऊध्र्वगामी) अथवा तमोगुणी (अधोगामी)। यही राम और रावण बना देता है व्यक्ति को। रजोगुण इनका विस्तार करता है, क्योंकि सत्व और तम दोनों ही गतिहीन होते हैं। रज ही इनको गति प्रदान करता है।

इच्छा को, इच्छा के कारणों को यदि समझ लिया, तो माया के केन्द्र तक पहुंचा जा सकता है।

 

ब्रह्म का विस्तार होता है मन, प्राण, वाक् रूप में और माया का विस्तार सत-रज-तम रूप में। अत: सर्वप्रथम इच्छा के स्वरूप को ही समझना आवश्यक है कि वह सतोगुणी है या तामसी। यह परिणाम से जुड़ी कामना ही धर्म रूप बन जाती है। एक मन तो होता है- अव्यय मन। किन्तु जिसे हम अपना मन कहते हैं वह आवरित मन होता है। एक कामना अव्यय मन की (कृष्ण की), एक कामना हमारे मन की। कामना मन का बीज है। अत: बीज के अनुरूप ही हमारी सृष्टि होती है। फल तो पेड़ के कारण नहीं आते, बीज के कारण आते हैं। पेड़ कर्म रूप है। फल कामना और उसके पीछे भावना पर आधारित है। इसी भावना के स्पन्दन से कर्म की दिशा तय होती है। भावनाओं के स्पन्दन ही अन्त:स्रावी गं्रथियों का नियंत्रण करते हैं। शरीर और मन की निर्माण करते हैं। इच्छाओं की दिशा तय करते हैं।

 

व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन कामनापूर्ति में ही व्यस्त रहता है। उसी में व्यक्ति अपनी सामथ्र्य का अनुभव करता है। कामना पूर्ति के कारण ही नई कामना भी पैदा होने लगती है। व्यक्ति के स्वभाव के अनुकूल ही उसकी वाणी और ज्ञान हो जाता है। हर सम्बन्ध के साथ व्यक्ति निजी पहचान बनाना चाहता है। अत: मूल में व्यक्ति एक होते हुए भी दिन-रात उसकी छाया बदलती रहती है। ये छाया ही आवरण बनकर बाहरी जीवन में उलझाए रहती हैं। अपनी भीतरी मूल संज्ञा को समझ नहीं पाता। दिशा तो विद्या/अविद्या से तय होगी। दिशा के अनुरूप ही शक्ति का विकास आघिभौतिक, आघिदैविक और आध्यात्मिक क्षेत्र में (भीतर भी और बाहर भी) होने लगता है।

 

माया भाव को समझने में पत्नी (जिसमें माया भाव अघिक हो) बड़ी सहायक सिद्ध होती है, यदि वह स्वयं को पति का अंग मानकर जीती है। पति को तृष्णा, लोभ, मोह, ईष्र्या, काम, क्रोध आदि अविद्या के घेरे से निकालकर दिव्य रूप में प्रतिष्ठित करती है। अपने सपनों का आराध्य बनाती है। यही भाव सम्बन्ध के अनुकूल हर आत्मा का होता है। यदि प्रेम से हम हर आत्मा को अपने साथ जोड़ते चले जाएं, तो हर व्यक्ति, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे तक हमारे विकास में सहयोग करते जान पड़ेंगे। हम प्रकृति के संगीत को सुन सकेंगे।

 

चूंकि हर व्यक्ति का आधा भाग माया है, अत: नवरात्र में व्यक्ति इस माया के स्वरूप को ही परिष्कृत करने का प्रयास करता है। भीतर माया यदि सत्व प्रधान हो गई तो बाहर की माया के साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जाएगा। प्रत्येक स्थूल क्रिया के पीछे अदृश्य एवं सूक्ष्म कारण होता है। वही माया है।

 

व्यक्ति सदा आहार-विहार के द्वारा पहले शरीर की शुद्धि करता है। योग एवं जप आदि से प्राणमय कोष को समभाव में लाता है। विचारों के प्रति जाग्रत होता है। सद्विचार, सत्संग, अनुष्ठान आदि से सात्विक स्पन्दन ग्रहण करता है। धारणा, ध्यान और समाघि के द्वारा माया के आवरणों से मित्रता बढ़ाता है, ताकि वे मित्रवत् सहयोग करें। बाधा न बनें।

 

व्यक्ति नित्य अपने संकल्प को दोहराकर उस पर ध्यान करता है। दिशा को सही रखने का प्रयास करता है। मां से मित्रता हो जाना ही अनुष्ठान का रहस्य है। वही आवरण डालती है, वही हटाने का मार्ग भी बताती है। वही बीच-बीच में परीक्षा भी लेती है कि व्यक्ति शक्ति प्रदर्शन में तो नहीं भटक गया है। यदि फेल हुआ, तो अगली कक्षा में जाने के मार्ग बन्द हो जाते हैं। आप धन और यश तो कमा सकते हैं, किन्तु स्वयं को कभी उपलब्ध नहीं हो पाओगे। अपना अर्द्ध भाग दूसरे अर्द्ध भाग से सामंजस्य नहीं बिठा पाएगा। अपने क्रन्दन से मां का आह्वान करें कि वह आए, अपने अंक में उठाकर पिता तक पहुंचा दे।

 

गुलाब कोठारी

पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक

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