Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 6, 2011

घर बैठे रावण मारिए!

भगवान महावीर, बुद्ध, महात्मा गांधी के साथ चलता हुआ अहिंसा का अभियान अन्ना हजारे के रूप में प्रकट हुआ। अहिंसा का व्यावहारिक स्वरूप यही है कि यदि किसी को ‘गुड़ देकर निपटा सकते हैं तो जहर देने की जरूरत क्या है’? अब बाबा रामदेव भी अहिंसक अभियान चला रहे हैं। गुर्जर नेता कर्नल बैंसला की घोष्ाणा भी अहिंसक आन्दोलन की हो चुकी है।

 

 

क्या सभी अहिंसक आन्दोलन राष्ट्रव्यापी जनाधार बना पाएंगे? कुछ प्रश्न नेतृत्व के प्रति विश्वसनीयता के भी हैं। बाबा रामदेव हों, लालकृष्ण आडवाणी हों, कर्नल बैंसला हों, इनके अभियानों का स्वरूप व्यापक जनाधार खो चुका है। मार खाए हुए सांप की तरह इनका अहंकार फुफकार रहा है। इनके ग्लानि-भरे शब्दों की दहाड़ नकली साबित हो चुकी है। इनके अभियान थोथे साबित होंगे, क्योंकि इनमें सत्य को स्वीकारने का साहस नहीं है। इनकी यात्राएं अथवा अभियान मुखौटे साबित होने वाले हैं। स्वच्छन्दता इनके जीवन की पर्याय बनती जा रही है। अन्ना हजारे की स्पर्द्धा में देश में क्रान्ति लाना चाहते हैं।

 

कई बड़े-बड़े नेताओं की आजकल पोल खुल रही है। उच्चतम न्यायालय ने भी करवट बदली है। कैग ने भी साहस एवं निर्भीकता का परिचय दिया है। आने वाले समय में देश का परिदृश्य भी बदलने वाला है। अगले चुनाव आते-आते तो लगने लगेगा कि देश फिर से जनता के हाथ में आ गया।

 

हमारा दर्शन कर्म एवं कर्म-फल का प्रतिबिम्ब है। आज हमारे नेता जिस तरह के कर्म करने में व्यस्त हैं, उनके फल भी उन्हीं को भोगने हैं। सत्ता के अहंकार में वे इस तथ्य को स्वीकार करें या न करें। जो नेता अब हमारे बीच नहीं हैं, उनके परिवारों पर दृष्टि डालना ही निश्चित हमारा मार्गदर्शन करेगा। कितने नेता कालेधन को भोग पाए? कितने नेताओं के पीछे खाने वाले भी नहीं बचे? जिनके पीछे बचे वे या तो उनकी ही पटरी पर चढ़ गए या अपराधी बन गए।

 

प्रश्न है कि किस प्रकार देश के नागरिक विकास के साथ जुड़ें। लगता है कि दवा के बजाय दुआ का सहारा लेना पड़ेगा। इससे अघिक अहिंसक आन्दोलन हो भी क्या सकता है! शब्द को भी इस देश में ब्ा्रह्म माना जाता है। असर होता है इसीलिए हर धर्म में प्रार्थना का विधान है। जप और अनुष्ठान किए जाते हैं। हवन में मंत्रों (सरस्वती) के द्वारा अर्थ (लक्ष्मी) की प्राप्ति के प्रयास होते हैं। हम भी किसी को शुभकामना देते हैं।

 

वरदान और अभिशाप की परम्परा शब्द की साधना एवं सामथ्र्य का ही प्रमाण है। इतनी बड़ी शक्ति जब हम में से प्रत्येक व्यक्ति के पास है, तब किसी भी आन्दोलन की आवश्यकता क्या रह जाती है? हम जहां हैं, जैसे हैं अपना प्रभाव डाल सकते हैं। कृष्ण कह गए हैं कि ममैवांशो जीव लोके। सबके भीतर बैठे हैं। कोई कम शक्तिमान नहीं है। कोई गरीब या लाचार नहीं है।

 

देश के निर्माण में और भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघष्ाü करने में सबकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। बिना किसी आवाज के, प्रदर्शन और हिंसा के। हम सब मिलकर भ्रष्टाचार को तथा जरूरत पड़े तो भ्रष्टाचारियों को भी मिटा सकते हैं। कुछ को तो देश अभी सड़ते हुए, तड़पते हुए, तकदीर की मार खाते हुए देख रहा है। इसी प्रकार जो हमारी तकदीर से खेलता है, बदलने को तैयार नहीं है, हम सब मिलकर उनकी तकदीर भी बदल सकते हैं। शर्त यही है कि प्रयास मन से हो, निरन्तर हो और संकल्प के साथ हो। तो आइए, हम मिलकर नित्य प्रार्थना करें कि—

 

‘हे आत्मा, हे परमात्मा, देश के सभी भ्रष्ट लोगों को, जीवों को, आत्माओं को सद्बुद्धि देना कि वे अपनी शक्तियों का मानव कल्याण के लिए उपयोग कर सकें। कर्म-फलों के प्रति सबकी जागरूकता बनी रहे। यदि कोई परिष्कार-सुधार करने को तैयार न हो, तो हे ईश्वर, वे तुम्हारा कोपभाजन बनें! उनकी हालत देखकर अन्य भ्रष्ट लोगों का साहस भी टूट जाए।

 

नए लोग भ्रष्टाचार से न जुड़ें। हम सबके मनों को देशभक्ति के धागे से, प्रेम और भाईचारे से बांधे रखना।’

अभी नवरात्रा में देशवासियों ने शक्ति पूजन का अनुष्ठान किया। ये जाग्रत शक्तियां ही सोए हुए देवों को जगाएंगी। हमारे भीतर का देव भी जाग उठे, फिर कभी न सोए! हर व्यक्ति भारतवष्ाü है। कुछ इण्डियन्स हैं। उनसे हमें भारत को बचाना है। संकल्प करें कि लक्ष्य प्राप्ति तक सतत चलते रहेंगे।

 

गुलाब कोठारी

 

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