Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 25, 2011

एक ही किरण

दीपावली का पर्व लक्ष्मी-उल्लू और अंधकार का है। उल्लू को प्रकाश में दिखाई नहीं देता। इसीलिए पर्व रात में ही मनाया जाता है। आज रोशनी आधार बन गई है पर्व के वैभव का, क्योंकि आज लक्ष्मी की परिभाषा भी बदल गई। अब केवल धन, दौलत, वैभव ही लक्ष्मी कहलाते हैं। इनको शास्त्रों में जड़ कहा है। इनके पीछे भागने वाले की चेतना भी जड़ हो जाती है। जड़ रूप लक्ष्मी उल्लू पर बैठकर जब आती है, तब व्यक्ति तामसिक प्रवृत्तियों की ओर मुंह करता है। संसार के सारे कुकर्म, तामसिक व्यवहार तथा अज्ञान के अहंकार का एक ही आश्रय है-अंधकार। आध्यात्मिक जीवन से कोसों दूर। यही कारण है आज की वैश्विक  अर्थदशा का।

 

 

आज विश्वभर में आर्थिक संकट है। त्राहि-त्राहि मची है। सैकड़ों शहरों में जनता सड़कों पर उतर चुकी है, क्योंकि लोग लक्ष्मी के जड़ भाग के पीछे दौड़ रहे हैं। अगले आठ-दस वर्षो की आय उधार लेकर अग्रिम खर्च कर चुके हैं। विकसित देशों के दबाव में उनके आश्रित देशों ने भी नकल करनी शुरू कर दी। नई व्यापार-विपणन प्रणाली, अनावश्यक के प्रति आकर्षण, बचत के विपरीत जीवन शैली तथा जीवन में स्थायित्व का अभाव उनके कष्टों का कारण बन गया। समाज की संरचना इसी क्रम में टूट गई। व्यक्ति एकल परिवार के रूप में अकेला पड़ गया। किसी के लिए जीना, संघर्ष करना तो भूल ही गए।  एक बेहोशी की अवस्था में व्यक्ति यंत्रवत् चलने लगा।

 

हम आज भी टिके हैं। हमारी काली कमाई विदेशों में जमा होकर सड़ रही है। भ्रष्टाचार है कि रूकने का नाम ही नहीं लेता। काली कमाई और सामन्तवादी लोकतंत्र ने महंगाई पर लगाम लगाना ही छोड़ दिया है। उसके बाद भी यह देश सोने की चिडिया ही बना हुआ है। दुनिया भर के उद्योगपति यहां आ चुके। हमारे बन्द हो चुके ‘ब्राण्ड्स’ के नाम पर या किसी बहाने एक रूपए के माल के पचास रूपए लेकर अपने देश का विकास करने में लगे हैं। दैनिक उपकरण, प्रसाधन क्या नहीं आया।

 

और कारें? जो कुछ अपने देश में नहीं बेच पा रहे, यहां आकर बेच रहे हैं। अब तो खुदरा व्यापारियों को भी बुलाया जा रहा है, ताकि भारत पूरी तरह लूट लिया जाए। हमारे जनप्रतिनिघि ही देश को बेचने में, फिर से आर्थिक गुलाम बनाने में लगे हैं। देश के सामने, विशेष कर नई पीढ़ी के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। शिक्षा उसे सब्जबाग तो दिखा रही है, किन्तु भ्रष्टाचार के कारण बेरोजगारी का ताण्डव भी उतना ही बड़ा है।

 

आधुनिक व्यापारिक ढांचे से, लाभ की नई अवधारणा से, स्पर्घा और प्रतिस्पर्घा से, धन की तृष्णा के ताण्डव से और इसके कारण बढ़ती अपराध प्रवृत्तियों से जन-जन दु:खी है। व्यापार अब शुद्ध धन आधारित हो गया। बड़े वेतनमान की शर्ते भी लाभ के साथ जुड़ी हैं। रास्ता कोई भी पकड़ा जा सकता है – नैतिक या अनैतिक। मुनाफे की सीमा ही समाप्त हो गई। मानसिकता अभावग्रस्त हो गई। प्राप्ति का सुख किसी को नहीं रहा।

 

अप्राप्य की ओर, दिशाहीन होकर भाग रहे हैं। हर कोई असंतुष्ट है। अमीर-गरीब की खाई बढ़ती जा रही है। हर देश की सरकार गरीबों के सहारे बनती है और नीति-निर्घारण अमीरों अथवा विकसित देशों को ध्यान में रखकर किया जाता है। यही बढ़ते भ्रष्टाचार का मूल कारण भी है और सार्वजनिक जीवन में इसी कारण नैतिकता का पतन भी हो रहा है। लक्ष्मी के वाहन की अंधकार-यात्रा स्पष्ट रूप में दिखाई दे रही है। स्वयं लक्ष्मी जड़ है, निष्क्रिय है। इसकी गति एवं दिशा उल्लू ही तय करता है।

 

लक्ष्मी के बढ़ते प्रकोप ने सरस्वती को (शिक्षा को) भी स्पर्घा की आग में झोंक दिया। नम्बर महत्वपूर्ण हो गए, बच्चा मशीन बन गया। व्यक्तित्व गौण हो गया। चार में से एक सही उत्तर ढूंढ़ने की कोचिंग दिलाई जा रही है। सवालों का जीवन से जुड़ा होना जरूरी नहीं है। इस पढ़ाई में उतरने के लिए भी ऋण लेना पड़ता है, ब्याज देना पड़ता है। खाएगा क्या? इन सबके जो परिणाम सामने आ रहे हैं, वे ही आर्थिक दुर्दशा के कारण हैं। शिक्षा के उद्देश्य को बदलना ही निराकरण का एकमात्र मार्ग है।  शिक्षा को रोजगार के साथ-साथ व्यक्तित्व निर्माण से भी आवश्यक रूप से जोड़ना होगा। जहां सरस्वती का वास नहीं है, वहां लक्ष्मी नहीं रह सकती – स्थायी भाव में। बांधने की कोशिश की तो खानदान को ही ले डूबेगी।

 

अत: हमें देश को ज्ञान का मार्ग उपलब्ध कराना चाहिए। धर्म के स्थान पर सम्प्रदाय निरपेक्ष बनाना चाहिए। तब देश के युवा आसानी से एक मंच पर आ सकेंगे। दीप से दीप जलेगा। स्वतंत्र चेतना का नया युग शुरू हो सकेगा।

 

रोशनी की ऎसी ही एक किरण निकली है-सूचना का अघिकार। इसके आगे तीनों स्तंभ भी लाचार और मीडिया भी। सफेदपोश लोगों के काले-चेहरे तेजी से उजागर होने लगे। नामीगिरामी सत्ताधीश जेल जाने लगे। राजनेताओं में हड़कम्प मच गया।

 

कई जगह सूचना देने से इन्कार भी किया गया, चुप्पी साधकर बैठने का प्रयास भी किया, डराने-धमकाने की शिकायतें प्राप्त हुइंü, किन्तु अन्त में अघिकांश लोगों को सफलता हाथ लगी। यह सरकारों को, नेताओं तथा अघिकारियों को रास नहीं आ रहा। अब रह-रहकर यह आवाजें उठ रही हैं कि इस कानून पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। जनता के लिए बड़ी चुनौती है। हम सबको मिलकर इसका सामना करना चाहिए और सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि कोई भी सरकार ऎसा नहीं कर पाए।

 

तो उठो, मेरे नौजवान दोस्तो! एक बार फिर नए सिरे से इस आजादी की जंग का बिगुल बजाएं। आपके शंखनाद से वैश्विक भ्रष्ट ताकतें कांपने लगें। देश के भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने का संकल्प करें! फिर देखें सरस्वती का चमत्कार। सरस्वती से ही लक्ष्मी पैदा होती है। हम सरस्वती से जुड़ें। हमारा संकल्प यदि दृढ़ है तो लक्ष्मी बरसेगी। उसको लाना है, चिरस्थाई बनाना है, उसका सामूहिक उपभोग करना है और लक्ष्मी चोरों (भ्रष्टों) को नंगा करके हम सड़क पर ले आएं। हमारे पास सूचना का अघिकार जैसा ब्रह्मास्त्र है।

 

आज हम सबको मां लक्ष्मी-सरस्वती तथा गणपति की साक्षी में एक संकल्प कर लेना चाहिए कि साल में कम से कम दो बार सूचना के अघिकार का उपयोग करेंगे। ईश्वर हमें शक्ति देगा और राजनेताओं को सद्बुद्धि, ताकि कोई हमारे इस अघिकार को दबाने का कुत्सित प्रयास भी न करे। कुछ घरों से मुक्त होकर लक्ष्मी हर घर में प्रतिष्ठित हो।

 

गुलाब कोठारी

 

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