Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 29, 2011

इस लोकतंत्र के लिए

प्रतिष्ठा में,
मुख्य चुनाव आयु्रक्त
भारत सरकार
मान्यवर,
आज देश में हमारे जनप्रतिनिधि जिस प्रकार लोकतंत्र की धçज्जयां उड़ा रहे हैं, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं, जिस प्रकार क्षुद्र स्वार्थो के लिए देश के भविष्य को गिरवी रख रहे हैं, अलग-अलग नीतियों की आड़ में तथा वोट की राजनीति से देश को खंड-खंड कर रहे हैं तब आम नागरिक क्यों मायूस नहीं होगा। न रोजगार, न शिक्षा, न स्वास्थ्य, न कोई समानता एवं सम्मान का भाव। अपने ही देश में पराया बनकर जी रहा है हर एक भारतवासी!

समय करवट बदलता दिखाई पड़ रहा है। न्यायपालिका ने, विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय ने देश का नए सिरे से विश्वास जीतना शुरू कर दिया है। उच्च न्यायालयों की स्थिति अभी कई प्रदेशों में स्पष्ट नहीं है। लेकिन जिस प्रकार कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने केंद्रीय मंत्रियों, सत्ताधीशों के कार्यो का विवरण निर्भीकता एवं निष्ठा के साथ देश के समक्ष रखा, सिर आंखों पर बिठाने के काबिल है। इस कार्य ने भी न्यायपालिका को प्रेरित किया है। दोनों संस्थाओं ने मिलकर देश में फिर से नया वातावरण बनाना शुरू कर दिया है।

हां, लोकायुक्त संस्था इस दृष्टि से अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाई। बल्कि न्यायपालिका के मुंह पर तो स्याही ही अधिक पोती है। राज्य सरकारों से अपेक्षा रखने वाले लोकायुक्त कभी सरकार के विरूद्ध कार्य नहीं करते। विशेष रूप से मंत्रियों एवं मुख्यमंत्री के विरूद्ध। दूसरी ओर देश में लोकपाल बिल को लेकर अभियान चल रहे हैं। बिल के प्रारूप पर गहन चिंतन-मनन तो पहले ही हो जाना चाहिए।

चुनाव आयोग का स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण है तथा आपकी छवि भी उपरोक्त दोनों संस्थाओं के शीर्ष पुरूषों जैसी उज्वल ही है। अत: चुनाव सुधारों की दृष्टि से, परोक्ष प्रभाव की दृष्टि तथा कानूनों की व्याख्या की दृष्टि से आपकी भूमिका अतीव महत्वपूर्ण है और लोकतंत्र को सही दिशा में ले जा सकती है।
इनमें एक मुद्दा तो सीटों के आरक्षण का है। आरक्षण का प्रतिशत तो सरकारें तय करती हैं, किंतु लागू करना तो आपके नियंत्रण में होता है। आज तो सीटों को ही आरक्षित कर दिया गया है। कुछ महिलाओं के नाम पर, तो कुछ अजा-जजा के नाम पर। कहीं अल्पसंख्यक दिखाई देते हैं। क्या आप इसको शेष देशवासियों का अपमान नहीं मानते? क्या आदिवासी क्षेत्रों में गैर आदिवासी नहीं रहते? क्या पूरी उम्र वे अपने अधिकारों से वंचित ही रहेंगे? जिन सीटों को महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया है, क्या वहां के आधे (पुरूष) मतदाता कभी चुनाव लड़ने का सपना नहीं देख पाएंगे?

अब महिला आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाने की बात चल रही है। पांच-पांच साल के लिए बारी-बारी से आरक्षण किया गया, तो अगली बारी दस वर्ष बाद आएगी। क्या न्याय की दृष्टि से यह उचित है? अथवा हर बार हर मतदाता एवं राजनीतिक दल के लिए अवसरों की उपलब्धता यथार्थपरक होगी? आपसे आग्रह है कि इस बारे में अपनी स्पष्ट राय से सरकार को अवगत कराते हुए सभी कानून, नीतियां दलों की सूचियों पर क्रियान्वित कराएं। सीटों पर नहीं। हर दल की सूची में श्रेणीवार प्रतिशत रहना चाहिए। सीटें मुक्त रहनी चाहिए। यदि महिलाओं का प्रतिशत 33 प्रतिशत है, तो सूची में एक तिहाई नाम महिलाओं के रहने चाहिए। चुनाव किसी भी सीट से लड़ सकती हैं। दल तय करें, सरकार या चुनाव आयोग तय नहीं करें। तब किसी नागरिक को अपमानित नहीं होना पड़ेगा।

इसी प्रकार अपराधियों द्वारा चुनाव लड़ने का मुद्दा है। जेल में सजा काट रहे अपराधी चुनाव लड़ते रहें, जनप्रतिनिधि बनने के योग्य मान लिए जाएं, ये तो लोकतंत्र, जनता तथा चुनाव आयोग की गरिमा के अनुकूल नहीं है। तब चुनाव प्रक्रिया का ही अपराधीकरण क्यों नहीं होगा? क्यों चुनाव संबंधी इतनी याचिकाएं न्यायालयों में पहुंचती हैं और क्यों इनका निपटारा छह माह में नहीं होता? न्यायपालिका को जबरन पार्टी बनने पर मजबूर किया जाता है। प्रदेशों के अधिकतर चुनाव आयुक्त एवं न्यायालय सत्तापक्ष से प्रभावित रहते हैं। वे झूठी जानकारियां देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं। प्रत्याशी स्वयं अपराधी है और सूचित नहीं करता, संपत्ति का ब्योरा गलत दे रहा है, चुनाव अधिकारी यह सब जानता है। चुनाव खर्च को आंखों से देखता है, रिकॉर्ड भी करता है, किंतु सत्ता के प्रभाव में कोई कार्रवाई नहीं करता। लोकतंत्र की हत्या होती जाती है। तब क्यों अच्छे लोग आकर चुनाव लड़ेंगे? यही इस देश की सबसे बड़ी त्रासदी है। देश आपकी ओर भी देख रहा है। आप, कैग एवं मुख्य न्यायाधीश यदि ठान लें तो फिर से यह देश आजादी की हवा में श्वास ले सकेगा।
गुलाब कोठारी

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