Gulabkothari's Blog

अक्टूबर 30, 2011

वैराग्य-2

जी वन के मुख्य मार्गो में वैराग्य भी एक राजमार्ग है। मोक्ष चाहने वाले हर एक पुरूषार्थी को इस मार्ग से गुजरना ही पड़ता है। जीवन की शुरूआत कामना एवं कर्म से होती है। कर्म तो अन्त समय तक साथ रहता है, किन्तु कामना को संकल्प एवं ज्ञान के सहारे छोड़ा जा सकता है। निष्काम कर्म को ही वैराग्य कहा जाता है। जो जीवन अर्थ और काम पर टिका हो, जो शिक्षा शुद्ध ज्ञान पर टिकी हो, वहां न वैराग्य है और न ही मोक्ष की अवधारणा। विद्या और पुरूषार्थ दोनों ही धर्म पर टिके हैं। विद्या में धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऎश्वर्य है। पुरूषार्थ में-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष है। विद्या का लक्ष्य आनन्द है। ब्रह्म है।

 

 

पुरूषार्थ का लक्ष्य कर्म है। वैराग्य का अर्थ है कर्म को ब्रह्म (अकर्म) में बदलना। इसके लिए संन्यास लेने की आवश्यकता नहीं है। विवेक की जरूरत है। प्रज्ञा के जागरण की जरूरत है। भीतर के संसार से निरन्तर जुड़े रहने की जरूरत है। जो कुछ घट रहा है, उसका ‘क्या’ न देखकर ‘क्यों’ घट रहा है, देखने की जरूरत है। अर्थात जिस मार्ग पर चलते-चलते व्यक्ति रागी बनता है, उसी मार्ग से लौटकर बेरागी बनना होता है। होश आने के साथ ही कामनाओ का घेरा बढ़ता जाता है। मृग तृष्णा की तरह व्यक्ति कामना पूर्ति के लिए भागता रहता है।

 

शिक्षा ने अर्थ को कामना के शीर्ष पर रख दिया। धर्म के बिना अर्थ भी जीवन को प्रवाहमान ही बनाता है। नियंत्रण, मर्यादा, निषेध आदि शब्द अर्थ के आगे ठहर नहीं पाते। अनर्थ रह जाता है। कामनाओं में राग-द्वेष का प्रवेश हो जाता है। लोभ अनाचार में उलझा देता है। व्यसन घेर लेते हैं। कामना पर्याय है माया का। अर्थ को भी लक्ष्मी/ माया ही कहा जाता है। व्यक्ति की आंखों पर मोह का चश्मा चढ़ता जाता है। व्यक्ति स्वयं से दूर होता चला जाता है। वैराग्य में तो माया भाव से कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ता है। जीवन माया भाव के बीच से गुजरने का ही नाम है। अर्थ-काम के सागर में गोते लगाते हुए पार निकल जाने का नाम है। धर्म के कंधों पर सवार होने पर यह कार्य निश्चित होता है, किन्तु संघर्ष एवं दृढ़ संकल्प मांगता है।

 

जिस जीवन की शुरूआत ही भोग को लक्ष्य बनाकर होती है, वहां वैराग्य का प्रवेश वर्जित होता है। ईश्वर का ‘एकोहं बहुस्याम’ हमारे जीवन में विवाह बन कर उतरता है। तब इस बहुस्याम के भाव को वैराग्य में रूपान्तरित कर देना आज की आवश्यकता तो नहीं है। सहज साध्य भी नहीं है। तुष्टिकरण के साथ तृष्णा भी रहती है। छाया भी रहती है। आसुरी रूप भी (तमस) रहता है। मन की कमजोरी, विकल्पों की भरमार, सभी तो वैराग्य के शत्रु हैं। कौरव सेना की तरह अनन्त दिखाई पड़ते हैं। कुछ आकर्षित भी करते हैं, तो कुछ भयभीत भी करते हैं। इस मार्ग से व्यक्ति नींद में कैसे गुजर सकता है। सदा जाग्रत रहना पड़ेगा ही।

हठ योग का नाम भी वैराग्य नहीं है। दमन का मार्ग भी वैराग्य का शत्रु ही होता है। आज जब अघिकांश धर्म निषेधात्मक बनते जा रहे हैं, तब व्यक्ति के लिए जीना कठिन हो जाता है। निषेध स्वयं एक जिज्ञासा पैदा कर देता है मन में। किसी बच्चे को निषेध करके देख लीजिए, अवसर मिलते ही पहले निषेध भंग करेगा। निषेध शान्त व्यक्ति को अशान्त कर देता है।

 

इस निषेध का घातक प्रभाव वहां देखिए, जहां बच्चों को छोटी उम्र में संन्यासी बना देते हैं। जो जीवन को देख नहीं पाया, समझ नहीं पाया, भोग नहीं पाया, उस पर निषेध का क्या प्रभाव होगा? क्या यह निषेध ईश्वर के नियमों के पार जा सकता है? क्या सात जन्मों के बन्धन इस निषेध से टूट सकते हैं? क्या प्रारब्ध बदला जा सकता है- दो व्यक्तियों का प्रारब्ध एक व्यक्ति के संकल्प से बदल सकता है? दमन का यह मार्ग जीवन को आनन्दित कर सकता है?

 

दमन एक विस्फोटक प्रक्रिया का नाम है। हर व्यक्ति अज्ञान के कारण इस मार्ग पर चला जाता है। परम्पराएं, धर्म, सम्प्रदायों के नियम भी दमन को हवा देते हैं। घूंघट निकालना क्या है। क्या हर स्त्री प्रसन्न है घूंघट निकालकर? पीहर जाकर हो सकता है वह स्त्री सिर भी नहीं ढके। प्रतिक्रिया का ही स्वरूप है यह। हर प्रकार के दमन की प्रतिक्रिया होती है। दुनिया के सारे व्यभिचार प्रतिक्रिया स्वरूप पैदा होते हैं। किसी भी भाव को दबाना शत्रुता है। वैराग्य तो मित्रता का मार्ग है।

 

मित्रता के लिए प्रेम चाहिए, शत्रुता का आधार अहंकार है। क्रोध है। हर समाज में प्रेम के मार्ग में भी अनेक निषेध हंै। जो व्यभिचार का मार्ग प्रशस्त करते हैं। समाज के निषेध प्रकृति के आगे घुटने टेक देते हैं। क्रोध- अहंकार तो आसुरी भाव ही है। जिस समाज में आसुरी भाव के साथ-साथ दैविक भाव पर भी निषेध हो, वहां समृद्धि खत्म ही समझो। वहां सारे व्यक्तित्व कुण्ठित अथवा आपराघिक ही नजर आएंगे। अधूरी कामना व्यक्ति को अघिक भटकाती है। उसे भूल पाना व्यक्ति के लिए कठिन होता है। भगवान चाहे याद आए या न आए, शत्रु का चेहरा सदा आंखों में रहता है। तब कैसे व्यक्ति कामना पार होकर वैराग्य में प्रवेश कर सकता है। वह तो उम्र भर निषेध तोड़कर कामना पूर्ति के लिए संघर्ष ही करेगा/करेगी।

 

वैराग्य का मार्ग संघर्ष का नहीं हो सकता। शत्रुता का नहीं हो सकता। वह तो प्रेम का मार्ग ही है। धर्म आधारित मार्ग है। धर्म भी प्रकृति से बाहर नहीं जा सकता। प्रकृति ही माया है। माया को समझना ही धर्म का मार्ग प्रशस्त करता है। माया के भाव को, इसके प्रभाव को, इसकी नश्वरता को समझ लेना ही स्वयं को मुक्त करना है। यह समझ लेना ही तो मित्रता का रूप है। दबाना शत्रुता है। क्योंकि दबा हुआ भाव अवसर पाकर कब फट पड़ेगा, पता भी नहीं चल पाएगा। कोई शक्ति उसे रोक नहीं पाएगी। जीवन में बड़ा अनर्थ कर जाता है। मित्रता में अनर्थ नहीं है। यदि क्रोध, लोभ, ईष्र्या, अर्थ, काम आदि का यथार्थ स्वरूप समझ में आ जाए तो जीवन में इनका प्रभाव स्वत: समाप्त हो जाता है।

 

मन में उठने वाली इच्छाओं को कभी-कभी अन्य प्राणियों की इच्छाओं के साथ भी मिलाकर देख लेना चाहिए। उनका अर्थ जल्दी समझ में आ जाता है। पशु के मन की इच्छाएं केवल भोग योनि की होती है। मनुष्य पशु की तरह जीना नहीं चाहता। वह अनेक इच्छाओं को तो इसीलिए छोड़ देगा कि वह पशुता का पर्याय नहीं दिखना चाहता। कई इच्छाओं की पूर्ति अन्त में घातक भी सिद्ध होती है। कुछ इच्छाएं जीवन में मिठास घोलती हुई भी जान पड़ती हैं। तब एक बात स्पष्ट हो जाती है कि वैराग्य का अर्थ भागना नहीं है। कामना से मित्रता करना है। धर्म के चश्मे से, ज्ञान की पुस्तकों में अर्थ और काम को जीना भी है और उनके प्रभाव को भी निष्प्रभावी करते जाना है। ताकि उनसे प्राप्त होने वाले फलों से कर्मो को दूर कर लिया जाए। कर्म अकर्म हो जाए।

 

गुलाब कोठारी

 

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