Gulabkothari's Blog

नवम्बर 27, 2011

माधुर्य

Filed under: Spandan — gulabkothari @ 7:00
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जी वन में सबकी एक ही कामना होती है-सुख की प्राप्ति। इसके लिए हर व्यक्ति दुख से बचने का प्रयास करता रहता है। उसे यह भी नहीं मालूम कि सुख-दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि सुख के चक्कर में दुख से मुक्त हो गए तो सुख से भी मुक्त हो जाओगे। सुख को पाने के लिए दुख के मध्य से संघर्ष करते हुए, तपते हुए ही गुजरना पड़ता है। तभी सुख और दुख का स्वरूप भी समझ में आता है और सुख की कीमत भी। वास्तव में दुख जीवन की परीक्षा है और सुख उसमें तपने का परिणाम। एकपक्षीय जीवन तो संभव ही नहीं है। हां, जीवन के इस द्वैत से बाहर निकलने पर संभव है।

 

 

इसी प्रकार कर्म है और उसी के अनुरूप कर्मफल का सिद्धान्त है। इसी कर्मफल के डर से व्यक्ति अच्छा कार्य- व्यवहार करने का प्रयास करता है। सारे कर्मो का मूल आधार विषय का ज्ञान तथा फल की इच्छा होते हैं। ज्ञान और इच्छा भाषा मूलक है। इनकी शब्दों में व्याख्या हो सकती है। इनका प्रभाव क्रिया रूप होकर फल तक चलता है। क्रिया की दिशा इच्छा के स्वरूप पर भी निर्भर करती है। मन यदि प्राण-वाक् से जुड़ता है तो क्रिया की दिशा अलग होगी। मन यदि विज्ञान-आनन्द से जुड़ता है तो क्रिया की दिशा विपरीत या ऊध्र्वगामी होगी।

 

इसका निर्घारण इच्छा से नहीं होता। ज्ञान से भी नहीं होता। इसका निर्घारण भावना अथवा नीयत, मंशा से होता है। मंशा आंखों में दिखाई पड़ती है। मन का दर्पण होती हैं आंखें। चेहरे पर भी एक प्रतिबिंब होता है भावना का। अच्छे भाव वाले व्यक्ति के चेहरे पर सदा एक मुस्कान भी रहती है। मुस्कान मन की निर्मलता का प्रतिबिंब ही है। मानवता की श्रेष्ठता का प्रमाण है।

 

इसी के कारण वाणी का माधुर्य व्याप्त रहता है। मधु अथवा रस का नाम माधुर्य है। इसमें आनन्द भी है, बन्धन भी है और मुक्ति का मार्ग भी जुड़ा है। प्रवृत्ति भी है और निवृत्ति भी। अज्ञान के कारण राग को ही सुख मान लिया जाता है। वहां इस सहज मुस्कान के दर्शन नहीं होते। ज्ञान के अभाव में माधुर्य नहीं होता। हम अपने कर्म और उनके फल का स्वयं आकलन कर सकते हैं।

 

माधुर्य शब्दों में भी सुनाई देता। शब्द चूंकि ब्रह्म है, अत: वही सृष्टि में परिणामों का कारक भी है और वाहक भी। शब्दों के माध्यम से यदि हम मिठास बांटेंगे, तो हमे भी मिठास ही मिलेगा। यह निश्चित है। प्रकृति वही लौटाती भी है जैसा हम देते हैं। जैसा वर्तमान, वैसा ही भविष्य। मिठास जीवन को विस्तार देता है। रस है पर्यायवाची ब्रह्म का। रसौ वै स:। जहां ब्रह्म है, वहां आनन्द निश्चित है। मुस्कान, मिठास जीवन में ब्रह्म की प्रतिष्ठा का प्रमाण है। इनकी निष्पत्ति प्रेम में होती है। जहां प्रेम है, वहां लेन-देन नहीं है। व्यापार नहीं है। बस देना ही देना है। उंडेलना है। इसे कोई आवरण फिर ढंक नहीं सकता।

 

हमारा शरीर-बुद्धि-मन सब कुछ ध्वनि के स्पन्दनों से निर्मित होता है। जो कुछ हम बोलते हैं, उसमें स्पन्दन होता है, सुर होता है, हमारी भावना होती है। इसी के अनुरूप पार्थिव तत्वों को आकृष्ट करती है। आध्यात्मिक धरातल पर रहने वाले साधक लयपूर्ण, माधुर्य के साथ ; शान्त मुद्रा में बात करते दिखाई पड़ते हैं। एक विशेष रचनाधर्मिता उनकी वाणी से प्रकट होती है। तब वाणी में जीवनदायिनी शक्ति का बोध होता है। आप दूसरों को तथा स्वयं को किन शब्दों से सम्बोघित करते हैं, वे आपके जीवन का निर्माण करते हैं।

 

प्रकृति के अंग होने के कारण हम भी स्रष्टा हैं। परमात्मा की तरह। हमारी सृष्टि क्रियाएं शब्दों से संचालित होती हैं। सरस्वती संचालन करती है। लक्ष्मी प्रकट होती है-संसार रूप में। दृश्य जगत रूप में। सरस्वती सदा अदृश्य रहती है। कारण रूप में। ब्रह्म होने के कारण शब्द का सम्पूर्ण सृष्टि पर पूर्ण नियंत्रण रहता है। अत: हमारे शब्द ज्यों के त्यों सृष्टि मान लेती है। न शब्दों में झूठ और सच का कोई भेद रहता है। जो जैसा है, वैसा ही सृष्टि स्वीकार लेती है। उसी रूप में उसको पूरा करने का प्रयास करती है।

 

जो कुछ शब्द बोले जाते हैं, उनके स्पन्दन पहले शरीर को, रक्त को, श्वास को, विचारों, भावों आदि को प्रभावित करते हैं। अर्थात हमारे अन्नमय, प्राणमय तथा मनोमय कोश स्पन्दित होते हैं। अलग-अलग इन्द्रियों पर इनका भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है। भीतर में हमारी भावनाओं या नीयत का असर अघिक होता है।

आप शान्त स्वर में बात करके प्रभाव देखिए।

 

आप आवेश तथा आवेग में बात करके प्रभाव देखिए। शान्त स्वर में माधुर्य भी आपको दिखाई देगा, जो आवेश में खो जाएगा। आवेश भरे शब्द स्वयं का तथा सुनने वाले का भी अहित करते हैं। इसी प्रकार सत्य बोलने वाला भी सहज रूप में बात करता है। हां, मत प्रकट करने वाला अलग हो सकता है। आक्रामक भी हो सकता है। सत्य भाषी कठोर हो सकता है, आक्रामक नहीं हो सकता। अमरीकी मनोवैज्ञानिक सोनिया कोकेट ने एक शास्त्र सम्मत बात लिखी है-‘सत्यभाषण न स्वयं को आहत करता है, न ही दूसरोें को। एक कला है जो दिलों को जोड़ने का कार्य करती है। आपसी विश्वास पैदा करती है। घाव भरने का कार्य करती है।’

 

यदि हम सच बोलते हैं, तो हमारी सृष्टि भी हमारी सहायक बन जाती है। हम इच्छाओं को मूर्त रूप देना चाहते हैं तो प्रकृति से झूठ नहीं बोलें, छलावा नहीं करें। सोनिया ने एक और महत्वपूर्ण बात कही है कि शब्दों के बने महल में ही व्यक्ति जीवन व्यतीत करता है। नकारात्मक और अपमान सूचक शब्द बोलकर आप ताजमहल नहीं पा सकते। अपशब्द सदा ही आत्मा को दूषित करते हैं। स्पन्दनों के धरातल को नीचे गिराते हैं। पाठकों को याद होगा कि किस प्रकार प्रार्थना और अपशब्दों से शीशियों में बन्द पानी में सुगंध और दुर्गध पैदा हो जाती है। इसी सिद्धान्त पर रक्त में भी विकार पैदा होते हैं और व्यक्ति को रोगी बना देते हैं। भावों के प्रभाव का, तरंगों के प्रभाव का यही प्रमाण है।

 

स्पन्दन रूप क्रिया का आधार होता है निष्क्रिय सत्ता। यही आत्मा भी है। अत: क्रियामूलक ज्ञान की अवस्था में निष्क्रिय को जान पाना कठिन है। क्रिया के साथ मनुष्य की भावना एवं अनुभव का सम्बन्ध भी नित्य रहता है। क्रिया के अभाव में भाव का भी प्रभाव हो जाता है। क्रिया के अनुरूप भाव तथा भाव के अनुरूप ही क्रिया होती है। जहां क्रिया है, वहीं शब्द भी है। क्रिया जब मृदु होती है, तब शब्द भी मृदु हो जाते हैं। क्रिया स्पन्दन की तीव्रता के साथ शब्द में भी तीव्रता दिखाई देने लगती है। अत: क्रिया, भाव और शब्द अभेद हैं। इनमें से किसी एक को बदलने पर तीनों बदल जाते हैं। ध्वनि के उच्चारण से ध्वनिगत स्पन्दन उच्चारणकर्ता के भाव का तथा भावान्तर्गत क्रिया का परिवर्तन कर देता है।

 

इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि यदि हम न चाहते हुए भी किसी के झगड़े की ध्वनि सुन रहे हैं, चाहे टीवी, सिनेमा के ही हों, हमारे भाव तथा क्रिया में दूषण पैदा हो जाएगा। हमें तुरन्त ऎसे श्रवण से दूर हो जाना चाहिए। ऎसे आकर्षक व्यक्ति के पास भी अघिक देर न बैठें कि उसके प्रति मन में राग पैदा जो जाए। सृष्टि वही आपको लौटाती है, जो आप उसे देते हैं। अत: शब्द हमारे भाग्य विधाता हैं। इनकी मृदुता पर हमारे जीवन की मृदुता टिकी रहती है। मृदुता का विकल्प नहीं है। भक्ति योग तो माधुर्य पर ही टिका है। अन्तरिक्ष में भी ईक्षु समुद्र, मधु, दघि और घृत समुद्र है। भीतर के आकाश की पूर्णता भी यही है।

 

गुलाब कोठारी

 

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