Gulabkothari's Blog

दिसम्बर 18, 2011

छाया

या देवी सर्वभूतेषु छाया रूपेण संस्थिता।

 

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

परिणाम-धर्मा कामना को धर्म कहते हैं। कामना का ही एक अर्थ है भूख-क्षुधा। कामना पूर्ति के अभाव में व्यक्ति व्याकुल हो जाता है। जैसे भूखा व्यक्ति निशक्त महसूस करता है। माया का विद्या/ अविद्या रूप कामना की दिशा तय करता है। कामना पूर्ति से नई ऊर्जा का प्रवाह होता है। व्यक्ति नया कर्म करने को प्रेरित होता है। अपने अहंकार के फैलाव में जुट जाता है। इस नई शक्ति को छाया कहते हैं। व्यक्ति की दिन-रात में भिन्न-भिन्न छाया बनती रहती है। अर्थात स्वयं एक होते हुए भी सब से भिन्न-भिन्न व्यवहार करता है। हमारे सारे रिश्ते छाया रूप ही हैं। माता-पिता, भाई-बहन, मित्र आदि सब।

 

कोई भी एक दूसरे के सामने सचाई प्रकट नहीं करता। छाया जीवन की अनिवार्यता है। इसके बाहर कोई जीवन नहीं हुआ करता। इसकी सीमा को कोई लांघ भी नहीं सकता। मनुष्य तो आकृति का नाम है। इससे जीवन व्यवहार नहीं चलता। अत: उसका एक संज्ञा रूप होता है ताकि वह स्वरूप के साथ जुड़कर उसकी पहचान बना सके। किन्ही दो व्यक्तियो में भेद किया जा सके। मनुष्य हर एक से अलग व्यवहार करता है। भाई से अलग, बहन से, पिता से, मित्र से, कार्यालय में, समाज में, सबसे अलग-अलग। दिन भर में 200 लोगों से भी मिलता है तो सबसे ही भिन्न व्यवहार करता है। जैसे हर एक से बात करने के लिए अलग-अलग मुखौटा लगाता हो। इसी को छाया कहते हैं। यही बाधा है जो मूल प्रकाश को ढककर, छाया रूप लेता है। व्यक्ति को अपनी नई पहचान बनाने की भी बड़ी भूख होती है। यश कमाने की और प्रशंसा पाने की भी कामना रहती है। यह क्षुधा रूप ही छाया बनकर जीवन को प्रेरित करती है।

 

छाया ही प्रतिबिम्बित मन की कामना है। मूल मन या श्वोवसीयस मन या अव्यय मन तो हमारी आत्मा है। उस पर अनेक आवरण पड़े हैं। उनके पार जो आत्म-स्वरूप दिखाई पड़ता है, वही प्रतिबिम्ब है आत्मा का। छाया है। इसी कारण हमारी कामनाएं भी दो प्रकार की होती हैं। एक मूल मन की, एक प्रतिबिम्ब की। प्रतिबिम्ब में प्रकृति के तीनों गुण रहते हैं। इसकी कामना भी गुण प्रधान होगी। विद्या और अविद्या द्वारा संचालित होगी। मूल मन गुणातीत है। यह ईश्वरीय कामना होती है।

 

ईश्वरीय कामना में व्यक्ति के चाहने से परिवर्तन नहीं आता। उसकी कामना प्रारब्ध से जुड़ी रहती है। आत्म रूप होने से यह मन कुछ करता नहीं है। केवल सीमा मात्र है। व्यक्ति जो कुछ भी करता है, अच्छा-बुरा जैसा भी वह बनता है, वह छाया रूप ही है। आत्म रूप से जो जुड़ता है, वह शुद्ध होता है। छाया रूप सोच-विचारकर किया जाने वाला नाटक है; अभिनय है। नाटक आप स्वयं ही तय करते हैं। वास्तविकता को ढकने का प्रयास तथा वास्तविक जैसा दिखाई देने का प्रयास ही नाटक कहलाता है। मनुष्य कितना सोच-समझकर, प्रयास करके प्रतिदिन सचाई से दूर जीता है। फिर हर गलत परिणाम के लिए भाग्य अथवा ईश्वर को दोष देता है। बुद्धि का जन्म शायद इसी बात के लिए हुआ है। अहंकार की संतान है। विज्ञान भी बुद्धि की ही देन है और बुद्धि ही उसका उपयोग तय करती है। जीवन के अनेक बड़े-बड़े कष्टों का कारण बुद्धि बनती है। वह भी व्यक्ति की छाया रूप ही होती है। इसी प्रकार प्रतिबिम्ब मन भी छाया है। अत: मन और बुद्धि के निर्णय भी छाया रूप ही माने जाएंगे।

 

जीवन का लक्ष्य होता है पुरूषार्थ। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। अर्थात, त्रिगुण के चंगुल से बाहर निकल जाना। कामना से पार चले जाना। तब कोई बन्धन नहीं है। ऎसी स्थिति बनती है मन के पार पहुंचकर। अन्नमय, प्राणमय और मनोमय कोष का तो सारा व्यापार ही त्रिगुण युक्त है। शरीर का अन्न भी और मन तथा इन्द्रियों के व्यापार भी। इन दोनों के मध्य जब तक व्यापार बना है, वह कामना तथा फल का व्यापार है। तब ये गारण्टी नहीं है कि व्यक्ति की चेतना सुप्त है या नहीं। चेतना की जाग्रति का सूत्र है विज्ञानमय कोष और वहां तक पहुंचने का एक मात्र साधन होता है ध्यान। विज्ञान के सहारे चेतना तक पहुंचना संभव नहीं है।

ध्यान के प्रयोग मन के पार जाने के प्रयोग हैं।

 

काम, क्रोध, मोह आदि जीवन में छाया रूप बने रहते हैं। मेरा नकली चेहरा बनाकर समाज के सामने रखते हैं। ध्यान में इस छाया रूप को आसानी से हम समझ सकते हैं। वहां मिलावट या किसी प्रकार की तोड़-मरोड़ संभव नहीं है। आप किसी स्थिति को अपने पक्ष में नहीं कर सकते। और यदि छाया से पीछा छुड़ाना ही है तो पहले तो संकल्प करना चाहिए कि जब तक छाया से मुक्त नहीं हो जाऊं, मेरे प्रयास शिथिल नहीं होंगे। ध्यान में संकल्प के साथ उतरूं कि छाया के कारणों को समझूंगा और उनसे मुक्त हो जाऊंगा। तब तक मेरा कर्ता भाव नहीं रहेगा। सारा कर्ता भाव छाया का ही होगा। माया का ही होगा।

 

ध्यान में किया गया चिन्तन भाव बनकर उभरता है। आप एक-एक भाव पर ध्यान करते जाएं। जैसे ही भाव स्पष्ट हुआ अथवा कारण स्पष्ट हुआ कि आवरण स्वत: ही लुप्त हो जाएगा।

 

ध्यान ही चेतना का जागरण करता है। इसकी शुरूआत में ही व्यक्ति को शरीर से मुक्त हो जाना होता है। शवासन या कायोत्सर्ग की मुद्रा, भ्रस्त्रा, एकाग्रता का अभ्यास आदि इसमें सहायक क्रियाएं हैं। प्राणायाम दूसरा सोपान हैं। इसमें श्वास को लयबद्ध एवं मन्द करना होता है। जैसे-जैसे ध्यान गहन होता है, श्वास की गति मन्द होती जाती है। यह मन्द गति चमत्कारी साबित होती है। इसकी शरीर और मन को जोड़ने की शक्ति घट जाती है। मन में विचार चलते रहते हैं, वासनाएं भी जाग्रत रहती है, किन्तु शरीर पर प्रभावी नहीं हो पाती। तब संकल्पित मन विज्ञानमय कोष की ओर मुड़ता है। सुप्त चेतना से उसका साक्षात होता है। मन की वासनाएं चेतना से टकराती हैं।

 

उन वासना तरंगों को व्यक्ति समझने का प्रयास करता है। भाव भी विचार रूप होते हैं। विचार भी पदार्थ होते हैं। आचार का निर्माण विचारों से होता है। मनुष्य वैसा ही बन जाता है। भावना का अगला स्वरूप ही ध्यान है। भव यानि संसार, भाव यानि विचार। एक रोग, एक चिकित्सा। अन्तकरण की प्रवृत्ति को भाव कहा है। ध्यान आत्म चिन्तन है, अनुप्रेक्षा है। भाव एवं ध्यान साथ रहते हैं। बार-बार स्फुरित होने वाली विचार तंरगें ही भाव कहलाती हैं। जिनके द्वारा मन को भावित/ संस्कारित किया जाए। आत्मा का एकत्व, अनित्यता, अशरण आदि को धर्मध्यान कहा है। आगे चलकर ध्यान भी निरालम्ब रूप होने लगता है। यह ध्यान और इसके साथ लोक कल्याण का भाव, सकारात्मक नीयत, समष्टि भाव या वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा हर ध्यान को ऊध्र्वगामी बना देती हैं। तभी चेतना के जागरण की संभावना बन सकती है। चेतना का जागरण प्रकाश की स्थिति है। अत: छाया लुप्त हो जाती है। व्यक्ति आनन्द कोष में प्रतिष्ठित हो जाता है।

 

गुलाब कोठारी

 

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