Gulabkothari's Blog

जनवरी 22, 2012

प्रहरी

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पत्रकार एक इतिहासकार भी होता है। साहित्यकार और कवि (क्रान्त द्रष्टा) भी होता है। उसका काम है अतीत पर आंख रखते हुए वर्तमान का आकलन और भविष्य पर लेखन। समाज में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों की व्याख्या और समाज में स्वयं के प्रति विश्वास बनाए रखने का उत्तरदायित्व। उसके बिना पत्रकार के शब्दों की सार्थकता नहीं होती। न किसी के दिल को छू सकते हैं, न कोई इनका अनुकरण ही करेगा।

 

नौकरी करने वाले पत्रकारों की तरह जिनको न साख की चिन्ता, न ही पाठक के साथ भावनात्मक जुड़ाव की। उसे पेट भरने के लिए 6 घंटे काम करना है। ईमानदारी से। इस दृष्टि से राजस्थान पत्रिका ने भावनात्मक सम्प्रेषण के रूप में अपनी विशिष्ट  पहचान बनाई है। जो कुछ कहना है, उसमें विवेक के साथ-साथ भावना भी हो।

 

लोकहित का भाव तब सीधा मन के धरातल तक पहुंच जाता है। रास्ते में बुद्धि कोई प्रश्न या तर्क खड़ा नहीं करती। संदेश ग्राह्य हो जाता है। इसीलिए हम कहते भी हैं कि पत्रिका आत्मिक धरातल का समाचार-पत्र है। लोग इसका अनुसरण करते हैं। जैसे कभी धार्मिक ग्रन्थों का पारायण होता था। पत्रिका के सामाजिक सरोकार इसका उदाहरण हैं। राजस्थान के गुर्जर आंदोलन, भोपाल का किसान आंदोलन अथवा भोपाल के ही बड़े तालाब की जन-श्रमदान के द्वारा की गई खुदाई आदि पाठकों के विश्वास के अनुपम उदाहरण हैं। हमारे सामाजिक सरोकार हमें समाज के शुभेच्छु के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

 

एक अच्छे साहित्यकार की तरह पत्रकार भी शब्द-ब्रह्म का साधक होता है। स्वर, व्यंजन, छन्द, वर्ण आदि का ज्ञान एवं शरीर में उत्पत्ति स्थान, स्पन्दनों का प्रभाव आदि पर भी उसकी पकड़ मजबूत होती है। शब्दों की मंत्र शक्ति, सम्प्रेषण शक्ति, स्पन्दन शक्ति, नाद का रूप आदि का ज्ञान उसे ऋषि कोटि का स्थान दिला देता है। क्योंकि पत्रकार भी समाज को कुछ देने के लिए लिखता है। आगे की उपलब्घियां और सिद्धियां उसके श्रम एवं तप पर निर्भर करती है। आज मीडिया लेने के पीछे उतावला जान पड़ता है। मूल्यों से समझौता करता है। प्रतिस्पर्द्धा का वातावरण बन गया है।

 

इस दौड़ में पत्रकार भी श्रमजीवी बन गया है। तब वह स्वयं अपने ही लेखन से कैसे जुड़ेगा? उसका निष्प्राण लेखन उसी का पेट भर कर समाप्त हो जाएगा। अपने लेखन के शब्दों को यह पत्रकार तो कभी नहीं पढ़ पाएगा या सुन पाएगा। तब एक व्यक्ति अहंकार का मारा, प्राकृत ज्ञान से अनजान, पत्रकार का मुखौटा लगाए, पत्रकार के रूप में समाज में कभी प्रतिष्ठित नहीं होगा। इतिहास लेने वाले को कभी याद नहीं करता। कलम से कागज काले करता, कागज की नाव की तरह समय के साथ बह जाएगा। उसके द्वारा भेजे हजारों संदेशों में से किसी को कुछ याद नहीं रहेगा। पत्रकार के सम्प्रेषण का अर्थ है कि वह भी संदेश के साथ पाठक तक पहुंचे, स्वयं भी संदेश को निरन्तर ग्रहण करता जाए। समय के साथ अपने आवरण हटाता जाए और समाज के आवरण भी दूर करने में सहायक हो। तब जाकर समाज में रूपान्तरण की लहर उठेगी। पत्रकार की मशाल समाज में मिसाल बन जाएगी।

 

आज देश भर में लोकतंत्र का स्थान स्वच्छन्द तंत्र लेता जा रहा है, जो न केवल चिन्ता का विषय है, अपितु नई पीढ़ी के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। इसका एक ही कारण है। प्रहरी स्वयं पथ भ्रष्ट हो गया। यहां तक कि उसने अपनी सही पहचान छिपाने के लिए चेहरे पर मुखौटा लगा लिया। जनता व लोकतंत्र के तीनों पायों के बीच सेतु का दायित्व निभाने वाला मीडिया स्वयं को ‘चौथा पाया’ कहने लग गया। सेतु का कार्य छोड़ दिया और स्तंभ का मुखौटा पहन लिया। संविधान माने या न माने, मीडिया ने स्वयं-भू घोषणा कर दी।

 

जनता और तीनों पायों के बीच का सेतु, लोकतंत्र का प्रहरी, पलायन कर गया। इससे न केवल तीनों स्तंभ निरंकुश हो गए, बल्कि स्वयं मीडिया भी स्तंभ जैसा ही व्यवहार करने लग गया। अत: वह भी जनता से दूर हो गया।  रखवाला के साथ जुड़ गया। शिक्षा ने और नेताओं ने जनता को जो सब्ज बाग दिखाए, उससे जनता निश्चिन्त होकर विश्राम के द्वश्स्त्रe में चली गई। पांच साल में एक बार मतदान करके सो जाती है। इससे अवधारणा भी मिट्टी में मिल गई। अब मीडिया की आक्रामकता का कारण जनता के मुद्दे नहीं रहे। अपने क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति ही उसका एकमात्र लक्ष्य बनने लगा। तभी तो पैड न्यूज जैसा व्यवहार, ब्लैकमेलिंग से लेकर माफिया की तरह सरकारों तक को धमकियां देने की शिकायतें आम हो गई। तब मीडिया कैसे तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष कर सकता है? वह तो स्वयं तंत्र का अंग हो गया। जनता के सामने तीनों स्तंभों के साथ खड़ा हो गया।

सत्ता का मद स्तंभ को तो स्वीकार करता है, सेतु को स्वीकार नहीं करता। अत: स्वयं सरकार ही उसकी शत्रु हो जाती है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारें इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। वे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करतीं। निजी हित साधन में कार्यपालिका भी उनके साथ है।

 

इस परिस्थिति से बाहर निकलना भी आवश्यक है। भावी पीढ़ी के लिए कुछ तो नया आधार देना पड़ेगा। भ्रष्ट लोगों के चंगुल से देश को मुक्त कराना पड़ेगा। यह कार्य केवल और केवल मीडिया ही कर सकता है। इसे लोकतंत्र के पाये के स्थान पर फिर से लोकतंत्र का प्रहरी बनाना पड़ेगा। शेष तीनों स्तंभों की निगरानी करनी पड़ेगी। जनता के बीच जो साख आज गिर रही है, जो व्यापारिक स्वरूप उभरता जा रहा है, उस पर अंकुश लगाना पड़ेगा।

 

अकेला मीडिया ही तीनों स्तंभों को दिशा दे सकता है। देश से भ्रष्टाचार मिटा सकता है। तब यह कार्य कैसे किया जाए और कौन करे? युवा वर्ग ही वह शक्ति है। उसे मीडिया के साथ जुड़ जाना होगा। सूचना के अघिकार का भी निरन्तर उपयोग करना पड़ेगा। देश के बड़े-बड़े घोटाले इसी तरह सामने आ पाए। जो मीडिया-टीवी, अखबार, रेडियो, जनता का साथ नहीं दे, उसका घर में प्रवेश बन्द। जो ब्लैक मेल करता नजर आए, घटिया, नकारात्मक भाषा एवं सामग्री परोसे, अपने स्वार्थ के आगे लोकहित को गौण कर दे, उसका तुरंत सामूहिक रूप से बहिष्कार किया जाए। फिर देखना परिवर्तन कैसे आता है। तब पत्रकारों की लेखनी भी प्राणवान हो जाएगी। पाठक भी कलम के द्वारा फिर से पूजा जाने लगेगा। हमें आजादी को आजाद करने के लिए, ‘जनता के द्वारा’ लोकतंत्र को पुन: स्थापित करने को संकल्पित होना होगा।

 

 

गुलाब कोठारी

 

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