Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 8, 2012

अक्षर-1

सृष्टि का बड़ा सारा रहस्य सरस्वती और लक्ष्मी के साथ जुड़ा रहता है। लक्ष्मी विष्णु पत्नी है। विष्णु की नाभि से ब्रह्मा का जन्म होता है। सरस्वती ब्रह्मा की शक्ति है। आगे सरस्वती ही लक्ष्मी को प्रकट करने में सहायक होती जाती है। दोनों ही वाक् रूप है। लक्ष्मी अर्थवाक् या पदार्थ रूप है। सरस्वती शब्द वाक् अथवा नाद रूप है। लक्ष्मी जड़ रूप दिखाई पड़ती है। सरस्वती चैतन्य स्वरूपा है। सम्पूर्ण संसार पदार्थ रूप है। जड़ या नश्वर है। शब्द, संगीत, स्पन्दन और क्रियामान, गतिमान एवं रूपान्तरण की शक्ति के धारक हैं।

जो कानों को सुनाई दे वह वैखरी। जड़ शरीर से वैखरी-चैतन्य ऊर्जा, जैसे जड़ वाद्य से चैतन्य संगीत। वैखरी कोरे शब्दों का नाम नहीं है। वैखरी वाक् का स्थूल रूप है। शरीर की तरह। शरीर कितने कार्य कर सकता है, कितनी तरह की अभिव्यक्ति कर सकता है, किस-किस ऊर्जा से प्रभावित हो सकता है ; ठीक इसी प्रकार वैखरी के स्वरूप को भी समझना चाहिए। यह भी तो माया का रूप ही है। शब्द का आधार अक्षर होता है। इस विश्व का आधार भी अक्षर है। अक्षर सदा अव्यय पर टिका रहता है। शब्द संस्था में इसकी स्फोट संज्ञा है।

शरीर की तरह ही शब्द भी क्रियात्मक है। वैखरी कमरे की दीवारों से टकराकर वापिस भी लौटती है। वैखरी में मन के भावों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। जैसे शरीर भी भावों को प्रकट किया करता है। हो सकता है मनुष्य के साथ शरीर का सम्प्रेषण पूर्णता देते, किन्तु अन्य प्राणियों, पेड़-पौधे आदि के साथ तथा दूर बैठे व्यक्ति के साथ सम्प्रेषण के लिए शब्द विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। आप किसी पौधे से नित्य प्रेमपूर्वक बात करें तो उसका विकास चमत्कारी होता जान पड़ेगा। आप अपशब्द कहेंगे तो वैसा ही प्रभाव भी देख लेंगे। यही प्रयोग आप जल पर भी करके देख सकते हैं। आप किसी की आलोचना करें अथवा सुनें, एक ही बात है। प्रभाव तो शरीर पर, रक्त पर एक जैसा ही पड़ता है। शब्दों की मार से कोई नहीं बच पाता। शब्दों का आधार प्राण रूप होने से इनकी गति बाधित नहीं हो सकती।

न दूरी ही इनको रोक सकती है। वैज्ञानिक आज पुराने शब्दों को फिर से संग्रहित करने के लिए प्रयासरत हैं, ताकि गीता को कृष्ण के मुख से ही सुना जा सके। यह वैखरी के कारण ही संभव है। वैखरी में ही सारे मंत्रों का उच्चार होता है। सारे यज्ञों का निष्पादन होता है। यही शब्द स्पन्दन रूप होकर यजमान के लिए लक्ष्मी रूप में प्रकट होते हैं। अत: इनके उच्चारण की शुद्धता उतनी ही महत्वपूर्ण मानी गई है।

वैखरी का आधार हमारी वर्णमाला है। वर्णमाला “अ” से “ह” तक होती है। वर्ण 33 होते हैं। इनको योनि कहते हैं। व्यंजन कहते हैं। स्वर बीज रूप होते हैं। शरीर के चक्रों में हर वर्ण का अपना स्थान एवं कार्य क्षेत्र, रंग, स्वरूप, वाहन आदि होते हैं। इसी तरह मंत्रों के भी छन्द, गुरू देवता आदि होते हैं। मंत्रों का अर्थ नहीं किया जाता। वैखरी रूप प्रकट होने से पूर्व शब्द जिन-जिन स्थलों से गुजरता और टकराता है, आघात करता है, उनका प्रभाव भी शब्द में रहता है। सच तो यह है कि हर शब्द एक मंत्र ही है। हर वर्ण भी मंत्र है।

शास्त्र कहते हैं कि ज्ञान को पैदा नहीं किया जा सकता। न ही प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान और अज्ञान तो आत्मा के विद्या-अविद्या रूप आवरण हैं। जन्म से ही साथ रहते हैं। ज्ञान, ज्ञाता, ज्ञेय को अलग नहीं किया जा सकता। जैसे-जैसे आत्मा के आवरण हटते जाते हैं, ज्ञान प्रकट होता जाता है। केवल आवरण भेद से ही ज्ञान की भिन्नता जान पड़ती है। मन में उठने वाली इच्छाओं की अभिव्यक्ति वाक् से है। मन और वाक् साथ रहते हैं। अत: जो विषय मन के पार होते हैं, वहां शब्दों की पहुंच नहीं है। यही वैखरी की सीमा बन जाती है। मध्यमा भी छूट जाती है। पश्यन्ति का क्षेत्र शुरू हो जाता है। विषयों को देखा जा सकता है। प्रज्ञा का जागरण ही यह क्षमता प्रदान करता है। वाक् का उक्थ नाभि है। हर अक्षर नाभि से उठकर मुंह में स्वरूप लेता है। अत: वैखरी के गर्भ में भी परा; पश्यन्ति और मध्यमा होते हैं।

वैखरी वाक् सृष्टि एवं साहित्य सृजन करती है। भावनाओं से जुड़कर कर्म और कर्म-फल का कारक बनती है। रोग और निरोग अवस्था का निर्माण करती है। बन्द स्थान में वैखरी के स्पन्दन दीवारों से टकराकर पुन: शरीर तक लौटते हैं। खुले आकाश में ये स्पन्दन विस्तार पाते हैं। वैसे तो ये स्पन्दन साधारण ध्वनि जैसे दिखाई देते है, जो कि बिना माध्यम के चलती नहीं है। वास्तव में इस ध्वनि में जो प्राणों का योग है उसे गति के लिए माध्यम की कोई आवश्यकता नहीं है। न ही कोई माध्यम इसके प्रसरण में बाधक बन सकता है। वर्तुलाकार गति होने से शब्द-स्पन्दन सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो जाते हैं। मध्यमा में यही स्पन्दन शरीर के भीतर व्याप्त रहते हैं।

चूंकि वैखरी के भीतर परा, पश्यन्ति, मध्यमा रहती हैं और इनके साथ-साथ भाव भूमि की शक्ति, गति और दिशा होती है, अत: स्पन्दनों का प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। जिस प्रकार माया ब्रह्म को गर्भ में लेकर शरीर रूप धारण करती है तथा शरीर अपने आप में जड़ होते हुए भी चैतन्य प्रतीत होता है; इसी तरह वैखरी के गर्भ में परा वाक् को जानना चाहिए। जिसे स्वयं के बारे में ज्ञान नहीं हैं; उसका अन्य के संदर्भ में जो ज्ञान है वह भ्रान्तिपूर्ण ही होगा। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सत्ता के अनुपात में ही अन्य का आकलन किया करता है।

कृष्ण कहते हैं कि मैं अक्षरों में अकार हूं-“अ” से ही सम्पूर्ण वर्णमाला उत्पन्न होती है। शब्द भी इसी वाक् का रूप है। शब्द से अर्थ की प्राप्ति होती है। अत: अर्थ भी वाक् है। पाणिनी लिखते हैं कि आत्मा बुद्धि के द्वारा अर्थो को जानकर अभिव्यक्ति की इच्छा रखता है। इच्छा मन को प्रेरित करती है। मन जठरागिA पर आघात करता है। उससे प्राणवायु प्रेरित होता है। वह वायु यदि उरस्थल में टकराता है तो मन्द स्वर निकलता है। कण्ठ और शिर में क्रमश: मध्यम और तार स्वर निकलता है। जो वर्ण मुख से निकलता हैं, उनके पांच विभाग होते हैं। स्वर-काल-स्थान-प्रयत्न और अनु प्रदान के योग से।

नाभि स्थान में प्राणवायु बनता है। उर स्थान में स्वर रूप लेता है। शिर स्थान में स्वर ध्वनि रूप होता। ध्वनि मुख में वर्ण रूप बन जाती है। नाभि, उर, शिर में प्राणवायु की वर्णरूप अभिव्यक्ति नहीं होती। मुख स्थान में ही होती है। उर स्थान के मन्द्र स्वर को अनुदात्त या प्रात: सवन कहते हैं। कण्ठ स्थान के मध्यम स्वर को मध्यन्दिन सवन और शिर स्थान के तार स्वर को उदात्त या सायं सवन कहते हैं।

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