Gulabkothari's Blog

फ़रवरी 26, 2012

बताओ धन कहां है?

आज पूरा देश एक बड़े भ्रष्टाचार के अaे की तरह दिखाई पड़ रहा है। किसी भी कोने में चले जाइए, भ्रष्टाचार के अतिरिक्त कुछ सुनाई ही नहीं देता। हर क्षेत्र के अपने रावण और कंस बने बैठे हैं। अब तो भ्रष्टाचार से आगे देश बलात्कार और हत्याओं के युग में प्रवेश कर रहा है। वहीं दूसरी ओर आत्महत्याएं सरकारों के मुकुटों की कीर्ति बढ़ा रही हैं। नेतृत्व पूर्ण बेखबर, अभिमानी तथा निम्नतर मानव कोटि में जी रहा दिखाई पड़ता है। भ्रष्टाचार के आरोपियों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि जीव नर या मादा नहीं होता।

भ्रष्ट लोगों को बचाने वालों की भी कोई कमी नहीं। जैसे अफजल को कोई मारना नहीं चाहता। टू जी प्रकरण में ए. राजा एवं कनिमोझी लाखों करोड़ के घोटालों में जेल गए। राडिया की टेपों ने भ्रष्टाचार के अनेक धरातल सामने ला दिए। देश को बेचने वाले उद्योगपतियों और पत्रकारों के मुंह काले कर दिए। राष्ट्रमण्डल वैसे भी अंग्रेजों की गुलामी का ही प्रमाण पत्र है। फिर इस आयोजन (खेलों में) में भी अरबों का घोटाला सामने आया। दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित तक के नाम सामने आए। तमिलनाडु के करूणानिधि, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, कांग्रेस-भाजपा एवं अन्य राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक दलों के नेता भ्रष्टाचार की मशाल लिए देश का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

अनेक जांच आयोग सैकड़ों रिपोट्र्स दे चुके, कई बड़े-बड़े नेता/ अधिकारी सुर्खियों में आ चुके। हां, एक बात सभी जांच आयोग दबाते जाते हैं, और वह यह कि घोटाले के धन के लेन-देन की बात नहीं करते। आखिर इतने लाख करोड़ हैं कहां? कहां हैं ए.राजा के पौने दो लाख करोड़? किन दस्तावेजों के आधार पर इतने बड़े-बड़े घोटालों की पुष्टि की जाती है? क्या इनमें धन का लेन-देन नहीं होता? क्यों जांच एजेंसियां इतने महत्वपूर्ण तथ्य को दबा जाती हैं अथवा यह भी जांच की कोई अनिवार्य शर्त होती है? जनता की जिज्ञासा तो यह है कि इतना धन कहां गया और क्या यह धन फिर से राजकोष में जमा हो सकेगा। क्या जांच एजेंसियों की यह कार्य शैली संघीय ढांचे में छेद नहीं कर रही?

हम चाहे सुभाष चन्द्र बोस की जांच पर चर्चा करें, चाहे भंवरी देवी की हत्या पर। सारा कार्य ढांचे को शक्तिहीन करने की दृष्टि से ही किया जा रहा है। सारी जांच एजेंसियां संवेदनहीन बनकर कार्य करती हैं। प्रयास सारे ढांचे को सुरक्षित किए रहने को नहीं किए जाते, बल्कि व्यक्ति विशेष अथवा क्षुद्र स्वार्थ ही केन्द्र में रहने लगे हैं। गांव के पंचों के नरेगा मुद्दों से लेकर बोफोर्स तोप सौदे चर्चा में तो आते हैं किन्तु कोई संस्था इनसे जुड़े धन की प्राप्ति की बात नहीं करती। कैग का अनुमान है कि टू जी में 1.76 लाख करोड़ रूपए का घोटाला हुआ होगा लेकिन यह राशि कितने हाथों में गई होगी किसी को नहीं पता। उनके नाम एवं राशि को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? इसके पीछे चोरी की मानसिकता ही होती है। जांच एजेंसियां भी अपवाद नहीं होतीं। तब क्या अर्थ रह जाता है घोटालों की चर्चा को इतनी ऊंची आवाज में उठाने का। किसी एक कलमाड़ी, राजा जैसे किसी बकरे की बलि देकर बाकी को मुक्त करना ही उद्देश्य जान पड़ता है। काले धन की विदेश यात्रा की चर्चा शायद इसलिए करते हैं ताकि देश में दबे काले धन एवं उनके धन कुबेरों की चर्चा पर अंकुश लगाया जा सके। हर बड़ा भ्रष्ट नेता किसी न किसी माफिया से जुड़ा है। इसी तथ्य को छिपाने के लिए धन के लेन-देन तथा वसूल करने के मुद्दे पर सरकारें मौन रहती हैं।
गुलाब कोठारी

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