Gulabkothari's Blog

मार्च 4, 2012

अक्षर-4

अकार के उच्चारण काल को मात्रा कहते हैं। अकार में अकार के योग को द्विमात्रिक परतोयोग कहते हैं। दीर्घ स्वर के नाम से जाना जाता है। एक मात्रा का वर्ण ह्वस्व, दो मात्रा का दीर्घ तथा तीन/चार मात्रा के वर्ण को प्लुत कहते हैं। अकार के तीन भेद- उदात्त, अनुदात्त और स्वरित भी ह्वस्व-दीर्घ प्लुत भेद से नौ प्रकार के हो जाते हैं। स्थान भेद से अ, इ, उ आदि बनते हैं। इस प्रकार एक ही अकार से 42 निरनुनासिक और 42 सानुनासिक वर्ण होकर 84 भेद हो जाते हैं।

 

 

मुख की गतिविघियों को आभ्यान्तर प्रयत्न कहते हैं। इनके स्पृष्ट और विवत्तü दो भेद हैं। स्पर्श को स्पृष्ट कहते हैं। स्पर्श विरोधी भाव/ धर्म विवत्तü कहा जाता है। अ, इ, ऋ, लृ, उ में स्पर्श का पूर्ण अभाव है। ये विवत्तü स्वर हैं।

 

पांच अन्तस्थ वर्णो में पहला वर्ण विवृत्ति या अर्द्ध मात्रिक वर्ण होता है। ‘इ’ कार और ‘अ’ कार की संघि होने पर जैसे इकार, पर अर्द्ध मात्रा से च्युत हो जाता है। उसी प्रकार ‘अ’ कार और ‘इ’ कार भी संघि होने पर पूर्व अकार, पर अर्द्धमात्रा से रहित होकर अर्द्धमात्र अकार शेष रह जाता है। पाणिनी ने लिखा है-‘एकार, ओकार में कण्ठ स्थानीय अकार की अर्द्धमात्रा ही शेष रहती है। यह अकार अर्द्धमात्र होने से व्यंजन है। पूर्ण स्पृष्ट न होने से स्वर भी है। स्वर और व्यंजन दोनों धर्मो से सम्बन्ध होने से यह अन्त:स्थ कहलाता है।

 

इसी प्रकार मुख के बाहर उर, कण्ठ और शिर में बाह्य प्रयत्न कहलाते हैं। इनके एक प्रकार के संवार-नाद-घोष तीन प्रकार होते हैं। दूसरे अंग हंै-विवार-श्वास और अघोष। उर-कण्ठ-शिर में संयोग के लिए वर्णोपादान भूतवायु रूप अनुप्रदान का जो प्रयत्न है, बाह्य प्रयत्न कहलाता है। जिस उच्चारण में वायु मृदु होने से बाह्य नली को फैलने नहीं देता, वह संवार है।

 

जो फैलने वाला है, वह विवार है। यदि उच्चारण में वायु की मात्रा अघिक हो और प्राण रूप अगिA कम हो तो वह श्वास प्रयत्न है। जहां प्राण अघिक और वायु कम हो, उसे नाद कहते हैं। दृढ़ता के साथ उच्चारित वर्ण में जहां प्रतिध्वनि योग्यता कम हो, वह अघोष है। जहां यह योग्यता अघिक है, वह घोष है। संवार-नाद-घोष तीनों अविनाभाव है। सदा साथ रहते हैं।

 

शब्द वाक् के तीन स्वरूप-व्यवहारगत दिखाई पड़ते हैं। वैखरी-बाहर बोलने वाला,  उपांशु-मुख में रमण करने वाला और मानस-भीतर चलता रहने वाला। उपांशु में वाक् का वह स्वरूप होता है जिसमें शब्द, भाषा, विचार, पढ़ना, सुनना आदि सम्मिलित होता है। वाक् बाहर नहीं, भीतर सुनाई देती है। अन्य को सुनाई नहीं देती है। उपांशु मन का क्षेत्र है। यहां प्रत्येक ध्वनि, स्मृति, कल्पना आदि का संग्रह आत्मा के साथ चलता है। यही इच्छाओं का धरातल है। बन्धन और मुक्ति का केन्द्र है।

 

ये इच्छाएं ही शरीर में अभिव्यक्त होती हैं। हर विचार के साथ उसी का द्वैत भाव भी उठता रहता है। यह भ्रमित करने का कार्य करता है। भय, क्रोध, लोभ आदि नकारात्मक भाव भी यहीं विचारों के जुड़ जाते हैं। द्वैत अथवा विरोधी भाव विचारों में उद्वैतलन का मुख्य कारण है। स्मृति की भूमिका भी इस दृष्टि से महत्वपूर्ण होती है। शब्द तो संयोग और विभाग से एक जगह उत्पन्न होकर चारों ओर फैलता है। जब वह कान से टकराता है तब हमें शब्द की प्रतीती होती है।

 

जीवन का नित्य संचालन मध्यमा से होता है। बिना विचार के जीवन नहीं चलता। बिना आदान-प्रदान के ठहराव आ जाएगा। अब तो लिखना-पढ़ना भी जुड़ गया। उपासना, जप, प्रार्थना, भक्ति, संगीत सभी कुछ तो शब्दों के संसार का अंग है। हम कह सकते हैं कि मन और शब्द अविनाभाव है। मन को व्यक्त होने के लिए शरीर तक पहुंचना पड़ता है। यह प्राणों की क्रिया है। मन के विचार शरीर तक पहुंचकर या तो वैखरी में प्रकट होते हैं, अथवा क्रिया रूप होकर अर्थ वाक् बन जाते हैं।

 

किसी भी पद या वाक्य का अर्थ समझने के लिए स्वर, वर्ण, अक्षर और मात्रा का ज्ञान आवश्यक है। वर्ण और अक्षर दोनों का ज्ञान जरूरी है। शब्द सृष्टि भी ठीक उसी प्रकार होती है, जैसी कि परात्पर सृष्टि होती है। वर्ण का संक्षिप्त रूप हम यहां पढ़ चुके हंै। वर्ण का ही अगला भाग अक्षर ज्ञान है। हम देख चुके हैं कि ब्रह्म के तीन भेद-अव्यय, अक्षर और क्षर होते हैं। अव्यय ही चिति के द्वारा मन-प्राण-वाक् बनता है।

 

इसी मन के साथ प्राणमय तत्व है, वह अक्षर है। वाङमय सारा भूतवर्ग (विश्व) क्षर सृष्टि है। अत: वेद की घोष्ाणा है कि अथो वागे वेदं सर्वम्। सब कुछ वाक् ही है। आकाश भी वाक् है। अत: आकाश में व्याप्त पंच महाभूत भी वाक् है। क्षर का आधार ही अक्षर या प्राण है। क्षर भी पंचकल है। प्राण-आप्-वाक्-अन्न और अन्नाद इसकी कलाएं होती हैं। इनके ही (वाक् और क्षर) भूत सृष्टि होती है। अन्त में अक्षर में ही विलीन हो जाती है। इसी को परब्रह्म विद्या कहते हैं।

 

अव्यय,अक्षर,क्षर को ही मन-प्राण-वाक् कहते हैं। ये ही भूत, शब्द और अर्थ भाव हैं। भूत समूह आकाश में ही रहता है। अग्नि, वायु,जल और पृथ्वी का यही स्थान है। आकाश ही वायु के आघात से तरंगें पैदा करता है। यही नाद स्पन्दन रूप में शब्द/ध्वनि बनकर कान तक पहुंचता है। इसी से शब्दमय और अर्थमय धाराएं निकलती हैं। भूत सृष्टि की तरह इसका आधार भी पंच महाभूत ही होते हैं। स्थान नहीं घेरता है, अत: भूत सृष्टि से छोटा जान पड़ता है। यह शब्द मय ब्रह्मविद्या है।

 

शब्द और अर्थ मय प्रपंच वाङमय ही है। इनमें वे ही प्रकार हैं जो भूतमय प्रपंच में होते हैं।

ब्रह्म शब्द विज्ञान का पर्यायवाची है। इसमें शब्द विज्ञान और पर विज्ञान दोनों रहते हैं। शब्द भी दो प्रकार से अर्थ ज्ञान कराता है-अभिधान/प्रतीक रूप। ओम शब्द का वाच्य ब्रह्म है, ओम शब्द भी ब्रह्म है। परब्रह्म को पराविद्या और शब्द ब्रह्म को अपराविद्या कहा है। दोनों में समानता है।

 

शब्द सृष्टि ज्ञान से अर्थ सृष्टि ज्ञान सिद्ध हो जाता है। पर विद्या में अव्यय, अक्षर,क्षर तीन प्रकार का प्राणब्रह्म है, अपर विद्या में भी स्फोट,अक्षर,वर्ण तीन प्रकार का वाग्ब्रह्म है। यह स्फोट ही यहां अव्यय रूप है। स्फोट से जुड़े पांच स्वरवर्ण-अ,इ,ऋ,लृ,उ- अक्षर कहलाते हैं। इन्हीं पांच अक्षरों से क्षरादि व्यंजन पैदा होते हैं। इन सबका आलम्बन स्फोट रूप अव्यय ही होता है। व्यंजन, स्वर और स्फोट एकीभूत एक वाक् तžव हैं।

 

स्वर एक मात्रा काल तथा व्यंजन अर्द्ध मात्रिक कहलाते हैं। अत: स्वर दो अर्द्धमात्रा से बनते हैं। अक्षर की व्याप्ति नौ बिन्दुओं तक होती है। व्यंजन रहित स्वर भी अक्षर कहलाता है। सव्यंजन स्वर का नव बिन्दुक स्फोट आयतन होता है। नव बिन्दु प्रदेश तक के व्यंजनों को स्वर रूप अक्षर आत्मसात करने में समर्थ होता है। शब्द ब्रह्म के अक्षर में भी उक्थ, अर्क एवं अशिति तीन भाग होते हैं।

 

नौ बिन्दुओं में दो बिन्दु का स्वर (पांचवा और छठा बिन्दु) उक्थ या आत्मा होता है। शेष्ा सात बिन्दु अर्क कहलाते हैं। ये अर्क अपने मण्डल में क्षर रूप व्यंजन को आत्मसात कर लेते हैं। केवल स्वर के अक्षर होने पर भी नौ बिन्दु तक वर्तमान क्षर रूप व्यंजन स्वररूप अक्षर की सत्ता से ही सत्तावान् होते हैं। अत: इन व्यंजनों से युक्त स्वर अक्षर कहलाता है। स्वर के पूर्व या पpात व्यंजनों के होने पर व्यंजन विशिष्ट स्वर ही अक्षर कहलाता है।

 

वाग् में व्,आ,ग् तीन वर्णो के होने पर भी आद्यन्त व्यंजनों से विशिष्ट अकार स्वर एक अक्षर ही है। अत: वाग् को एक अक्षर कहा है। अक्षर शब्द में अ, व्यंजन से असंपृक्त होने के कारण स्वरोक्षरम् के अनुसार अक्षर है। क्ष और र व्यंजन संयुक्त स्वर हैं। अत: अक्षर हैं। सहाद्यैर्व्यजनै रूत्तरैpावसितै: के अनुसार। अत: अक्षर शब्द तीन अक्षरों का समुदाय है।

 

गुलाब कोठारी

 

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