Gulabkothari's Blog

मार्च 11, 2012

अक्षर-5

एक प्रश्न अक्सर किया जाता है कि कितने व्यंजनों से युक्त स्वर अक्षर कहला सकता है। इसका उत्तर दिया है कि पूर्व में चार व्यंजनों से तथा उत्तर में तीन व्यंजनों से विशिष्ट स्वर एक अक्षर कहला सकता है। यदि इस नव बिन्दु प्रदेश में दूसरा स्वर भी आ जाए तो वहां उपस्थित व्यंजन अघिक बलवाले स्वर के साथ जुड़ेगा। पंचम/ष्ाष्टम् बिन्दु स्थित स्वर का बल आगे आगे के बिन्दुओं पर क्रमश: घटता जाता है। कात्यायन ने लिखा है कि स्वरों में परस्पर बल वैष्ाय होने पर जिस व्यंजन पर जिस स्वर का बल अघिक होता है, वह व्यंजन उसी स्वर का अंग होता है।

 

 

आखिर साधारण व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य तो पुरूषार्थ ही होता है। अर्थ एवं काम उसके मूल अध्यवसाय है। किन्तु इनका आधार यदि धर्म है, तभी व्यक्ति सफलता के शिखर छू सकता है। यहां धर्म शास्त्रों में जकड़ा हुआ नहीं होता। धर्म उसके जीवन का लक्ष्य है। उसका सपना है। उसकी पूजा है, संकल्प है। उसकी जीवन शक्ति है। जीवन में उसकी पहचान है। यही धर्म है उसका। जैसे वह इस सृष्टि में अद्वितीय है, वैसी स्थिति उसके धर्म की भी है। वैसा धर्म किसी भी अन्य व्यक्ति का नहीं हो सकता। व्यक्ति का स्वयं के प्रति विश्वास ही उसका धर्म होता है। आस्तिक इसे अपने इष्ट से जोड़ देता है।

 

व्यक्ति के आचरण का सूक्ष्म धरातल या कारण उसका धर्म ही होता है। वही प्राण रूप होकर उसके चिन्तन-मनन में अभिव्यक्त होता है। जीवन के प्रति उसको जागरूक रखता है। बिना धर्म के न तो जागरण (चेतना का) संभव है और न ही स्वयं का स्वरूप ज्ञान संभव है। शब्द और अर्थ (पदार्थ) में भेद नहीं होता। यह बात स्थूल दृष्टि से भले ही समझ में न आए, किन्तु जैसे-जैसे व्यक्ति स्वयं का आकलन करता जाता है, उसे स्वयं के बारे में अनके रहस्यों का ज्ञान होता जाता है।

 

सबसे पहले उसे शरीर को जानना है। भीतर को समझने का तथा भीतर प्रवेश का मार्ग शरीर ही है। आत्मा ब्रह्म है, माया शरीर है। आत्मा की चेतना के कारण शरीर जड़ होते हुए भी चैतन्य जान पड़ता है। सृष्टि में माया का स्वरूप स्पन्दनात्मक है। संकुचन प्रसरण है। यही सृष्टि सम्प्रेषण का मूल आधार भी है। समझने की बात यही है कि जिस धरातल पर स्पन्दन हैं, वहां शब्द नहीं होते।

 

स्पन्दनों का, प्राणो का, सम्प्रेषण का आधार हमारे श्वास-प्रश्वास होते हैं। यदि कोई ज्ञान हमारी इन्द्रियों की पकड़ से बाहर है तो वह हमारे मन तक नहीं पहुंच सकता। श्वास-प्रश्वास वायु के कारण नहीं होते। वायु तो हर रिक्त स्थान में रहता ही है। इसका कारण गोपीनाथ जी कविराज के शब्दों मेें सहस्रार है। इनके स्पन्दन ही अहम् कहलाते हैं। इसकी मात्रा के अनुरूप हमारे ज्ञान एवं भाव में बदलाव आता है। इस स्पन्दनात्मक सत्ता का आधार निष्क्रिय सत्ता को कहा है। यही मूल अहं हैं। क्रियात्मक देह-मध्य के केन्द्र में निष्क्रिय आत्मा है।

 

जहां क्रिया है, वहां शब्द भी है। क्रिया तथा शब्द की गति के साथ-साथ भावना/अनुभव भी साथ चलते हैं। अर्थात क्रिया, भाव तथा शब्द अभेद हैं। इनमें से किसी एक में भी यदि परिवर्तन हो सके तो शेष दोनों भी बदल जाएंगे। ध्वनि का उच्चारण व्यक्ति के भाव तथा भाव क्रिया का परिवर्तन कर देता है। इसी प्रकार भाव द्वारा क्रिया का परिवर्तन भक्ति योग में किया जाता है।

 

श्वास के ग्रहण काल में ‘अ’ ध्वनि तथा निष्क्रमण काल में ‘ह्’ ध्वनि का अस्तित्व रहता है। बोध रूपी अनुस्वार से मिलाकर यही अहम् बनता है। क्रिया एवं विचारों से बाहर निकलना ही ध्यान मार्ग को प्रशस्त करना है। निश्चित है कि इसके साथ स्वत: ही शब्द-सृष्टि भी पीछे छूट जाएगी। मन के पार जाना पड़ेगा, जिसकी चंचलता को रोक पाना सहज नहीं है। सभी ध्वनियां एवं श्वसन क्रिया को शान्त करना पड़ता है। तब जाकर व्यक्ति भीतर की ओर मुंह करता है।

 

सहज नहीं है। वैखरी शरीर अथवा अन्नमय कोश का अंग दिखाई पड़ती है। मध्यमा मन का धरातल है। दोनों ही मूल में बहिर्मुखी हैं। व्यक्ति को बाहरी विषयों से बांधे रहते हैं। इनका सम्बन्ध सूक्ष्म से भी रहता है, किन्तु अहंकार सूक्ष्म को पकड़ने नहीं देता। उदाहरण के लिए जब हम भोजन करने बैठते हैं, तब शरीर कहता है कि कौन सी वस्तु या कौन सा व्यंजन शरीर की आवश्यकता नहीं है। कितने लोग इस आवाज को सुनकर उस व्यंजन को थाली से बाहर निकाल देते हैं। जब भी आप किसी अनजान व्यक्ति के पास बैठते हो, तब शरीर के स्पन्दन व्यक्ति के अच्छे/बुरे होने की जानकारी देते हैं। क्या हम सुन पाते हैं?

 

कहीं दूर बैठा व्यक्ति हमें याद करता है अथवा कष्ट के क्षणों में आवाज लगाता है, तब क्या हमारे मन तक वह आवाज पहुंच जाती है? नहीं!  क्योंकि इसके लिए आवश्यक है कि हम स्वयं को निर्विचार रखने का, साक्षी भाव बनाए रखने का, शरीर को अनावश्यक क्रियाओं से मुक्त रखने का अभ्यास बनाए रखें। जैसे ही शरीर शिथिल होगा, श्वास मन्द होगा और सारी क्रियाएं भी मन्द हो जाएंगी। तब चेतना अथवा बोध का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। भारत में साक्षी भाव एवं एकाग्रता के अभ्यास के लिए त्राटक का प्रयोग कराया जाता है। एकाग्रता अन्तत: विलीन हो जाती है। भू-मध्य पर ध्यान का अभ्यास भी व्यक्ति को इडापिंगला से निकालकर सुषुमAा में प्रवेश करा देता है। तब एकाग्रता समय तथा अभ्यास के साथ गहन होती जाती है।

 

तब इस केन्द्र पर चित्र उभरते हैं। शब्द और ध्वनि पीछे छूट जाती है। शरीर-मन तो छूट ही चुका है। स्वयं का बोध, यथार्थ दृष्टि का प्रादुर्भाव होता है। व्यक्ति स्वयं को आवरण मुक्त पाता है। मानव जाप के कारण विज्ञानमय कोश का मार्ग खुल जाता है। शुद्ध चेतना ही ईश्वर का अंश है। सम्पूर्ण प्रकृति व्यक्ति के भ्रू मध्य में स्पष्ट चित्रित हो जाती है। शब्द और चित्र साक्षात् हो उठते हैं। ज्ञान के सहारे व्यक्ति त्रिगुण से बाहर हो कर आनन्द में लीन हो जाता है। यह चित्रमय संसार सारा पश्यन्ति का क्षेत्र है। इच्छा के साथ विषय की उपलब्धता प्रकट हो जाती है।

 

गुलाब कोठारी

 

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