Gulabkothari's Blog

मार्च 14, 2012

नाम की महिमा

राजस्थान उच्च न्यायालय में रामगढ़ बांध के भराव मुद्दे पर सुनवाई चल रही है। इसी संदर्भ में कुछ अघिकारियों के नाम भी समाचारों में पढ़ने को मिले, जिनको न्यायालय ने बुलाया। अघिकारियों के पदों को तो इस संदर्भ में कई बार पढ़ते रहे हैं। नामों की इतनी बड़ी सूची शायद ही पहले देखने को मिली हो। बैठक में सम्मिलित सभी अघिकारियों को बुलाया गया। इसका एक अर्थ है कि उन्हें नामजद बुलाया गया। जब तक अघिकारियों को पदनाम से समन भेजते हैं, उनको परवाह नहीं होती।

 

 

समन आतेे रहते हैं और अघिकारी बदलते रहते हैं। गलती कोई करता है, नोटिस किसी को मिलता है। यदि नामजद नोटिस देना शुरू हो गया तो कोई भी अघिकारी न्यायालय की अवमानना का साहस नहीं करेगा। उसके समन को तामील करने का जिम्मा भी मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक जैसे आला अफसरों पर डाला जा सकेगा। अघिकारियों के फरार रहने पर कार्यवाही भी तुरन्त की जा सकेगी अथवा आला अफसरों से पूछा जा सकेगा।

 

आज कार्यपालिका ने इस जिम्मेदारी से बचने का नया तरीका निकाल लिया है। अघिकारी पत्रों पर हस्ताक्षर तो करते हैं (भले ही लकीरें हों), मोहर भी लगाते हैं या पदनाम टाइप करवाते हैं, किंतु हस्ताक्षरकर्ता अघिकारी का नाम नहीं लिखते। ऎसे पत्रों की कानूनी वैधता क्या है? ऎसे पत्र लिखने वाले अघिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। हर मसले पर हस्ताक्षरकर्ता अघिकारी के नाम से ही नोटिस जाना चाहिए। यही बात मंत्रियों एवं राजनीति के पदाघिकारियों पर भी लागू होनी चाहिए।

 

पंचायतों, जिला परिषदों आदि के पदाघिकारियों पर भी लागू होनी चाहिए। इसका एक प्रत्यक्ष लाभ और भी होगा। कई बार विभिन्न कारणों से धमकियां भेजने के लिए भी सरकारी पत्र भेजे जाते हैं। नेता/अघिकारियों द्वारा बिना हस्ताक्षरकर्ता के नाम पत्र भेज दिए जाते हैं। पत्र की भाषा भी अस्पष्ट होती है। रिमाइण्डर भी जाते हैं। लोगों के तलुवे घिसवा देते हैं। आप शिकायत किसकी करेंगे? नाम तो किसी का होता ही नहीं पत्र पर।  ऎसे पत्रों की कानूनी वैधता समाप्त कर देनी चाहिए।

 

अब एक नया स्वरूप और सामने आने लगा है। किसी नेता के क्षेत्र में कोई बड़ा धार्मिक ट्रस्ट हो, जमीनें हों, इज्जत हो तब वह धमकियों भरे पत्र लिखवाता है- या तो ट्रस्टी बनने के लिए दबाव डालता है या पिण्ड छुड़वाने के लिए अघिकारी से पत्र लिखवाया जाता है। ऎसे पत्रों पर भी अघिकारी नाम नहीं लिखते।

 

कानूनी परिपाटी अघिकारियों के पदनाम की है, साधारण कार्य प्रणाली से जुड़े मुद्दों में पदनाम ही काफी है। लेकिन किसी मामले में यदि पदनामधारी अघिकारी जानबूझ कर कानून की अवहेलना करता है; न्यायालय के आदेशों को लागू नहीं करवाता अथवा आदेशों की अवमानना करता है तो ऎसे में उसे पदनाम के साथ-साथ नामजद बुलाया जाना अघिक न्याय संगत होगा। इस पर माननीय न्यायालय विचार कर सकते हैं। आज तो द्वेष भाव से भी कई अघिकारी कानून से बाहर जाकर आदेश जारी करते हैं।

 

इसे सामान्य कार्य प्रणाली नहीं माना जा सकता। ऎसी स्थिति में व्यक्ति विशेष की जिम्मेदारी के आधार पर निर्णय होने चाहिए। लोकतंत्र में न्याय की भूमिका सर्वोपरि है। उसी के भय से बहुत सा कार्य सही चलता है। इस दृष्टि से सरकारी पदों पर बैठे लोगों को नामजद पार्टी बनाना, सेवानिवृत्ति के बाद भी बुलाया जाना अनिवार्य होना चाहिए। आम नागरिक तो मरते दम तक कोर्ट जाता रहता है। मरने के बाद भी उसके बच्चे कहां मुक्त होते हैं!

 

गुलाब कोठारी

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: