Gulabkothari's Blog

मार्च 16, 2012

राजनीतिक क्रूरता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक पैंतरेबाजी एवं अघिनायकवादी वक्तव्यों के पर्याय के रूप में जानी जाती हैं। सत्ता का मद, त्रियाहठ तथा राजनीतिक अकेलेपन की झुंझलाहट उन्हें अशान्त ही किए रहते हैं। फिर संकुचित मानसिकता वाले चाटुकार उन्हें बड़प्पन का व्यवहार ही नहीं करने देते। उन्होंने तो बंगाल को राष्ट्र से भी बड़ा दर्जा देकर ममता के हाथ में झण्डा पकड़ा रखा है। किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, नुकसान केवल ममता का होता है।

 

 

रेल बजट पर की गई ममता की प्रतिक्रिया में उनका अघिनायकवाद चरम पर था। लोकतंत्र तो जीवित भी नहीं था। रेल-बजट की घोषणा के बाद जो व्यवहार उन्होंने रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी से किया और धमकी देकर इस्तीफा मांगा, वह लोकतंत्र की मर्यादाओं के बिल्कुल विपरीत था। उनको अघिकार ही नहीं था कि वह इस्तीफे की धमकी देतीं। किराया बढ़ाने का निर्णय प्रधानमंत्री के साथ मिलकर तय होना चाहिए। रेल मंत्री की हैसियत एक दत्तक पुत्र जैसी है।

 

ममता ने प्रधानमंत्री को सौंप दिया, फिर उनका अघिकार नहीं रह जाता। हां, इसके लिए महिने-दो महिने पहले अनौपचारिक बातचीत करके अपनी मंशा जता सकती थीं। रेल बजट के पूर्व हर निर्णय हो सकता था। जिस रेल बजट से पूरा देश खुश हुआ, उसे नकारकर ममता ने राजनीतिक क्रूरता का ही परिचय दिया है। रेल मंत्री को बदलकर भले ही ममता अपने अहंकार की तुष्टि कर लें, किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर तो उनका सम्मान ही घटा है। दिनेश त्रिवेदी के वक्तव्य में अघिक बड़प्पन है। उसके आगे ममता बहुत छोटी पड़ गई जान पड़ती हैं।

 

ममता, केन्द्र सरकार की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करती ही रहती हैं। जैसे रिटेल व्यापार में सीधे विदेशी विनियोजन, पेट्रोल-डीजल के मूल्यों में बढ़ोतरी, आतंकवाद निरोधी केन्द्र को लेकर राज्यों की स्वायत्तता में दखल, तीस्ता नदी जल विवाद और किसानों की भूमि का अघिग्रहण के मामले। हर बार नाराजगी का व्यवहार जैसे उनकी पहचान बन गई।

 

अत: इस बार भी उनका व्यवहार नया नहीं था। किन्तु इस बार उनकी भाषा में द्वेष भाव की गंध आ रही थी। रेल मंत्री के लिए तो शायद उनके मन में शत्रुता का भाव हो। सरकार ने मजबूरी में सब कुछ स्वीकार भी लिया। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के शपथ ग्रहण में ममता के सम्मिलित होने की चर्चा को भी इसी के साथ जोड़कर देखा जाए, तो समझ में आ जाएगा कि आने वाले समय में वह स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहीं। केन्द्र सरकार भी कुछ नए समीकरणों की ही प्रतीक्षा कर रही है कि कब ममता को छिटकाकर अलग किया जाए। ममता के लिए यह वातावरण लाभकारी नहीं है। पूरा देश केन्द्र की इस मंशा पर चर्चा करता है।

 

समय जिस रफ्तार से बदल रहा है, युवा जिस प्रकार राजनीति में उछालें मार रहा है, वहीं ममता अभी भी वहीं की वहीं हैं। वह केन्द्र को भी पहले जैसा मानकर ही व्यवहार कर रही हैं। इससे बड़ी गलतफहमी और क्या हो सकती है? जिस सकारात्मक भाव से पश्चिम बंगाल ने उनका स्वागत किया था, वह गर्मी तो इतनी जल्दी ठण्डी पड़ जाएगी, किसने सोचा होगा।

 

इसके लिए सबसे पहले उन्हें स्वयं पर विश्वास करना पड़ेगा। स्वयं के संकल्प को साथियों का संकल्प बनाना होगा। प्रदेश को विश्वास में भी लेना होगा। उससे भी आगे, उन्हें सहन करने की क्षमता, धैर्य एवं बड़प्पन दिखाना होगा। तब उसका कोई सकारात्मक स्वरूप सामने आने की संभावना बनेगी। समय रहते चिन्तन होना जरूरी है। पुराने अनुभवों का लम्बा इतिहास उनकी आंखों में तैर रहा है। सार्वजनिक रूप से भूलों का प्रायश्चित करना भी अभी तक इस बड़ी नेत्री के स्वभाव में नहीं दिखता।

 

गुलाब कोठारी

 

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: