Gulabkothari's Blog

मार्च 25, 2012

स्त्री-1

मैं ब्रह्म का अंश हूं । पुरूष हूं । माया से घिरा हूं । वही मेरे आवरण बना रही है, ताकि नंगा नहीं दिखाई पडूं। वही मेरा शरीर है, योनि है, रूप है। माया ही दिखाई देती है । ब्रह्म केन्द्र में है । अर्थात मैं ही पुरूष भी हूं, शक्ति रूपा स्त्रैण भी हूं । मैं ही अगिA भी हूं, सोम भी हूं । मैं आक्रामक भी हूं , समर्पण कर्ता, ग्रहण कर्ता भी हूं । मैं पोषक हूं, विस्तार करने का निमित्त भी हूं । मैं ही इच्छा हूं  और मेरी इच्छा के बिना कोई ब्रह्म तक नहीं पहुंच सकता। मेरा यह संकल्प भी है कि मेरे रहते कोई ब्रह्मलीन नहीं हो सकता। ब्रह्म चूंकि पुरूष है, अत:उसमें दूसरा पुरूष लीन नहीं हो सकता। निश्चित ही उसे स्त्रैण होना ही पडेगा। इसीलिए शायद मेरा पुरूष भाव माया भाव से ढका है। वही मुझे मार्ग देगी अथवा उसी में से मुझे मार्ग बनाना है। 

 

सृष्टि के हर पिण्ड के केन्द्र में ब्रह्म है और परिघि पर माया। प्रत्येक प्राणी, पेड़, पर्वत या कीट-पतंगे, सभी का एक ही सिद्धान्त है। इसीलिए दूसरों की तरह मैं भी अर्द्धनारीश्वर हंू। यह एक दूसरा सिद्धान्त है। इसमें दायां भाग पुरूष भाव का एवं बायां भाग स्त्रैण अथवा वामा अथवा सौम्या कहलाता है। हमारी सृष्टि युगल सृष्टि है। अगिA -सोम के योग से ही आगे बढ़ती है। अत: सृष्टि  में प्राणियों की नर और मादा संज्ञा है। हम नर-नारी या मानव -मानवी कहलाते हैं। मैं अपने स्वरूप में नर रूप का प्रतिनिघि हूं। तो यह चुनौती तो मेरे भी सामने है ही कि यदि मुझे ब्रह्म में लौटना है, तो उसके लिए पुरूष शरीर में भी स्त्रैण तो बनना ही पड़ेगा। अब समझ में आता है कि जीवन में इतने द्वन्द्व क्यों होते हैं। युगल सृष्टि ही द्वन्द्व का मूल है। विद्या-अविद्या भी द्वन्द्व है।

 

भीतर का पुरूष-स्त्री भाव भी द्वन्द्व का बड़ा आधार है। विषय का अपना द्वन्द्व तो है ही । जैसे -सुख-दु:ख, अच्छा-बुरा, हिंसा-दया आदि। ये सारे द्वन्द्व तो माया प्रदत्त ही हैं। पुरूष तो कर्ता है ही नहीं। हां, माया की सारी गतिविघियो का नियन्ता अवश्य है। इसका नाम है सर्वकृतत्व। उसके सभी कार्यो में चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया मुख्य भूमिकाएं हैं।

 

जीव भाव में उसकी अभिन्न स्वातं˜य शक्ति ही उसकी आनंद  घनता है। आनन्द का चमत्कार ही इच्छा शक्ति, प्रकाश रूपता ही चिद्शक्ति, विमर्शमयता ही ज्ञान शक्ति और प्रत्येक प्रकार  आदि को अवभासित करने का सामथ्र्य ही क्रिया शक्ति है। अर्थात् जो कुछ माया प्रकट कर रही है, वह ब्रह्म के ही भाव हैं। व्यवहार में माया का रूप इच्छा -ज्ञान-क्रिया अथवा मन-प्राणवाक् है। चूंकि ब्रह्म स्वतंत्र ज्ञाता और कर्ता है, अत: उसकी मुख्य शक्ति भी स्वातं˜य ही कहलाती है। उसी को चेतना, चिद्शक्ति, संवित , विमर्श आदि नामों से कहा जाता है। मूल में अहं-विमर्श को ही शक्ति का मूल स्वरूप कहते हैं। यही प्रसार-संकोच रूप स्पन्द कहा जाता है। मुझे अपने भीतर स्त्री भाव को इसी रूप में ढूंढ़ना होगा।

 

स्त्री भाव का दूसरा रूप है सौम्या। सोम रूप भी, शीतल भी और इसके साथ-साथ अगिA को सदा समर्पित भी। पुरूष के लिए तो समर्पण सहज नहीं, मजबूरी हो सकती है। आप किसी सात-आठ साल की बच्ची को देखें कि किस प्रकार अपने छोटे बहन-भाई का पालन करती है तथा मां के कार्यो में हाथ बंटाती है। इसी उम्र के बच्चे  को देखें। ठीक  विपरीत भाव में जी रहा होगा। छोटे बहन-भाईयों से छीना-झपटी, मार-पीट, घर से बाहर भटकना।

 

इसमें स्त्रैण तो जरा भी नहीं। कहां झलकता है अर्द्धनारीश्वर? स्कूल-कॉलेज तक भी नहीं। अहंकार ही बढ़ता दिखाई पड़ता है। खाने की थाली, पहनने के कपड़ों से लेकर मित्रों का आना-जाना, खेलना और परिवार के प्रत्येक सदस्य से अपेक्षा भाव। खुद बदले में नहीं के बराबर या रौब  मारकर चले जाना । लड़की के मन में इस तरह का अपेक्षा भाव शायद सम्पन्न एवं अति शिक्षित परिवारों में अघिक हो। यह कोई छोटा-सा उदाहरण मात्र नहीं है। दोनों में (लड़के-लड़की में ) नर-नारी के अंश होते हैं और एक शुद्ध नर तथा दूसरी शुद्ध नारी ही दिखाई देती है। इनका दूसरा अर्द्धांग कहां दबा रहता है? आज तो स्थिति एक कदम और आगे जाती जान पड़ती है। किसी विकसित देश की बच्ची को देखो। उतनी ही स्वच्छन्द जितना कि एक लड़का। सौम्यता का भाव शरीर से आगे दिखाई ही नहीं देता। इतना तो कुदरत के हर मादा प्राणी में भी होगा।

 

सह शिक्षा के वातावरण में न पौरूष का अंश दिखाई देगा, न ही स्त्रैण भाव। किसी पर भी एक-दूसरे का प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता। इससे ज्यादा नुकसान मानवता का और क्या हो सकता है। शरीर रह गया, मानव मर गया। शरीर से सौम्या दिखने वाली भीतर आग्नेय हो गई। समाज को जला देने वाली जैविक नारी जो पूरी तरह आत्मा से अनभिज्ञ है। केवल शरीर को शाश्वत मानकर इसी के लिए जी रही है। तब क्यों मुझे अहिल्या, मीरां, द्रोपदी, मन्दोदरी, सावित्री और शबरी जैसी गाथाएं सुनाई गई। जिन-जिन मूल्यों के आधार पर जीवन का उत्थान परिभाषित किया गया था, समाज ने क्यों निकाल दिया जीवन से? आज तो किसी को जीने और मरने मे भेद ही दिखाई नहीं पड़ता। कैसे  कोई पुरूषार्थ का मार्ग समझ पाएगा। मरते दम तक आज का आदमी गृहस्थाश्रम नहीं छोड़ना चाहता। इन सबका एक कारण यह भी है कि माया शक्ति के बजाए शिव बनने को बेचैन हो उठी।

 

कभी हम शक्ति के उपासक थे, आज उसके खून के प्यासे हो गए। जीवन की सारी कामनाओं की पूर्ति के  आधार भग नाम की छह शक्ति-स्वरूप थे। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, यश, श्री और ऎश्वर्य  (अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति प्राकाम्य, ईशीत्व और वशीत्व)। यही जन्म-स्थिति-मृत्यु का आधार भी है।

 

विवाह का संकल्प ही शक्ति का प्राकट्य है। वहीं से जीवन में क्षुधा का प्रवेश है। माया का यही इच्छा रूप प्रवेश है। क्षुधा एवं तृप्ति के मध्य का काल विद्या और अविद्या पर आश्रित रहता है। प्रारब्ध भी चलाता है। तृप्ति के साथ शक्ति भी बढ़ती है और तृष्णा भी। जीवन के हर भाव के साथ द्वन्द्व भी रहता है। माया ही कारण है। वही निवारण भी है। कलियुग के इस चरण में प्रलय की तैयारियां करनी है। यह भी माया का ही कार्य है। एक माया जो बाहर पत्नी रूप में कार्य करती है। दूसरी माया भीतर अर्द्धनारीश्वर का अंग है। बाहर और भीतर की नारी में आम तौर पर सामंजस्य रहता है। अत: दोनों मिलकर पुरूष को दाम्पत्य रति-श्रध्दा, वात्सल्य, स्नेह तथा प्रेम में निष्णात कर देती है। इसी के सहारे देवरति में प्रवेश संभव होता है।

 

आज चूंकि बाहर की स्त्री का भी अहंकार तथा उसके भीतर का पौरूष भाग अघिक विकसित हो रहा है, अत: सृष्टि में पौरूष भाव बढ़ रहा है। भले ही कन्याओं का औसत भी बढ़ रहा है भीतर का पौरूष भाव ही बाहर के स्त्रैण को दबाता जाएगा। तब गुलाब के साथ एक नारी शरीर जी रहा होगा, जिसके पास भोग की कामना होगी, किन्तु माधुर्य नहीं होगा। भाव नहीं होंगे। दाम्पत्य रति में प्रवेश वर्जित हो जाएगा। भक्ति मार्ग पर ताले लग जाएंगे। होगा तो बस तर्क होगा, जिरह और कलह होगा। एक दूसरे का अपमान करके अहंकार की तुष्टि होगी। सम्बंधों का आधार बुद्धि ही होगी। अत: सतही रूप से आगे कभी जा नहीं पाएंगे।

 

यही कारण है कि ऎसी पुरूषत्व पर आधारित नारी को संस्कार देने का दायित्व सौंपा भी नहीं जा सकता। स्वच्छन्दता के स्वभाव के कारण समर्पण, अनुशासन, प्रतीक्षा, श्रध्दा जैसे शब्द भी परिवार में स्थान नहीं पा सकेंगे। गुलाब के बच्चों को संस्कृति एवं सभ्यता का आधार नहीं मिल सकेगा। तब केन्द्र के प्रति चेतना तो कभी जाग्रत होगी ही नहीं। नित्य परिवर्तन के कारण परिघि अथवा बाहरी बदलाव ही भोग का कारण रह जाएगा।

 

आहार, निद्रा, भय, मैथुन का माया जाल व्यक्ति को चेतना की ओर जाने ही नहीं देगा। मानव का विद्या से सम्पर्क, धर्म और मोक्ष की अवधारणा से परिचय भी नहीं होगा। जिस माया के सहारे आवरण हटाकर आत्म साक्षात् किया जा सकता है, वही अज्ञान-वश पाश बनकर पुनर्जन्म को प्रेरित करती रहेगी। पुरूष अपने भीतर के स्त्री भाव को कभी समझ नहीं पाएगा। उसका विकास नहीं होगा। पुरूष आकर्षित कैसे होगा ?

 

गुलाब कोठारी

 

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