Gulabkothari's Blog

अप्रैल 1, 2012

स्त्री-2

हमारे सभी शास्त्र देवियों तथा सतियों की गाथाओं से भरे पड़े हैं। पुरूष स्वरूप की चर्चा उस रूप में नहीं है। पुरूष रूप देवता के भी चार ही हाथ बताए हैं, किन्तु çस्त्रयों के तो आठ-दस से लेकर हजार हाथ तक बताए हैं। तत्व रूप से तो देवी भी पुरूष भाव ही है। यह सारी विवेचना कथा-कहानियों के माध्यम से होेते हुए भी सृष्टि के वैज्ञानिक भाव की है । लिपि के अभाव में कथा या गति ही सम्प्रेषण का माध्यम हुआ करता था ।

 

सम्पूर्ण  सृष्टि रचना का आधार शक्ति को माना । मानव समाज में भी नारी पूर्णता का, पूरकता का द्योतक है। परिवार नारी के ही चारों ओर चलता दिखाई पड़ता है। नारी ही पुरूष का स्वरूप निर्माण भी करती है। मन्दोदरी को रावण के गुण-दोष मालूम थे। जब तक रावण जीवित रहा, वह उसे दोष मुक्त करने के लिए प्रयास करती ही रही। रावण का कोप भाजन भी होती रही। यह सोच पाना भी सहज नहीं है कि उस असुर सम्राट ही पत्नी आध्यात्मिक मूल्यों पर टिकी रह सके। पति के असुर रहते हुए भी उसे शिव का महाशिरोमणि बनने को प्रेरित कर सके।

 

भारतीय उपासना का बड़ा आधार शब्द ब्रह्म रहा। यही अभिशाप, वरदान और प्रार्थना रूप में फलित होता रहा है। पति के प्रति पत्नी का भाव सारे परिणामों का आधार रहा है। शब्द चेतना को जगाने का प्रमुख जरिया भी रहा है। सुप्त चेतना की मृत संज्ञा है। अहिल्या की चेतना को राम के स्पर्श ने जगाया । पति की हार को स्वीकार नहीं करती तो क्या द्रोपदी चीर हरण होता? कृष्ण प्रकट होते! द्रोपदी ने दुर्योधन के साथ रहने के बजाए इतने बड़े अत्याचार को सहना सही माना।

यह उसके संकल्प की ही शक्ति थी। इसके बिना अर्जुन कभी अर्जुन नहीं बन सकता था।
भक्ति का अर्थ ही ‘अंग बन जाना’ है। यह कार्य स्त्री ही कर सकती है। वह मां-बाप को छोड़कर पति के साथ, उसका अंग बनने के लिए (सदा-सदा के लिए) आ जाती है। अंग बनने की पहली शर्त या अनिवार्यता है-स्त्रैण भाव। इसके अभाव में भले ही पति अंग न बन पाए, किन्तु स्त्री तो बन जाती है। उसका पूरी उम्र यह प्रयास भी  रहता है कि पति को भी अंग बनना सिखा दिया जाए, ताकि समय आने पर वह भक्ति मार्ग में प्रवेश करके ईश्वर का अंग हो सके ।

 

स्त्रैण होना कठिन इसलिए भी है कि  उसे सदाआंघियों से, गर्जनाओं  और वर्जनाओं  से टकराना या संघर्ष करना पड़ता है। पुरूष का अहंकार, सास-ससुर का दोगलापन, पुरूष प्रधान समाज की मन-मानी, अशिक्षा जैसे अनेक अवरोधक आते हैं उसकी राह में। फिर भी भारतीय नारी अपने पति को ही केन्द्र में रखकर जीती हैं। उसने स्वयं को कभी केन्द्र में नहीं रखा। जिसने स्वयं को केन्द्र में रखने का प्रयास किया वह आगे चलकर अकेली पड़ गई।

इसका कारण हमारा अज्ञान ही है। हम दृश्यमान स्थूल शरीर के द्वन्द्व (नर-नारी रूप) में ही जीते हैं। शेष तीन चौथाई समानता हमारी चर्चा का विषय ही नहीं बनती। शरीर की भिन्नता ही दोनों को एक-दूसरे का पूरक बनाती है। जिस बोरी में बीज भरे होते हैं उसमें तो पेड़ नहीं उग सकते। इसके लिए तो जमीन चाहिए। बीज बदल सकते हैं, जमीनें नहीं बदल सकतीं। जमीन ही प्रकृति है, योनि है और सन्तान ही इसका यश है। यही ब्रह्म का ‘एकोहं बहुस्याम’ भी है ।

 

सृष्टि का विस्तार है। इसमें ही आनन्द रहता है। उत्तम योनि से ही ज्ञान का यश मिलता है। वरन् सन्तान तो हर प्राणी के होती है। पुरूष पीछे मुड़कर देखे तो समझ जाएगा कि सन्तान को यशस्वी बनाने में उसकी क्या भूमिका रही। कम से कम मेरी तो नहीं रही। बच्चे सूक्ष्मअंश (प्राण) भाग पिता से ग्रहण करते हैं और मन माता से ।

स्त्री जब अपने पति पर गर्व करते हुए जीती है, तब सन्तान स्वत: ही पिता का प्रतिनिघित्व करने लग जाती है। विपरीत दिशा में पिता का अनुशासन मानना जीवन में अनिवार्य नहीं होता । वहां मां की आज्ञा चलती है। तीसरी पीढ़ी  परिवार के संस्कारों से वंचित हो जाती है। यश का विस्तार रूक जाता है। पिता के अहंकार से भी परिणाम यही आता है।

 

विवाह पूर्ण सम्बन्ध भय के कारक भी होते हैं जो निखार को रोक देते है। यह सौन्दर्य विवाह के साथ ही बढ़ने लगता है। इसी को ‘श्री’ कहते हैं। भोग और अति भोग ही आगे वैराग्य का कारक बनता है। अत: भग की सभी संज्ञाऎ भाग्य से जुड़ी रहती है। यही माया आवरण कहलाता है। पति की स्वच्छन्दता ही पत्नी की संघर्ष भूमि या युद्ध क्षेत्र है। शायद पति के अविद्या भाव से संघर्ष करके पति को मोक्ष मार्ग पर चढ़ाने के लिए ही पत्नी मां -बाप को छोड़कर पति के साथ रहती है। पति की शक्ति रूपा बनकर गौरवान्वित होती है। आज की शिक्षा ने नारी का गौरव छीन लिया है। भौतिकवाद और धन के लोभ ने दहेज हत्याओं का ग्राफ बढ़ा दिया। भ्रूण हत्याओं (कन्या की ) का कलंक स्त्री के माथे जड़ दिया और अब तो स्त्री को भी भोग की वस्तु बना दिया।

 

तब इसकी सन्तान मानवता से बदला नहीं लेगी? आज की मैकाले की अथवा कैरियर आधारित शिक्षा इसका हल भी नहीं हैं। नारी को समझने के लिए प्रकृति के स्वरूप को समझना पडेगा। नारी देह का ज्ञान उपयोगी नहीं हो सकता। नारी प्रकृति स्वयं है। अनाहत नाद है, ध्वनि और स्पन्दन है। नारी सरस्वती और मन की प्रतिनिघित्व है। पुरूष शब्द के पीछे भागता है। उसे नाद को समझना सहज नहीं लगता। वह बुद्धि एवं बुद्धि के जनक-अहंकार का प्रतीक है। स्थूल है। उसके भीतर का स्त्रैण बहुत ही अल्प होता है। उसके शब्द लोगों के कानों से टकराकर लौट जाते हैं। किसी के काम नहीं आते ।

 

वह स्वयं भी उनको नहीं सुनता। पत्नी कैसे सुनेगी? वह यदि सुनने लगी तो मान लेना दोनों में टकराव बढ़ जाएगा। वह भी पुरूष जैसे सोचने वाली हो गई। शब्दों को पकड़ने लग गई। भाव -भूमि छूट गई। शब्द तो शरीर है। भाव उसकी आत्मा है। शरीर ही माया है-आवरण है। शरीर की सृजन धर्मिता बहुत छोटी होती है। उसमें व्यक्ति का बड़ा योगदान नहीं होता। हां, यदि मां चाहे तो बहुत कुछ कर सकती है, जब सन्तान पेट में हो पिता कुछ नहीं कर पाएगा। हां।

 

यदि अनाहद की साधना करने लगे तो उसका सृजन ऊध्र्वगामी होने लगेगा। क्योंकि ध्वनि ही भाव से जुड़ती है। शब्द आगे निकल जाते हैं। मां बिना शब्द के शिशु से बात कर सकती है। यही अभ्यास वह जब पति पर प्रयोग करती है, तब आpर्य घटित होता है। पुरूष को परोक्ष भाषा नहीं आती। नारी प्रत्यक्ष से बचती है। जीवन की विडम्बना भी यही है। इसमें पुरूष को ही मन के धरा-तल की ओर बढ़ना पड़ेगा। उसका भावनात्मक धरातल भी गहरा होगा, दाम्पत्य सुख भी बढ़ेगा। इसी के आधार पर पत्नी के पुरूष भाव का पोषण भी होगा। इसी में दोनों की पूर्णता निहित है।

गुलाब कोठारी

 

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