Gulabkothari's Blog

अप्रैल 15, 2012

कविताएं

स्पन्दन

 

ध्वनि और शब्द के

पकड़ने लगे हो

तुम अब

अगस्त्य!

कैसे चौंकते हो

सुनकर आवाज

परिचित की,

देखने लगते हो

चारों ओर

तलाशने को

ध्वनि स्त्रोत,

कैसे टिक जाती

आंखें तुम्हारी

फोन पर

सुनकर

परिचित सम्बोधन

मानो

खोज ही लोगे

उसको

भीतर घुसकर

फोन में,

विस्मित करता है

तुम्हारा विस्मय

इन क्षणों में

जैसे निकला हो

ढूंढ़ने ब्ा्रह्म

अपनी माया को!

 

एक आमंत्रण

मुस्कान भरा

खिलखिलाहट से

कर देता है

स्पन्दित मन को,

और फैला देना

बांहों का

तुम्हारा अगस्त्य,

बिखेर देता है

छटा स्वर्ग-सी

उतर आते हैं

कृष्ण

पृथिवी पर

गोलोक से!

111

क्या बात है

आद्या,

तुम्हारी सृष्टि

शब्दों की

करती इंगित

तुम्हारा संवाद

सितारों के पार

ब्ा्रह्माण्ड से,

नाद बस है

हमारे लिए तो,

खो जाती हो

तुम तो

शब्द सृष्टि में,

स्वत: ही

होते उच्चारित

शब्द तुम्हारे

कोमल और मीठे,

गुदगुदाते हैं

रहस्यमय ढंग से

हम सबको,

देखना चाहते हैं

रहस्यमय संसार

तुम्हारा,

जो करेगा

निर्माण तुम्हारा

इस जीवन में,

बनकर

शब्द ब्ा्रह्म!

 

बीत गया

एक और साल

तुम्हारा आद्या,

कौन-सी कलाएं

पाई तुमने

ष्ाोडशी से,

जहां होगी

पूर्णता तुम्हारी

कितना कर चुकी

आवरित ब्ा्रह्म को

केन्द्र में,

पौरूष्ा और स्त्रैण

कितना-कितना,

अग्नि और सोम से

करना है निर्माण

चुनना उचित अन्न

पुष्ट हो शरीर

तुष्ट हो मन

जहां उठे

उचित कामना

ऊध्र्व गमन की,

कुछ देने की

लोक सेवा की

भूलकर अस्तित्व

स्वयं अपना!

 

धारा

सदा ले जाती

दूर

बहुत दूर

उद्गम से,

बहते हुए नीचे

सागर तक,

छोड़कर शिखर

सदा के लिए।

राधा,

धारा के विरूद्ध

उठाकर मिलाती है

फिर अपने आप से,

अव्यय कृष्ण से।

 

प्रशंसा करते रहो

भले झूठी ही

चिपके रहेंगे लोग

झूठ-मूठ ही,

करते रहेंगे

आपका यशमान भी;

यदि कर दी आलोचना

भूलकर भी

उनके कृत्यों की,

तो उतर आयेंगे

उजाड़ने को

तुम्हारा संसार सारा,

यही अर्थ है आज

‘निन्दक नियरे राखिए’

मुखौटे का राज।

 

कितने ढंग हैं

सृजन करने के

तुम्हारे

आद्या,

मिट्टी

आज भी श्रेष्ठ

माध्यम है,

और आकृतियां

भिन्न-भिन्न

बनाती रहती हो

सारे दिन

रंगों से,

रंगीन मिट्टी से,

चन्दा मामा,

फिश,

लकीरें, गोले

अनगिनत

हथेलियों में

तलुओं में

मेहंदी की तरह,

स्रष्टा भी

सहांरक भी

सृष्टि पांव तले,

क्या पता तुमको

क्या होता है

इस खेल में

सृष्टि का!

 

गुलाब कोठारी

 

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