Gulabkothari's Blog

अप्रैल 19, 2012

अन्नदाता का दर्द

कलियुग के इस स्वरूप का वर्णन तो किसी शास्त्र में नहीं मिलता है कि सत्ता के हस्ताक्षर अन्नदाता के जीवन से होली खेलकर अट्टहास कर रहे हैं। अन्नदाता की अन्नपूर्णा की तो सर्वत्र पूजा होती आई है। ऋषि मुनियों ने शायद ऎसे हाथी के दांत जैसे दिखावटी लोकतंत्र की कल्पना ही नहीं की। जनता के हित के नाम पर बनाए गए कानूनों की अवज्ञा और अतिक्रमण करके आसुरी शक्तियां किस प्रकार जनता में त्राहि-त्राहि पैदा कर रही है। लोगों को आत्महत्याएं करने पर मजबूर कर रही हैं। शासन-प्रशासन न्याय, सभी कहीं तो मूकदर्शक हैं, कहीं चिताओं की आग में अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। संवेदनशीलता की हद शायद द्वापर या त्रेता युग में ही छूट गई। इसके बाद शिक्षा से इसका नाम ही मिटा दिया गया।

 

 

राजस्थान के किसान समर्थन मूल्य, खाद, बिजली, पानी जैसी समस्याओं को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। दूसरी ओर, मध्यप्रदेश हो या छत्तीसगढ़ अथवा आंध्रप्रदेश, किसानों की आत्महत्याओं का आंकड़ा तो बढ़ता ही जा रहा है। कारण कर्ज का चुकारा न कर पाना। सरकार और प्रशासन में एक भी अघिकारी इसका कारण नहीं समझ सका, यह तो संभव नहीं है। इसका उत्तर मिलीभगत ही है। मूलरूप से तीन प्रमुख कारण प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। अप्रत्यक्ष तो हर क्षेत्र में अपने-अपने हैं। जरा गौर करें!

 

एक: बीमा कंपनियां, जो फसलों का बीमा करती हैं। अग्नि, अकाल, अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली क्षति की पूर्ति करने के लिए जरा इन प्रदेशों के आंकड़े निकालकर देखें कि बीमा कंपनियों ने किसानों से कितनी राशि समेटी और मुआवजे के पेटे कितना भुगतान किया गया। प्रतिवर्ष के आंकड़े उपलब्ध हैं।

 

किन कारणों से मुआवजा नहीं दिया गया, यह असली शोध का विषय है। कहीं-कहीं तो राजस्व रिपोर्ट के आंकड़ों में भी हेराफेरी पकड़ में आ जाएगी। जहां नुकसान इतना कम करके बताया जाता है कि मुआवजा देना ही न पड़े। मध्यप्रदेश भारतीय किसान संघ के प्रांतीय अध्यक्ष तो इस शिकायत को बड़े-बड़े कानों तक पहुंचा भी चुके हैं। अब तो वे स्वीकार करने लगे हैं कि जब मुआवजा मिलता ही नहीं है, तो किसान फसलों का बीमा करवाकर क्यों इसकी किस्तें भरे।

 

दूसरा बड़ा कारण: किसान क्रेडिट कार्ड है। मध्यप्रदेश में तो इस योजना ने निजी क्षेत्र के सूदखोरों को भी पीछे छोड़ दिया। यह योजना अघिकारियों की दरिंदगी का एक अच्छा उदाहरण है।

 

किसानों को उनकी जमीन और पैदावार के अनुपात में एक (साख) ऋण सीमा तय करके उस रकम को किसान के खाते में डाल दिया जाता है। किसान को इसकी जरूरत हो या नहीं उसे इस राशि पर ब्याज तो देना ही पड़ेगा। यदि कभी उसे कुछ राशि की जरूरत पड़ी तो उससे सात प्रतिशत ब्याज वसूला जाता है। जबकि उसकी जमा रकम पर बैंक केवल ढाई प्रतिशत ही देती है। एक-एक किसान का सालभर का आर्थिक भार बिना धन के उपयोग के कितना हो जाता है, इसके आंकड़े उपलब्ध तो हैं, लेकिन देखे कौन? अघिकारियों की आंखों पर पियां बंधी हैं। इन पर तो आपराघिक मुकदमे चलने चाहिए।

 

न्यायपालिका को प्रसंज्ञान लेने के लिए मृत्यु और आत्महत्या से बड़ा कारण क्या मिलेगा? तीसरा और जानलेवा कारण है सरकारी बैंकों की दादागिरी। धान खरीदा, राशि किसान के खाते में जमा दिखा दी। जब किसान पैसा निकलवाने जाता है तब उत्तर मिलता है कि बैंक में पैसा ही नहीं है। इन बैंकों के रिकॉर्ड की तो सीबीआई से जांच होनी चाहिए और किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले पदाघिकारियों को भी उम्रकैद तो होनी ही चाहिए।

 

आज किसान के सामने कितनी तरह की समस्याएं है, जिनका निराकरण स्वयं जिला प्रशासन को करना चाहिए। सच्चाई यह है कि अनेक समस्याएं जिला प्रशासन की अक्षमता के कारण ही पैदा होती हैं। पिछले कुछ महीनों में जितने किसान आंदोलन हुए हैं, वे सब खाद, बीज, बिजली, पानी और सड़क जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर ही हुए हैं।

 

खरीद में घोटाले, किसानों के खून-पसीने की कमाई का अनाज बारिश में सड़ने, बाहरी अनाज की खरीद जैसे कारनामों को भी अघिकारी ही अंजाम देते हैं। फसलों की बुआई में पहले जितनी नापतौल होती थी, अब नहीं होती। यही कारण है कि कई फसलें जरूरत से ज्यादा हो जाती है। भाव घट जाते हैं। किसान ही रोता है।

 

किसान पर पड़ने वाली इस मार का एक अन्य कारण मानसिकता भी है- होड़ की। मेरे पड़ोसी के पास ट्रैक्टर है, तो मेरे पास क्यों नहीं। स्पर्घा की मानसिकता भी कुछ लोगों को ऋण लेने के लिए मजबूर करती है।

 

लेकिन इन लोगों की संख्या कम है। जिस प्रकार अनाचार का वातावरण बन रहा है, किसानों को यह तो विचार कर लेना चाहिए कि उधार लेने की प्रवृत्ति रोकें या किसी सलाहकार का सहयोग अवश्य लें। कम से कम जिन सहकारी संस्थाओं में धन के साथ खिलवाड़ किया जाता है, उनके विरूद्ध किसान संघ के माध्यम से कार्रवाई हो। ध्यान रहे-अन्नदाता को बचाना ही देश की पहली सुरक्षा है। उसके साथ-साथ खेती की जमीन भी सुरक्षित रहे।

 

गुलाब कोठारी

 

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