Gulabkothari's Blog

अप्रैल 22, 2012

उपलब्घि-1

आज युवा के सामने भी एक नहीं अनेक विकल्प हैं सूचना ग्रहण करने के- टीवी, इण्टरनेट, मोबाइल फोन आदि। शिक्षा में भी इन्हीं उपकरणों की भूमिका बढ़ती जा रही है। इस कारण व्यक्ति की अकेले, स्वयं के लिए, जीने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। समाज, देश और यहां तक कि स्वयं के जीवन का भी कोई चिन्तन नहीं रह गया है।

 

 

एक ही उत्पाद बचा है-कैरियर और वह भी बिना किसी संवेदना के, बिना मानवीय मूल्यों के। बिना आत्मिक तथा भावनात्मक धरातल के। बिना किसी स्थानीय इतिहास, भूगोल के। तब ऎसा शिक्षित व्यक्ति समाज अथवा राष्ट्र के चिन्तन का समावेश कैसे कर पाएगा? घर पर मां-बाप के पास समय नहीं, स्कूल की पुस्तकों में आदमी की चर्चा नहीं। शास्त्र कोई पढ़ना नहीं चाहता। फिर जीवन में चेतना की चर्चा कौन करेगा। सूचना का तंत्र जड़ का प्रसार करता है।

 

कैरियर भी आदमी को जड़ के पीछे दौड़ने को प्रेरित करता है। भौतिकवाद और भोगवाद भी जड़ शरीर पर ही टिके हैं। तब स्वस्थ मानव समाज का निर्माण कैसे संभव है। उसके लिए तो चेतना का विकास पहली जरूरत है। व्यक्ति को स्वयं के भीतर झांकना होगा। मीडिया ही वह शास्त्र है जिसे व्यक्ति रोज देखता-पढ़ता है। यही एक मार्ग बचा है, जो समाज को उन्नति के शिखर पर ले जा सकता है। रसातल में भी पहुंचा सकता है। इसकी सामाजिक शिक्षण में सकारात्मक भूमिका चमत्कारिक साबित हो सकती है।

 

चंूकि आज समाचार-पत्र और टीवी सभी शुद्ध व्यापार का रूप ले चुके हैं, इस मार्ग पर सरकारों से झंझट भी नहीं होता, अत: बड़े होने का ‘शॉर्ट-कट’ अपनाने लगे हैं। संघर्ष की क्षमता बची नहीं है। इसकी जगह ईष्र्या और द्वेष के रूप में शक्ति और धन खर्च करते हैं। इनको भी अपने स्वार्थ से आगे देखने की जरूरत नहीं रह जाती। क्या मालिक क्या पत्रकार एक अन्धी दौड़ में, पाpात्य जीवन शैली मे, अंग्रेजियत की नकल में उतरते जा रहे हैं। अंग्रेजी के अखबारों में तो भारतीय संस्कृति के दर्शन ही दुर्लभ हो गए।

 

भारतीय दर्शन के चश्मे से देश के मुद्दों पर चर्चा होना ही सुनाई नहीं पड़ता। केवल बौद्धिक मनोरंजन, एक-दूसरे का उपहास अथवा आलोचना, तर्क-कुतर्क, अहंकार ही चिंतन के हथियार रह गए। क्षमता का निर्माण शिक्षा से बाहर हो चुका है। एक विशेष प्रकार की अपूर्णता शिक्षित व्यक्ति में प्रवेश कर जाती है उम्र भर के लिए। यही देश और समाज की अपूर्णता बनकर परिलक्षित होती है। इसमें विदेशी शिक्षा की भूमिका कोढ़ में खाज का कार्य करती है। वास्तविकता को स्वीकार किए बिना आगे कदम उठाना संभव नहीं है। कौन अपनी अपूर्णता का आकलन करता होगा?

 

मीडिया भी इसी समाज का अंग है। पत्रकार भी इसी शिक्षा से निकलता है। आज का पाठक तो पत्रकारों से भी आगे निकल गया है। उसे कैरियर और मनोरंजन के सिवा कुछ नहीं चाहिए। उसे भाषा की शुद्धता में भी रूचि नहीं रह गई है। उसको तो ‘हिन्गलिश’ मीडिया चाहिए। उसके मोबाइल की भाषा कोई पढ़कर देखे।

 

उसे स्वतंत्रता नहीं, स्वच्छन्दता चाहिए। इस बात से मां-बाप भी खुश हंै। वे भी मुक्त रह सकते हैं। उन्होंने भी इस चक्कर में झूठा नकाब ओढ़ लिया है कि हमारे घर में बेटे-बेटी में कोई भेद नहीं है। जो बेटे के लिए नहीं है, वह बेटी के लिए भी नहीं है। चाहे अच्छी पत्नी, अच्छी स्त्री या अच्छी मां बनने की बात ही क्यों न हो।

 

बिना इस शिक्षण के आज की मां, विकास की आड़ में, अपनी बेटी को अंधेरे में ही धकेलती है। वह उम्रभर के लिए परतंत्र होकर जिएगी। तब ऎसी मां के होते हुए किसी शत्रु की क्या आवश्यकता है? जब मां को यह चिन्ता नहीं रह गई, तब धरती पर और किसको यह चिन्ता रह जाएगी तथा ऎसी स्त्री और किसकी चिन्ता कर सकेगी?

 

आज मीडिया और सूचना के अन्य साधन इन बच्चों का ही शिकार करते हैं। बिना नींव के मकान बनाते रहते हैं। यथार्थ से दूर, स्वयं की आत्मा से दूर। जरा से संघर्ष में टूटते दिखाई पड़ते हैं। मीडिया इनका सहारा नहीं बनता। उसे अपनी सस्ती लोकप्रियता के आगे सब कुछ छोटा लगता है। समाज पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करना वह अपना दायित्व नहीं मानता।

 

आज पहली मार बच्चा घर पर ही खा रहा है। मां उसे अभिमन्यु की तरह पेट में कुछ सिखाती ही नहीं है। स्तनपान के साथ उसके भावनात्मक धरातल का पोषण करती ही नहीं। पिता भौतिकवाद सिखाते हैं। घर की हालत आर्थिक दृष्टि से यदि सुदृढ़ है, तो बच्चा बहुत दूर किसी छात्रावास में, बिना मां-बाप के जीता है। उसके पास पैसा होता है, टीवी और इण्टरनेट होता है, मोबाइल फोन होता है और सोचने-विचारने की स्वच्छन्दता होती है।

 

शिक्षक तथा मां-बाप को अच्छे नंबरों के अलावा उससे और कुछ उम्मीद भी नहीं रहती। फिर उसके सौ गुनाह माफ!

व्यक्ति के जीवन का सर्वाघिक महत्वपूर्ण काल तो शुरू के पच्चीस वर्ष ही माने गए हैं। ब्रह्मचर्याश्रम। जीवन की नींव तैयार करने का काल। जीवन का लक्ष्य बनाने एवं उसे पूरा करने के सपने देखने का, स्वयं को उस यात्रा के लिए तैयार करने का काल। प्रकृति ने, प्रारब्ध ने जो कुछ गुण-दोष देकर भेजा, उनको समझने तथा अपने स्वरूप को ढालने का काल।

 

उम्र के साथ स्वयं को बढ़ते देखने, बालपन से किशोर एवं किशोर से युवा होते देखने, अनुभव करने का काल। प्रकृति की शक्तियां कैसे जीवन को चलाती हैं, कैसे जीवन में चेतना का स्वरूप बदल जाता है। विषयों के प्रति आकर्षण घटता-बढ़ता है। सृजन का ‘एकोहं बहुस्याम’  कैसे जीवन में चुपके से प्रवेश कर जाता है। माया के पाश में बंध जाने को मन आतुर होने लगता है। उल्लास का बांसती सुख इसी काल का सौन्दर्य है। इसमें व्यक्ति कैरियर से हटकर सपने देखता है। व्यक्तिगत जीवन का चित्र तैयार करता है। संकल्प करता है। जीवन के मूल्य स्थापित करता है। वैसा ही उसका भविष्य बनता है।

 

इस रूपान्तरण के काल में उसके दो स्रोत सहयोगी बनते हैं। एक तो शिक्षा तथा दूसरा मीडिया। विशेषकर टीवी, इण्टरनेट। दोनों मिलकर उसकी प्राकृतिक धरोहर को लूट लेते हैं। व्यक्ति कंगाल हो जाता है। इसी हाल में वह जीवन की दहलीज पर पहला कदम रखता है। अच्छे नबरों के सहारे, अच्छी नौकरी के सहारे और युवा शरीर को लक्ष्य बनाकर।

 

एक लड़की भी इन्हीं सब परिस्थितियों से गुजरती हुई लड़के के साथ मिलकर जीवन की शुरूआत करती है। अपना पूरा परिवेश संकल्पपूर्वक बदलती है। जो अब तक स्वयं के लिए जी रही थी, अब वह दूसरों के लिए जीने लगती है। यही जीवन में सृजन, सेवा, विस्तार एवं माधुर्य का मार्ग है। यदि लड़की की प्राथमिकता शादी के बाद भी परिवर्तित नहीं होती, वह स्वयं को ही केन्द्र में रखकर जीना चाहती है, तब जीवन से माधुर्य का लोप हो जाएगा। सृजन भी होगा, किन्तु उसका सुख नहीं भोग पाएंगे।

 

गुलाब कोठारी

 

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .

%d bloggers like this: