Gulabkothari's Blog

अप्रैल 29, 2012

उपलब्घि-2

नई शिक्षा और नए कानूनों ने इस सुख को उजाड़ने में तथा जीवन-पथ को कंटीला बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। सब कुछ भौतिक चकाचौंध, व्यक्तिवाद तथा अर्थवाद की भेट चढ़ गया। आध्यात्मिक धरातल सुषुप्ति अवस्था में चला गया। मन स्वप्नवत् कामनाएं करता है, भोगता है। मन मरता रहता है और नया पैदा होता रहता है। देह कौन चला रहा है, इच्छाएं कैसे पैदा हो रही हंै, जीवन का अर्थ क्या है, पशु एवं मनुष्य में क्या अन्तर है, क्या कोई धर्म-आस्था जीवन का आधार बने हुए हैं, आदि प्रश्A चिन्तन से निकल गए।

 

 

लड़की के घर में आ जाने से तो लड़के का चिन्तन बदलने वाला नहीं है। वह तो अपने घर में ही बैठा है। सुरक्षा का भाव अपनी पूर्णता में है। लड़की नए घर में सुरक्षा ढूंढ़ती है। घर वाले यदि यह समझते हैं कि आने वाली पीढ़ी में इसकी संतान समाज में हमारा प्रतिनिघित्व करेगी तथा उस संतान के संस्कारों का निर्माण यह बहू ही करेगी, स्वजनों-परिजनों का भार भी आगे यही उठाएगी, तब तो उसको पूरे सम्मान के साथ जगह दी जाएगी। यदि लड़की खुद अपनी अलग पहचान के लिए संघर्ष करती है, तो वह घर में अकेली पड़ जाती है।

 

‘खड़ी आई हूं, लेटकर जाऊंगी’ वाली अवधारणा जीवन से निकल जाती है। अपने ही घर में असुरक्षित महसूस करने लगती है। समष्टि भाव ही छूट जाता है। सुख एवं कैरियर के बीच द्वंद्व भी बढ़ता ही जाता है। जीवन मात्र बुद्धि के चलाए-चलाए यंत्रवत् चलने लग जाता है। मानवीय संवेदना का ह्रास होने लगता है। तब यह सच भी छूट जाता है कि दूसरे को छोटा दिखाने के लिए खुद को नीचे आने की जरूरत नहीं है।

 

इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी ऎसा ही है। पत्नी को कैरियर की चिंता तो नहीं है, किन्तु पश्चिम की नारी की तरह जीना चाहती है। पुरूषवत्। घर के काम-काज में जुड़ने की कोई रूचि नहीं। स्त्री के गुणों का स्थान पुरूष का अहंकार ले लेता है। अच्छी, स्त्री, अच्छी पत्नी, अच्छी मां बनने की चिंता ही नहीं।

 

न तो उसे संस्कारों में कोई रूचि, न ही कोई जानकारी होती है। मां से भी वह कुछ सीखकर नहीं आती। तब उसके पास देने को कुछ नहीं होता। बच्चों को बुद्धि के जोर पर ही बड़ा करती है। संस्कारों का स्वरूप होता ही नहीं। तब संतान भी बुद्धि से ही जुड़ पाती है, मन से नहीं। संतान के व्यवहार में व्यावसायिकता का अन्दाज अघिक होगा।

 

ऎसे परिवारों में धर्म का स्वरूप, कर्म में आस्था, पाप-पुण्य की परिभाषा, पुरूषार्थ की चर्चा अथवा तपने एवं संघर्ष पूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा कोई नहीं देगा। शरीर आत्मा के लिए जीता है। ऎसा घर शरीर के लिए जीता है। आत्मा का ऎसे लोगों के लिए कोई अस्तित्व नहीं होता। प्राकृतिक संतुलन, प्रकृति की हर पल भूमिका, प्रारब्ध, शरीर मिलने का कारण और लक्ष्य, श्वास-प्रश्वास का आधार, इच्छा पैदा होने का रहस्य जैसे जीवन के मूलभूत प्रश्A इनके सामने आते ही नहीं। तब कर्म से चेतना का आधार छूटा ही रहता है। किसी भी अन्य जैविक प्राणी की तरह ये भी जीते रहते हैं। भोग और रोग के बीच ही जीवन-चक्र चलता है। अपना स्वरूप जानने का कोई निमित्त सहज ही नहीं बन जाता। तब संतान भी जैविक ही होती है। देह भले मुनष्य की हो। कैरियर इस प्रकरण में कोई भूमिका नहीं

निभा सकता।

 

प्रकृति में जैविक स्वरूप स्वच्छंदता का द्योतक है। किसी भी समाज या देश को अमर्यादित लोग नहीं चाहिए। कितना भी बड़ा पद हो, समृद्ध हो, समाज साथ नहीं होगा। वह अपने अहंकार एवं पद के सहारे ही जी सकेगा/सकेगी।

 

तब जीवन के हर निर्णय का आधार चेतना ही होना चाहिए। जाग्रत चेतना। सुख नहीं, आनन्द के प्रति चेतना। स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म एवं कारण जगत के बारे मेे भी चिन्तन एवं संकल्प जुड़े। देह का नाम आत्मा नहीं है। देह के पार जाकर, देह के माध्यम से, शान्ति और आनन्द में प्रतिष्ठित होना ही जीवन की उपलब्घि होगी।

 

गुलाब कोठारी

 

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