Gulabkothari's Blog

मई 6, 2012

भाव

हम अपनी मर्जी से जीना चाहते हैं। किसी अन्य की मर्जी से जीना गुलामी कहलाती है। इस दृष्टि से हम सभी स्वतंत्र होते हुए भी कुदरत के गुलाम हैं। क्योंकि हम अपनी जिस इच्छा को पूरा करना चाहते हैं, उसे हम पैदा नहीं कर पाते। उसे ईश्वर पैदा करता है। वह हमारे आत्मा का आधा भाग (साक्षी रूप) बन कर बैठा है। शेष आधा भाग जीव का (कर्म रूप) होता है। जीवन के यही ज्ञान और कर्म दो धातु कहलाते हैं।

 

 

ईश्वर रूपी ज्ञान भी सब के भीतर होता है। विद्याभाव ज्ञान का पर्याय कहलाता है। धर्म-ज्ञान-वैराग्य-ऎश्वर्य। जीवन में हर व्यक्ति ऎश्वर्य भी प्राप्त करना चाहता है, किन्तु बिना धर्म-ज्ञान-वैराग्य के प्राप्त करना संभव नहीं है। ईश्वर की शक्तियों को ही ऎश्वर्य कहते हैं। ऎश्वर्य कभी नष्ट नहीं हुआ करता है। धन-संपदा का नाम ऎश्वर्य नहीं है। इसमें तो जड़ पदार्थ होते हैं। जब हमारी दृष्टि जड़ पदार्थों पर टिकेगी तो हमारी चेतना उसके पीछे-पीछे चलेगी। चेतना का नेतृत्व जड़ पदार्थ करेंगे। धीरे-धीरे चेतना भी जड़ (संवेदन शून्य) हो जाएगी। तब ऎश्वर्य का सपना टूट जाएगा।

 

आज आप किसी मैनेजमेन्ट के छात्र से बात करें या किसी बड़ी कम्पनी का बजट देखें। इनकी कार्य प्रणाली का आधार धन ही होता है। वार्षिक लक्ष्य की गणना लाभ के आंकड़ों में परिलक्षित होती है। इसका ही बड़ा रूप सरकारी बजट होता है। उसकी भाषा भी आंकड़ो की होती है। इस प्रकार के चिन्तन में दो बड़े महत्वपूर्ण पहलू छूट जाते हैं। एक:- गीता का सूत्र कि व्यक्ति को कर्म तो करना है, किन्तु फल की इच्छा नहीं करनी है। फल की प्राप्ति व्यक्ति के हाथ में नहीं रहती। फल प्राप्ति में अनेक कारण रहते है, जिन्हें जान पाना व्यक्ति के बूते के बाहर की बात है। इस दृष्टि से धन आधारित बजट अज्ञानता का ही सूचक है। इसमें ज्ञान आधारित चर्चा का अभाव रहता है।

 

दो:- जब जड़ पदार्थ को लक्ष्य बनाकर व्यक्ति कार्य करता है, तब धर्म सिद्धांत विदा हो जाते हैं। येन-केन-प्रकरेण लक्ष्य को पूरा करना होता है। नीतियों से समझौता करना आम बात हो जाती है। कार्य की गुणवत्ता भी गौण हो जाती है। चिन्तन का प्रवाह नीचे की ओर गतिशील होता है। क्योंकि जब लक्ष्य कार्य से नहीं जुड़ पाता तब मंजिल दिखाई नहीं देती। आय को खर्च करने का आधार भी स्पष्ट होना जरूरी है। उसके वितरण के बारे में स्पष्टता होनी चाहिए।

 

लक्ष्मी के भक्त विष्णु को पूजते नजर नहीं आते। लक्ष्मी बिना विष्णु के नहीं आती। बिना विष्णु के उल्लू पर सवार होकर आती है, जिसे केवल अंधेरे में ही दिखाई देता है। लक्ष्मी को लक्ष्य बनाकर व्यापार करना इस देश की नीति-संस्कृति  नहीं रही है। अत: पुरानी पीढियों के सिद्धान्त और अनुभव भी नई पीढ़ी के काम नहीं आते। भोग लक्षणा होने से धन के साथ-साथ अविद्या: राग-द्वेष, लोभ, मोह, इष्र्या आदि दोष भी जीवन में प्रवेश करने लगते हैं। दोष इसलिए कि इसमें व्यक्ति का ध्यान स्वयं से दूर होता चला जाता है। इनमें से अघिकांश भाव दूसरों से की जाने वाली होड़ में रहते हैं।

 

व्यक्ति मूल विषय के साथ यथार्थ भाव में नहीं जुड़ पाता। वैसे भी प्राण तथा वाक्  की प्रधानता बाहरी क्रिया का सूचक है। धन पर दृष्टि जड़ता का द्योतक है। ऎश्वर्य पर दृष्टि धर्म की प्रधानता का प्रतीक है। जड़ता में सही गलत का भेद कहां रहता है। व्यक्ति का चिन्तन शरीर की पशुता- आहार, निद्रा, भय  मैथुन तक सीमित हो जाता है। इसमें न अघिदेव होता है, न ही आध्यात्म भाव। यही आज की शिक्षा का मर्म है। इसमें विषय है, व्यक्ति नहीं हैं। आप किसी भी उच्च शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा अथवा विशेषज्ञों का प्रशिक्षण देख लें। सब जगह विषयों के विस्तार पर जोर है।

 

यहां तक कि जब कुछ छात्र-छात्राएं किसी विषय पर बहस कर रहे हों, तब उन्हें देखो कि उनकी आवाज में कितना रूखापन है। संवेदना- शून्य वातावरण दिखाई देगा। उनको यह भी भान नही होता कि कोई युवा लड़का, किसी युवा लड़की से बात कर रहा है। दोनों ही एक दूसरे के प्रति निर्मोही (असंपृक्त) दिखाई देते हैं। बरसों का यह अभ्यास जब आगे जाकर जीवन में उतरता है, तब सारे सम्बन्ध इसी धरातल पर आकर सिमट जाते हैं।

 

यदि प्रेम भी बुद्धि से किया जाए, खाना भी बुद्धि तय करे, या यूं कहें कि शरीर ,मन और आत्मा का सारा कार्य बुद्धि ही करे ? क्या जीवन में कुछ भी व्यवस्थित रह पाएगा? यही आज के उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति के निजी जीवन की स्थिति है। जैसे सम्पूर्ण मेडिकल साइंस गणित के अंकों पर आकर ठहर गया है। क्या भावनात्मक परिपक्वता के बिना जीवन में रस प्राप्त हो सकता है? क्या व्यक्ति शरीर के भरोसे ही अपने अस्तित्व पर टिका है?

 

इसका और भी दर्दनाक स्वरूप होता है लड़की का संवेदनाशून्य हो जाना। लड़की  पति से, सन्तान से यदि बुद्धि के सहारे व्यवहार करे, तब क्या ममता, वात्सल्य, करूणा आदि भाव दिखाई दे सकेगे। ये सब बुद्धि के तो गुण नहीं हंै। जब मां के मन में मिठास नहीं हो, तो सन्तान को देगी क्या? बुद्धि का संस्कार विहीन अहंकार! विवाह संस्कार जीवन का प्रवेश द्वार है। इसके पूर्व का जीवन एक पक्षीय चिन्तन पर आश्रित होता है। लड़का हो या लड़की, जीवन का दूसरा पक्ष किसी के सामने नहीं होता। यह पक्ष मात्र शरीरों के जुड़ने से भी समझ में नहीं आता। यह तो शुद्ध पशु भाव होता है।

 

मानव कर्म तो यह तब बनता है, जब शरीर के साथ बुद्धि, मन और आत्मा भी जुड़ा हो। तब जाकर यह कर्म जीव का कहलाता है। इस दृष्टि से जीवन को समझने के लिए पंचकोष की अवधारणा स्थापित की गई। इसमें आत्मा के चारों ओर मुख्यत: पांच कोष अथवा आवरणों की व्याख्या की गई। इनको समझने के बाद ही आत्मा का अनावरण होकर  वह कर्म साक्षी बन पाता है। इन आवरणो को हटाने में आज की शिक्षा कहीं काम नहीं आती। यह तो वैसे भी जीवन को स्थायी रूप से अपूर्ण ही बनाती है।

 

वेद वाक्य-“पूर्णमद: पूर्णमिदं—-” इस शिक्षा के भरोसे समझा नहीं जा सकता। ज्ञान न तो पैदा किया जा सकता है, न ही बांटा जाता है। धर्म के बिना ज्ञान नहीं, ज्ञान के बिना वैराग्य संभव नहीं हैं। वैराग्य के बाद ही ईश्वरीय शक्तियां प्राप्त होती हैं। इन्हें ऎश्वर्य कहा जाता है। जहां ज्ञान नहीं है, वहा चेतना का जागरण भी नहीं होता है।

 

विभिन्न आवरणों से छनकर जो आत्मा का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है, उसी को हम आत्मा मान लेते हैं। तब हमारी दृष्टि जड़ के प्रति क्यों आकर्षित नहीं होगी। हम धन को ही लक्ष्य बनाकर कार्य क्यों नहीं करेंगे? विश्व के सभी विकसित देश इस भौतिकवाद की ही मार झेल रहे हैं। चारो ओर जड़ तžव का ही साम्राज्य है। सबकी चेतना जड़ या पशुवत् हो गई है। कुछ विशिष्ट विभूतियों को भले ही छोड़ दें। किसी के मन में देने का भाव ही नहीं। महिलाओं की स्थिति पुरूषों के मुकाबले अघिक दयनीय है। भोगवादी शिक्षा ने व्यक्ति को भी उपभोग की सामग्री बना दिया।

 

शिक्षा ने  और मां बाप ने भी पल्ला झाड़ लिया है-बच्चों को संस्कारित करने से। अब यह कार्य स्वयं बच्चों को ही करना पड़ेगा। इसके लिए भीतर जीने का अभ्यास करना होगा। बाहर-भीतर बराबर। लक्ष्मी के साथ शब्द ब्रह्म रूप वीणा वादिनी सरस्वती भी साथ चले। आत्मचिंतन शायद मार्ग को प्रकाशित कर दे।

 

गुलाब कोठारी

 

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4 टिप्पणियाँ »

  1. waqt ke ghav waqt hi thik karta hai. AAp jaisi soch sab ki ho jaaye to yeh vishw Swarg se bhi uncha uth jaayega. Prerna dayak lekhni se jo aapne likha hai ho sakta hai kuchh log samajh payen. Sadhuwad. Pranam

    टिप्पणी द्वारा N.M.SURANA — सितम्बर 1, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

  2. I read up ur articles in esteemed newspaper “patrika’….they all were really impressive…n m glad about ur actions against corruption……i hope u keep doing the work….best wishes to u…..!!

    टिप्पणी द्वारा nidhi jain — अगस्त 7, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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