Gulabkothari's Blog

मई 13, 2012

भाव-2

म न बहुत चंचल है। निरन्तर उड़ान भरता रहता है। बांध पाना कठिन है। मनोमय कोष्ा में उड़ने वाली विचार तरंगों को ऋषि भी नहीं रोक पाए। मन का ही अनुसरण प्राण करते हैं। तुरन्त क्रिया शुरू हो जाती है। हर इन्द्रिय अपने विषय लेकर मन तक पहुंचती है। मन में इच्छाएं उठती जाती हैं। प्रत्येक धर्म में इच्छाओं को रोकने के उपाय सिखाए जाते हैं। माला जपना उनमें से एक उपाय है। जब तक माला का क्रम रहता है, नए विचारों का प्रवेश ठहर-सा जाता है। साथ ही विचारों की एक निश्चित दिशा भी बनती जाती है।

 

तब ये विचार ही भावना बन जाते हैं। विचारों के कारण ही जीवन के प्रति अवधारणा बनती है। आचरण बनता है। व्यक्ति का स्वरूप निर्मित होता है। विचारों के साथ ही मन के भाव भी बदलते हैं। भावना का अर्थ है- विचारों का एक निश्चित दिशा में स्थायी रूप लेते जाना। धीरे-धीरे भीतर की ओर गति करने लग जाता है। मन का स्वभाव बन जाता है। जैन दर्शन में धर्म के चार प्रकार कहे गए हैं- दान, शील, तप और भाव।

“दाणं च शीलं च तपो भावो एवं चउविहो धमो।”

 

चूंकि भावना का आगे का स्वरूप ध्यान ही होता है, अत: भावना को आत्म-चिन्तन का अंग माना गया है। यानी स्वयं की प्रेक्षा करना।

“भाव्यते ह्य नयेति भावना।” जिसके द्वारा मन को भावित/संस्कारित किया जाए वह भावना होती है। बार-बार उठने वाली विचार तरंगें भावना कहलाती हंै। वास्तव में तो भावना मन में उठने वाली इच्छा को गति, दिशा एवं संकल्प प्रदान करती है। कर्म के परिणाम भावना से ही आते हैं। श्रम अथवा बुद्धि मात्र से नहीं। बुद्धि तो त्रिगुण से ढकी है। भाव मेरा वर्तमान है। प्रारब्ध का प्रभाव हो सकता है। भाव का एक अर्थ सत्ता भी है। क्योंकि प्रत्येक क्र्रिया के कारण और कर्ता ही जनक होते हैं।

 

यह कर्ता ही वर्तमान है। भाव या सत्ता का अर्थ है क्रिया को सिद्ध करने की क्षमता। इसी को स्वतंत्र कृतत्व कहा है। क्रिया का मूल चंूकि माया है, अत: माया को भी स्वातं˜य शक्ति कहते हैं। स्पन्दकारिका में इसका एक उदाहरण मिलता है। “वह खाना पकाता है।” इसमें पकाता क्रिया है। ‘है’ से कर्ता की वर्तमानता तथा स्वतंत्रता दिखाई पड़ती है। ‘वह’ यानी कि चेतन सत्ता की पूर्व वर्तमानता से ही पकने की क्रिया सिद्ध हो रही है। यह कृतत्व ही अंह-विमर्शात्मक होने से नित्य कहलाता है।

 

विमर्श कृतत्व का शक्ति रूप है। विमर्श शक्ति रूप कृतत्व ही ऎसा भाव है जो विश्व के अणु-अणु रूप को सत्ता प्रदान करने वाला सारभूत चैतन्य है। यही जड़/चेतन भावों का ह्वदय है। जड़ भाव चेतन में विश्राम पाते हैं। चेतन भाव प्रकाशमयता में और प्रकाशमानता का भी रहस्य विमर्श में अन्तर्निहित है। विमर्श रूप स्पन्दना से ही देश-काल-आकार रूप प्रमेय वर्ग जीवन पाता है। क्रीड़ा करता है और स्वयं फिर भी देश-काल से परे रहता है।

 

कोई क्रिया ज्ञान के बिना संभव नहीं है। ज्ञान का मौलिक स्वरूप इच्छा है। अत: कृतत्व/ भाव, इच्छा ही ज्ञान और क्रिया की समरसता है। यही कार्यता और कृतत्व स्पन्दनात्मक आत्म तžव की दो अवस्थाएं मानी जाती हैं। भोग्य और भोक्ता। भोग्य अनित्य है तथा भोक्ता नित्य है।

इच्छा और भाव साथ बहते हैं। दोनों ही परिणामों के लिए उत्तरदायी हैं। इच्छा प्रारब्ध पर निर्भर करती है।

 

वर्तमान संकल्प भी इच्छा के कारक होते हैं। भावों पर वातावरण का भी बड़ा प्रभाव पड़ता है। अनेक बार वातावरण की तीव्रता संकल्प को बहाकर ले जाती है। यह तीव्रता भी विकारात्मक और सकारात्मक दोनों ओर की हो सकती है इसलिए कहा है कि खोटी संगत में कभी नहीं बैठना। अच्छी संगत में भी अघिक देर नहीं रहना चाहिए। वहां भी मन बंधन में पड़ सकता है। प्रवाह तो दोनों ही दिशाओं के उचित नहीं माने जाते।

 

भाव शरीर में पैदा नहीं होते। बुद्धि में पैदा नहीं होते। मन में उत्पन्न होते हैं और मन की चंचलता के कारण प्रतिक्षण बदलते चले जाते हैं। एक ही तरह के भाव जब बार-बार उठते हैं अथवा लम्बी अवघि तक वर्तमान रहते हैं तब भावना का रूप ले लेते हैं। नित्य स्वाध्याय के पीछे भावनाओं को पैदा करने की अवधारणा ही है।

 

भावनाओं के लिए एक अच्छी कहावत है। मन चंगा तो कठोती में गंगा। जो कुछ घटित होता है, उसमें भाव क्रिया का बड़ा योग रहता है। कुन्ती ने एक बार कृष्ण से पूछा कि पाण्डव जब जुए में सब कुछ हार रहे थे, तब तुमने उन को क्यों नहीं बचाया। क्यों उनको वनों में भटकना पड़ा? तुमने द्रोपदी की ही सहायता की।

 

कृष्ण ने कहा-बुआजी किसी भी पाण्डव ने मुझे याद ही नहीं किया। द्रोपदी ने किया और मैं आ गया। द्रोपदी ने भी द्वारका वाले को बुलाया तो आने मेे देर लगी। घट-घट वासी को बुलाती तो भीतर ही बैठा था। तुरन्त आ जाता। अर्थ भावना का है। भावना से आस्था का गहरा नाता है। आस्था भी एक भावना है। जीवन में सम्बन्ध भी भावनाओं के साथ जुड़ते हैं। इसमें राग-द्वेष, ईष्र्या जैसे भाव जुड़े रहते हैं। आदान- प्रदान के सम्बन्ध मूलत: इसी प्रकार के भावों से ओत-प्रोत रहते हैं। इन्हीं के कारण कर्म बंधन कारक बन जाते हैं।

 

व्यक्तिगत भावनाओं का तो अन्त ही नहीं होता। इसमें भी भय का भाव प्रमुख रूप से अनेक कायोंü में उत्पे्ररक बनता है। मृत्यु  का भय जीवन को अधमरा किए रहता है। एक भाव होता है अकेलेपन का। यह आसक्ति का विरोधी भाव है। संसार के सम्बन्ध निस्सार जान पड़ते हैं। आत्मा स्वयं को अकेला पाता है। सुख-दुख का भाव भी अप्रभावी हो जाता है। मित्रता-शत्रुता के अर्थ समाप्त या अर्थहीन होने लगते हैं। धीरे-धीरे वैराग्य के भाव में अभिवृद्धि होने लगती है। लोभ-मोह के भाव के पार देखने लगता है व्यक्ति। मनोमय कोष में उठने वाले विचार अब भीतर की ओर गति करने लगते हैं। चेतना के जागरण के साथ ही लोक कल्याण और वैराग्य भाव पुष्ट होते हैं।

 

जो शब्द भीतर जाता है, वह हमारे मनोमय कोष का निर्माण करता है। श्वास की लयबद्धता के साथ हमारे भाव पैदा होते हैं। भाव ही स्वभाव बनते हैं। श्वास अहंकृति का निर्माण एवं पोषण करते हैं। शरीर के साथ प्रकृति और अहंकृति नित्य रहते हैं। इनमें से एक को बदल देने से शेष दो भी बदल जाते हैं। व्यक्ति साधारण स्तर पर अहंकृति और आकृति को नहीं बदल सकता। भावों को बदल पाने की क्षमता उसमें है। यह कार्य प्राण ऊर्जा (विद्युत रूप) से संभव हो पाता है जो माया से भिन्न ऊर्जा है। क्योंकि हम देखते है कि प्राणायाम के दौरान श्वास के साथ-साथ चित्त बदलता रहता है। श्वास धीमी और गहरी होती जाती है।

 

उसका एक निश्चित क्रम बनता जाता है। उसी में संकल्प के द्वारा भावों को जोड़ा जाता है। विचार तो घटेंगे, किन्तु संकल्प का प्रभाव भावों को गहन करता जाएगा। इसी के साथ विचारों का प्रवाह भी उधर ही हो जाता है। परिणाम विचारों से नहीं भावों से आते हैं। भाव का केन्द्र ह्वदय होता है। जीवन का केन्द्र नाभि। ओशो ने लिखा है कि मां की जीवन धारा भी एक अज्ञात, अत्यन्त, अनजान विद्युत की धारा है। बच्चे की नाभि से पूरे व्यक्तित्व को पोषित करती है।

 

पैदा होते समय बच्चा रोता ही इसलिए है कि उसकी जीवन धारा का विच्छेद हो गया। मां के दूध के साथ ही उसकी जीवन धारा फिर संयुक्त होती है। तब बच्चे का दूसरा सम्बन्ध ह्वदय से होता है। उसका ह्वदय केन्द्र मां के ह्वदय के साथ विकसित होता है। नाभि से मिलने वाली जीवन धारा अब होठों से लेने लगता है। ह्वदय के पास होने से पे्रम का अघिक विकास होता है। उसके मानसिक, शारीरिक, चित्त के विकास में ह्वदय केन्द्र का विकास पूरा नहीं हो पाता। तब जो कार्य नाभि एवं ह्वदय केन्द्र पूरा नहीं कर पाए, उसे मस्तिष्क से पूरा करने का प्रयास करता है। एक ही केन्द्र पर सारा जीवन-भार पड़ जाता है।

 

शिक्षा, धर्म आदि सभी कार्य मस्तिष्क से लेने लगता है। मस्तिष्क से किया गया प्रेम तो झूठा ही साबित होगा। विचारों की तरह ही पे्रम भी पैदा होगा। उसका व्यक्ति से सम्बन्ध नहीं होगा। काम का, ऊर्जा का केन्द्र नाभि है। जब यौन कार्य मस्तिष्क से लिया जाएगा और बुद्धि काम में घुस जाएगी, तो जीवन नष्ट हो जाएगा। यही आज लाचारी है। अविकसित नाभि केन्द्र का कार्य अन्य केन्द्रों से लेना ही जीवन की अराजकता है। भाव शून्यता, संवेदना शून्यता हमारे प्रत्येक कर्म को पाशविक रूप में बदल देते हैं।

 

गुलाब कोठारी

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