Gulabkothari's Blog

मई 21, 2012

बड़ा करगिल?

हाल ही में केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम.रामचन्द्रन ने संसद में सूचना दी थी कि पिछले दो सालों में चीन की सीमा पर 500 से अधिक घुसपैठ के प्रयास किए गए। गृहराज्य मंत्री ने यह नहीं बताया कि प्रयासों के परिणाम क्या निकले तथा केन्द्र ने क्या कदम उठाए। सच्चाई तो यह है कि चीनी घुसपैठ की कार्रवाई हर चौकी के पास दो-तीन दिन में की जाती है। नतीजा ठीक वैसा ही है कि जैसा कि बांग्लादेश की सीमा पर है। इण्डो-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सेना की कार्यशैली बहुत भिन्न नहीं है। आईटीबीपी पूर्णत: स्थानीय पुलिस के नियंत्रण में रहती है। स्थानीय नागरिकों के साथ भी उनके व्यवहार की शिकायतें आम हैं।

कल लेह पहुंच कर यहां लोगों से चीनी घुसपैठ की चर्चा की तोे पूर्व विधायक चेरिंग दोरजी ने बताया कि आईटीबीपी के जवान स्थानीय लोगों पर कभी विश्वास ही नहीं करते। उनका आरोप रहता है कि स्थानीय लोग सूचनाएं चीन को पहुंचाते हैं। सच्चाई तो यह भी है कि ये लोग तस्करी के लिए भी बीच-बीच में स्थानीय लोगों का उपयोग करते रहे हैं। जब भी चीनी लोग हमें धमकाने आते हैं तो सेना और आईटीबीपी के जवान बचाने का कोई प्रयास ही नहीं करते। वर्षो से ऎसा ही हो रहा है। धीरे-धीरे चीनी 100 किमी भीतर तक आ गए। अब तो हमें विश्वास हो चला है कि ये हमारे क्षेत्र से पिण्ड छुड़ाते जान पड़ रहे हैं। सन् 1962 के चीन के युद्ध के बाद जब से चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया है, तब से इनकी घुसपैठ बढ़ती ही जा रही है। सेना इसको अपना कार्य ही नहीं मानती।

वर्ष 2010 में एक बार दाम चौक पोस्ट पर लगभग 30 चीनी घुसपैठिए आ गए। यहां हमारे गड़रिये सर्दी में आते हैं। 6 माह बाद चले भी जाते हैं। इस बार हमारे लोग डटे रहे। दोरजी ने कहा कि सूचना मिलने पर मैं भी दल-बल सहित पहुंचा। लोगों की शिकायत थी कि चीनियों ने खूब मार-पीट की। हमारा एक टेंट भी जला दिया। किन्तु सुरक्षा बल के लोग मदद के लिए आगे नहीं आए। सेना के लोग भी नहीं आए। चीनी सैनिक हमारी महिलाओं से बदसलूकी करके चले गए। हमारे सामने सवाल यह था कि, यदि हम जगह छोड़ कर चले आएं तो चीनी इसे भय से किया गया पलायन मान लेंगे। लोगों का वहां बने रहना जरूरी था, उनको समझाया भी। उस वक्त पशुओं के लिए चारे की समस्या सामने आई। हमने 10 ट्रक चारा भेजकर उनको 8-10 दिन रूकने को मनाया। मन में वे चीनियों को शत्रु मानते ही हैं। उनकी जमीनें जो लूट ले गए।

दाम चौक पोस्ट लेह से 290 किमी है। यह आज हमारी अंतिम चौकी है। इसके ठीक सामने ही सिंध नदी के पार चीन की चैक पोस्ट है। चीन ने अपने क्षेत्र में पक्की और चौड़ी सड़क बना रखी है। जब हमारे क्षेत्र में हमने नरेगा में कच्ची सड़क बनाना शुरू किया तब चीनी धमकाने आ गए। आईटीबीपी के अधिकारी मौन रहे। हम आज तक भी सड़क नहीं बना सके। आज तो लोगों को यह भी मालूम है कि चीन ने चुपचाप कई सड़कें बनाने का कार्य हाथ में ले रखा है। तब क्यों हमारी सेना हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। बल्कि सेना तो शायद इस तथ्य को स्वीकार भी नहीं करेगी कि चीन में ऎसा कुछ हो भी रहा है। आज तो देश भी जान गया है कि करगिल की चेतावनी सेना को नौ माह पूर्व ही मिल गई थी किन्तु सेना ने इसे स्वीकार ही नहीं किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब रिपोर्ट रक्षा मंत्री को भेजी तब सेना हरकत में आई थी। इसका जो नुकसान हुआ वह देश के सामने है। क्या सेना नहीं जानती कि चीन पेंगांग लेक के उत्तर में 500 मीटर तथा दक्षिण में 400 मीटर सड़क बना चुका है। ट्रिंग हाइट पर साढ़े पांच किमी सड़क तैयार है। ब्रुट से क्षेत्र में 22 किमी सड़क बन चुकी है। कोमकाला क्षेत्र में लम्बी सड़क चीन ने बना ली है। पूरी सीमा पर विद्युत संचार तथा यातायात सुचारू रूप से चल रहा है। भारत की सीमा का हाल जाकर देखें तो ही समझ में आ सकेगा। हर अधिकारी मात्र दो साल के लिए आता है। कोई मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालना नहीं चाहता। समय काट कर चला जाना चाहता है।
चीनी इस पार आकर धमकाते हैं, हमारे जवान भी प्रतिरोध नहीं करते और खुद आगे जाने का प्रयास भी नहीं करते। दोरजी का कहना था कि आए दिन घुसपैठ की शिकायतें भी हम उच्चाधिकारियों से करते आए हैं किन्तु परिणाम कुछ नहीं आता। एक बार तो सेना तथा आईटीबीपी के बीच होने वाली वार्षिक बैठक भी लद्दाख में हुई थी। मुझे भी बुलाया गया था।

मैंने सारी घटनाएं उनके सामने रख दी थी। आईटीबीपी के उप महानिरीक्षक मौन ही रहे। सेना के कमाण्डेंट ने जरूर यह टिप्पणी की थी कि ऎसी घटनाओं का प्रतिरोध होना चाहिए। कोई भी क्षेत्र का दौरा करके देखे तो बड़े-बड़े पत्थरों पर चीनी भाषा में लिखा मिलेगा कि यह क्षेत्र हमारा है।

चीनी लोग तो हेलीकॉप्टर से भी हमारे क्षेत्र में घुस आते हैं। एक बार तो हमारे क्षेत्र में उतर कर 13 बंकरों को तोड़ गए। चुमुक की यह चौकी हिमाचल की सीमा से लगती है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान भी उतर चुके हैं हमारी सीमा में। हालांकि सर्वाधिक गतिविधियां दुमचौक क्षेत्र में होती रहती हैं। पहले हमारी चौकी दौलत डेम तक थी। आज 100 किमी अन्दर आ गई। सुलतान चुसकुर तक। चीन ने अपनी सीमा पर बड़ी-बड़ी फोकस लाइटें लगा रखी हैं। सन् 1962 के युद्ध के बाद सुथुरम क्षेत्र में तो बांध तक बना लिया है।

करगिल युद्ध के बाद पाकिस्तानी सीमा पर तो सेना भी पहुंच गई है। मुस्तैदी भी बढ़ गई है। इधर ठीक उल्टा है। कई बार तो चौकी पर लोग ही नहीं मिलते। न इस क्षेत्र को सुरक्षा की दृष्टि से विकसित ही किया गया है। ऊपर से बिना भरोसे के निगरानी दल। इसी कारण चीनी सेना हमारी सीमा में 60 किमी भीतर की लाका बेन चौकी पर अपना अधिकार जमाए बैठी है। भला हो हमारे सीमा के प्रहरियों का।
जम्मू-कश्मीर सरकार को जानकारी मिलेगी दिल्ली से। वर्ना लद्दाख तो उसकी सूची में अंतिम कड़ी है। तभी तो पूर्व केन्द्रीय गृहमंत्री को भी बड़े-बड़े अपराधियों को छोड़कर पुत्री को मुक्त कराना ही महत्वपूर्ण लगा। चीन यदि आज ही हमला कर दे तो करगिल के आगे की कच्ची-पक्की सड़क ही जवाब दे जाएगी। फिर न बिजली, न पानी, न ही फोन। गृह विभाग की स्वीकृति के अभाव में अर्द्धसैनिक बलों के स्थान पर सेना के समय पर नहीं पहुंच पाने से एक बड़ा करगिल देश को झेलना पड़ जाएगा।
लेह से गुलाब कोठारी

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