Gulabkothari's Blog

मई 23, 2012

कश्मीर : एक खुली जेल-2

कश्मीर घाटी एक खुली जेल है। हर कोई यहां बन्द रहने को ही उत्सुक है। इस मानसिकता ने चिन्तन को इतना जकड़ रखा है कि वे मुक्त होने को तैयार नहीं हैं। यदुवंशियों की तरह स्वयं आपस में ही काट-मार करने में व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। बाहर से आने वाले को लूटकर अपनी जिन्दगी चलाते हैं। समय के साथ आक्रामक होते जा रहे हैं। सहनशीलता, धैर्य, सौहार्द इनके जीवन से बाहर निकल गए। इसी को यह अपनी स्वतंत्रता मानते हैं।

 

 

भारत के प्रयासों को स्वतंत्रता में दखल मानते हैं। वहां से बस धन आता रहे। पाकिस्तान आज कोई जाने को तैयार नहीं है। वहां का तो नारा केवल डर दिखाने के काम आता है। वहां के हालात से सभी वाकिफ हैं। कई लोग रिश्तेदारों से मिलने के नाम पर परमिट लेकर जाते हैं, किन्तु समयावघि से पहले ही लौट आते हैं। वहां और भी बड़ी जेल और यातनाओं का दृश्य दिखाई पड़ता है। इधर आने वाला पाकिस्तानी दो-तीन बार तो समयावघि बढ़ाता ही है। लौटना ही नहीं चाहता।

 

केन्द्र में कोई भी सरकार रही हो। वह इस स्थिति का पूरा लाभ उठाती है। कांग्रेस नीत मौजूदा सरकार तो बहुत आगे है। एक बार नेशनल कान्फे्रंस से विवाह करती है। अगली बार इसको तलाक देकर पीडीपी से शादी कर लेती है। चलती फिर भी कांग्रेस की ही है। बीबी को दिल खोलकर खर्च करने की छूट रहती है। वह उसी में मस्त है। केन्द्र सरकार दोनों को लड़ाती रहती है। बन्दरों की लड़ाई में बिल्ली की मौज है। कश्मीर को एक नुकसान (मानें तो) यह भी हुआ कि केन्द्र की धन वर्षा ने इसे निकम्मा बना दिया। कामचोर हो गया। मांगकर खाने वाला बनता चला गया।

 

लालच को नपुंसक कहा जाता है। उसमें कोई दीन, सिद्धान्त, दिशा नहीं रहते। औरत, मर्द के जीवन में तो अनेक विशिष्टताएं रहती हैं। कश्मीर में चिन्तन इसी धरातल पर उतर चुका है। न साथ रहने वालों के साथ इनकी पटरी बैठ पाती है, न भारत के साथ एकाकार ही होना चाहते हैं। उच्च शिक्षा का मार्ग बन्द सा है। बाहर जाकर पढ़ने को बच्चे तैयार ही नहीं होते। उनके मन में भी उतना ही डर भर गया है हिन्दुओं से जितना कि हिन्दुओं को कश्मीर आने में लगता है।

 

प्रश्न यह है कि क्या आने वाली नई पीढियां इसी तरह जीती चली जाएंगी? क्या कश्मीर पहाड़ी, गूजरों का और आतंककारी क्षेत्र बनकर जी पाएगा? लद्दाख की आधी आबादी मुसलमानों की है। लद्दाख के मुसलमान पुरगी समुदाय के हैं। इनका कश्मीरी मुसलमानों से कोई सम्बंध नहीं है। आज कश्मीर खाने की सामग्री के लिए जम्मू या शेष भारत पर निर्भर करता है। बर्फ के कारण दस दिन भी जम्मू-कश्मीर मार्ग बन्द हो जाए तो त्राहि-त्राहि मचने लगती है। चावल, सब्जियां, फल, अण्डे, मांस आदि सब बाहर से आता है। उसके बाद भी साठ साल में रेल मार्ग शुरू नहीं करने दिया गया। उनको लगता है कि इससे हिन्दू घुस जाएंगे। अनुच्छेद 370 नहीं हटाने के पीछे भी मन: स्थिति यही है।

 

भारतीय नागरिकता स्वीकार करने को हिन्दू विरोधी मानसिकता ही रोकती है। कोई प्रदेश के बाहर का व्यक्ति यहां जमीन खरीद कर नहीं रह सकता। यहां की लड़की अन्य प्रदेश के लड़के से शादी करती है तो उसकी सारी सम्पत्ति सरकार जब्त कर लेगी। इस पर तो उच्चतम न्यायालय का फैसला भी आ गया कि लड़की-लड़के के बीच यौन आधारित भेद नहीं किया जा सकता। फिर भी मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार ने विधान सभा में नए सिरे से पास करवा दिया। आगे जाकर रूक गया, यह और बात है।

 

कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार एवं उनके निष्कासन के बाद प्रदेश सरकार की बड़ी थू-थू हुई। इसे डर कहें या दंभ कि आज जम्मू जैसे शहर के चारों ओर नई-नई कॉलोनियां बनाकर समुदाय विशेष के ही लोगों को लाकर बसाया जा रहा है। मतों के समीकरण की दृष्टि से। जबकि इस भू-भाग का एक हिस्सा वन्य क्षेत्र में आता है।

 

जम्मू एवं कश्मीर में सीटों का परिसीमन किया गया, उसके आंकड़े भी पाठकों के समक्ष रखूंगा। किस प्रकार अल्पसंख्यकों की योजनाओं की राशि केवल बहुसंख्यकों पर ही खर्च की जाती है। क्योंकि अन्य प्रदेशों में यह समुदाय अल्पसंख्यक ही है। सरकार का यह प्रश्रय ही विष-कन्या का कार्य कर रहा है।

 

गुलाब कोठारी

 

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