Gulabkothari's Blog

मई 24, 2012

अमरनाथ : यात्रा चुनाव की

एक ही प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, में दो हिन्दू तीर्थ स्थल ऎसे हैं, जहां प्रति वर्ष लाखों तीर्थ यात्री आते हैं। प्रदेश की बहुत बड़ी आय का जरिया बने हुए हैं। एक है जम्मू का वैष्णो देवी तीर्थ तथा दूसरा कश्मीर का अमरनाथ। दोनों ही पहाड़ों के ऊपर हैं। वैष्णो देवी तक लगभग बीस लाख तथा अमरनाथ तक सात-साढ़े सात लाख यात्री प्रति वर्ष पहुंचते हैं। प्रदेश की हर सरकार इन दोनों तीर्थो को भिन्न दृष्टि से देखती आई है। वैष्णो देवी मन्दिर जहां पूरे वर्ष तीर्थ यात्री आते रहते हैं, वहीं अमरनाथ यात्रा पर अनेक सरकारी अंकुश लगे हैं। कहने को दोनों स्थान पर मन्दिर ट्रस्ट भी बने हैं। वैष्णो देवी ट्रस्ट स्वतंत्र कार्य करता है। अमरनाथ यात्रा को लेकर कोई न कोई विवाद बना ही रहता है। जब मैंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से चर्चा करने का प्रयास किया तब उनका कहना था कि सरकार का इसमें कुछ लेना-देना नहीं है। सारे निर्णय बोर्ड ही करता है।

 

 

सन् 1996 के एक बर्फीले तूफान में लगभग 250 तीर्थयात्री लापता हो गए थे। सरकार की ओर से किसी प्रकार की पुख्ता व्यवस्था नहीं थी। यात्रा का एक मात्र मार्ग पहलगांव तथा चन्दनबाड़ी होकर जाता था। पहलगांव से 42 किमी मार्ग में रात्रि विश्राम अनिवार्य था। आते-जाते या तो शेषनाग पर अथवा पंचतरणी पर। जब 250 यात्री नहीं मिले, तब एक जांच समिति ने रिपोर्ट दी कि इस दुर्घटना का कारण बदइंतजामी था। यात्री अघिक थे। उन्हें व्यवस्था के अनुसार ही नियंत्रण में भेजना चाहिए।

 

व्यवस्था लागू हो गई। यात्रियों की संख्या कम कर दी गई, किन्तु व्यवस्थाएं सुधारने की बात अभी तक आगे नहीं बढ़ सकी है। सरकार के सुझाव पर यात्रियों की संख्या प्रतिदिन 2500 कर दी गई। सन् 2000 में आतंककारियों के हमले में कई तीर्थयात्री भी मारे गए। तब एक अन्य समिति की सिफारिश पर श्री अमरनाथ देवालय बोर्ड बनाया गया।

 

अब फिर नया विवाद शुरू हुआ यात्रा की अवघि को लेकर। यह विवाद आज भी जारी है। आम तौर पर यात्रा  की अवघि साठ दिन होती थी। दो माह तक 2500 यात्रियों की व्यवस्था सरकार नहीं कर पा रही है। कभी स्टाफ के यहां लगने से राजकार्य में बाधा आने की बात कहती है, कभी मौसम के बिगड़ जाने की बात कहती है। सरकार का दबाव लेकिन बना ही रहा और उसने श्री श्री रविशंकर की अध्यक्षता में एक और समिति बना दी जो यात्रा की अवघि के निर्घारण पर सरकार को सलाह दे सके।

 

समिति ने अपनी रिपोर्ट में यात्रा अवघि को घटा कर 39 दिन करने की अनुशंसा कर दी। सरकार ने भी इसकी घोषणा कर दी। कल शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा पर इस निर्णय का प्रभाव पड़ेगा। पूरे प्रदेश में इस निर्णय को खरीदा हुआ निर्णय माना जा रहा है। अत: श्री श्री रविशंकर पर भी तरह-तरह के कटाक्ष सुनाई दे रहे हैं। जम्मू की कुछ संस्थाओं ने तो निर्णय के उल्लंघन की घोषणा ही कर दी है। सरकार भी समिति के नाम से पल्ला झाड़ चुकी है। निर्णय नहीं बदलेगा।

 

यह तो हुई फाइलो का पेट भरने की बात। सच यह है कि इतने वर्षो में आवश्यकता के अनुसार व्यवस्था करने की रूचि सरकार ने दिखाई भी नहीं।

 

बोर्ड ने व्यवस्था के लिए स्थायी भूमि की मांग की थी, ताकि उसमें पाइप गाड़कर छोड़ दे। हर साल उन्हीं में लकडियां/ पाइप डालकर तम्बू/शामियाने लगा सकें। अभी तक इतनी सी बात पर निर्णय नहीं हो पाया। क्योंकि डर इस बात का है कि इस बहाने कहीं हिन्दू इस भूमि पर कब्जा नहीं जमा लें। जम्मू तथा शेष राष्ट्र को श्रीनगर से रेल से इसी कारण आज तक नहीं जोड़ पाए। सरकार खुले दिल से केन्द्र का साथ नहीं दे रही है।

 

अब यह घोषणा की जा रही है कि सन् 2016 तक एक गुफा (टनल) का निर्माण पूरा हो जाएगा। तब रेल मार्ग खुल सकेगा।

सरकार की इस मानसिकता के चलते आज अमरनाथ यात्रा राजनीति का नया अखाड़ा बन गई है। पहलगांव जाने का मार्ग अनन्तनाग हो कर जाता है। यह मुफ्ती मोहम्मद सईद (पूर्व मुख्यमंत्री) का क्षेत्र है। इतने यात्रियों के आने से लोगों को कई तरह के आर्थिक लाभ होते हैं। साथ ही साथ राष्ट्रीय स्तर पर भावनात्मक लाभ भी मिलता है।

 

चुनावों पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ता है। अत: नेशनल कानफे्रंस के नेताओं ने एक नया मार्ग खोल दिया। यह मार्ग कुछ छोटा भी है। चढ़ाई अवश्य टेढ़ी है। यह मार्ग बालटाल मार्ग के नाम से जाना जाता है। गांदरबल जिला अब्दुल्ला परिवार का गढ़ माना जाता है। इस वर्ष यहां से हजारों यात्रियों को हेलीकाप्टर से अमरनाथ तक ले जाने की व्यवस्था हो रही है।

 

यात्रा की इस अवघि का मुद्दा मुफ्ती मोहम्मद सईद ने ही उठाया था। वे इसे 60 से घटाकर 45 दिन कर देना चाहते थे। किन्तु तत्कालीन राज्यपाल ले.ज. एस.के. सिन्हा ने इसे स्वीकृति नहीं दी। बल्कि दूसरे मार्ग को लोकप्रिय बनाने की सोच पैदा कर दी। इससे सईद के प्रयासों को झटका भी लगा और कद भी कम हुआ। विवाद बढ़ता चला गया। पहलगांव चूंकि अनन्तनाग (झरना) जिले में पड़ता है, मुफ्ती मोहम्मद के लोगों ने यात्रियों के मार्ग में बाधाएं पैदा करना शुरू कर दिया। सरकारी अघिकारी इस कार्य में निमित्त बने। इसी विवाद ने सन् 2008 में उग्र रूप ले लिया था।

 

तस्वीर बदल गई। सन् 2008 में गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री बने। राज्यपाल की अध्यक्षता वाले बोर्ड ने सरकार से अस्थायी व्यवस्था के लिए भूमि उपलब्ध कराने को पत्र लिखा और नई सरकार ने स्वीकृति दे दी। जैसे ही राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त हुआ, सईद के लोगों ने कुछ ऎसा वातावरण बनाया कि गुलाम नबी सरकार ही गिर गई।

 

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि अमरनाथ यात्रा और वैष्णो देवी यात्रा को राज्य सरकारें किस दृष्टि से देखती हैं। वैष्णो देवी ट्रस्ट जहां विश्वविद्यालय चलाता है, वहां अमरनाथ यात्रियों के लिए आपातकाल चिकित्सा की व्यवस्था भी नहीं है। खच्चरों के लिए स्थान, सफाई, बिजली-पानी की व्यवस्था सुचारूनहीं है। यात्री कुण्ठित अथवा आक्रोश में लौटता है। किन्तु जम्मू एवं कश्मीर में चुनाव जीतने का यही मुख्य हथियार बन रहा है। आने वाला समय, आने वाली पीढ़ी तथा आने वाली सरकारें तय करेंगी कि भोले शंकर के दरबार में भक्तगणों की उपस्थिति देश को जोड़ने का कार्य करेगी अथवा तोड़ने का।

 

गुलाब कोठारी

2 टिप्पणियाँ »

  1. hinduo ke dharm sthlo ke sath ho rahe rajnitik bhed bhav ki aeshi ghinnoni kartutoo ka utr dene ke leye janta ko jagruk karne ke paryas me meri subhkamna.

    टिप्पणी द्वारा krishna maheswari — जुलाई 1, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया

    • किसी भी धर्मस्थल के साथ राजनीतिक भेदभाव नहीं हो- यही मेरी मंशा है।

      टिप्पणी द्वारा gulabkothari — अगस्त 18, 2012 @ 7:00 | प्रतिक्रिया


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