Gulabkothari's Blog

मई 25, 2012

आत्मघाती फैसले

अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में पहुंचते-पहुंचते राजस्थान की कांग्रेस सरकार को शायद यह पक्का भरोसा हो गया है कि अगली बार उसका हारना तय है। इसीलिए वह एक के बाद एक जनविरोधी कदम उठाने में जुट गई है। कदम भी ऎसे कि जिनसे या तो मुट्ठी भर प्रभावशाली लोगों को प्रदेश में खुली लूट मचाने का मौका मिल जाए या उसके परम्परागत वोट बैंक कब्जे में रहे, भले ही राजस्थान और उसकी आम जनता का भविष्य चौपट हो जाए।

 

सरकार के हाल ही उठाए गए कई कदमों को तो ‘आत्मघाती’ फैसले करार दिया जा सकता है। सरकार के लिए भी, और प्रदेश के लिए भी। ये फैसले जलाशयों से लेकर गोपालगढ़ और खनन तक को लेकर चल रहे अदालती मामलों से संबंघित हैं। एक फैसला जयपुर के रामगढ़ बांध को लेकर राजस्थान उच्च न्यायालय की एकल पीठ के निर्णय को तकनीकी पेच में उलझाने की कोशिश करने का है।

 

रामगढ़ बांध में उच्च न्यायालय ने अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए तो राज्य सरकार ने न्यायाधीश महोदय के अघिकार क्षेत्र पर ही सवाल उठा दिया। मंशा स्पष्ट थी कि बांध को मौत की नींद सुला देने वाले प्रभावशाली लोगोे के अतिक्रमणों को किसी तरह बचाया जाए। जयपुर के कई प्रभावशाली लोगों ने न सिर्फ जमीनें खरीद ली बल्कि राजस्व अघिकारियों की मिलीभगत से उनकी रजिस्ट्री भी करा ली। नदी की जमीन पर फार्म हाउस, कालेज और अन्य निर्माण हो गए।

 

होना तो यह था कि बांध को पुनर्जीवित करने के लिए सख्ती से अतिक्रमण हटाए जाते। पर मात्र छोटे किसानों के खेतों को उजाड़कर प्रभावशाली अतिक्रमणकारियों को बचा लिया गया। अब उच्च न्यायालय ने मामले को पुन: एकल पीठ को भेजकर सरकार के गाल पर करारा थप्पड़ मारा है। वह इसकी चोट से भी कोई सबक नहीं ले तो बेशर्मी की हद ही मानी जाएगी। इसी तरह जयपुर की ही मानसागर झील (जलमहल) के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय के जनहित में दिए गए फैसले के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट में जाने से संबंघित हैं। दोनों ही फैसले देखकर बच्चा भी कह देगा कि प्रदेश सरकार राज्य हित भूलकर प्रभावशाली धनपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए ये कदम उठा रही है।

 

सरकार ने प्रदेश हित की रक्षा करते हुए प्रायश्चित करने की बजाए झील को लीलने वाली कंपनी का साथ देना उचित समझा और फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में जा रही है। सरकार को समझना चाहिए कि जब वह जनता के हित से आंख मूंदकर सिर्फ प्रभावशाली लोगों के हाथोे की कठपुतली बन जाएगी तो उससे एक के बाद एक पाप होते जाएंगे। इन पापों की कालिख इतनी गहरी होगी कि मुफ्त दवा, सेवा गारंटी जैसे पुण्य भी कोई काम नहीं आएंगे।

 

जिस प्रकार केन्द्र सरकार सारा लोक चिन्तन छोड़कर दोनों हाथ लूट रही है। देख लो पेट्रोल के भाव! लाखों करोड़ लूटने वालों को खुली छूट। आय से अघिक सम्पत्तियों के मामले, जो वरिष्ठ अघिकारियों के विरूद्ध चल रहे थे, सरकार ने उनको वापिस लेकर कौनसा जनहित किया?

मोबाइल टावर्स का मुद्दा जानलेवा है। इस पर भी सरकार हाथी के दिखावटी दांतों की तरह दिखाई पड़ रही है। यदि अप्रेल में केन्द्र सरकार के नियम लागू होते तो लगभग सभी टावर्स आज करीब दस गुणा कम फ्रिक्वेंसी पर कार्य कर रहे होते।

 

कोई बात नहीं। टावर आपरेटर्स की ओर से धन बह रहा है। मरती रहे जनता। यदि नगर निगम के नियम देखें तो पता चलेगा कि स्कूल-अस्पतालों के पास तो टावर्स लगाने पर निषेध जैसे कई नियम हंै।  लेकिन राज्य सरकार आज तक इन नियमों को लागू कराने के लिए सख्ती बरतने से कतरा रही है। ऎसे में टावरों से होने वाले जानलेवा नुकसान के दंश तो शहरवासियों को झेलने ही पड़ेंगे। जयपुर मेयर भी इसको लेकर चुप्पी साधे हुए है। क्योंकि यह जनहित का मामला है, निजी हित का नहीं है।

 

राज्य सरकार ने यह भी सिद्ध कर दिया कि वह कानून को जेब में रखती है। न्यायालयों की फटकारों का अघिकारियों पर कोई असर नहीं होता। अवैध खनन के मुद्दे पर स्वयं मुख्य न्यायाधीश तो यहां तक कह चुके हैं कि माफियाओं का बस चले तो हाईकोर्ट को भी खोद डालें। इसी प्रकार पदोन्नति में आरक्षण के मामले में भी सरकार बेशर्मी से अवेहलना करती रही है।

 

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फैसले को चुनौती देकर सरकार ने यह भी सिद्ध कर दिया कि उसके घुटने अघिकारियों के आगे टिके हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद लाचारी में कुछ पदोन्नतियां वापिस भी करनी पड़ी, किन्तु सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बावजूद सरकार ने उसकी पालना नहीं की। यहां तक कि उच्च न्यायालय ने तत्कालीन मुख्य सचिव एस.अहमद एवं प्रमुख कार्मिक सचिव खेमराज को अवमानना का दोषी करार दे दिया, तब दोनों अघिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दे दी, किन्तु कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया।

 

भरतपुर जिले के गोपालगढ़ में फायरिंग के बाद कलक्टर कृष्ण कुणाल के निलम्बन के मामले में केन्द्रीय प्रशासनिक न्यायाघिकरण ने प्रथम दृष्टया निलम्बन को नियम विरूद्ध करार दे दिया था। निलम्बन के समय राज्य सरकार ने कहा था कि कुणाल के विरूद्ध जांच चल रही है। कुणाल ने न्यायाघिकरण को बताया कि कोई जांच नहीं चल रही। सरकार ने मामला दबाने के लिए ही झूठ बोला। जनहित की उसे कोई परवाह नहीं थी। सरकार तोे स्वयं फायरिंग को जरूरी बता चुकी थी। मुद्दा कोई एक नहीं है। दर्जनों बहुमंजिले मकानों तथा बड़े लोगों द्वारा किए गए अतिक्रमणों में सरकार आकण्ठ डूबी है, किन्तु जनहित में निर्णय करने को तैयार नहीं है। टावर्स हटाने के लिए स्वास्थ्य मंत्री से बात करके देखिए। उनका रूख ही बता देगा कि वे किसके साथ है।

 

इन सबका एक अर्थ यह भी है कि सरकार खड़ी रहने की शक्ति भी खो चुकी है। दिशाहीन नहीं कह सकते। सोच समझकर दुराग्रही अघिकारियों एवं धनाढयों के चंगुल में जकड़ चुकी है। क्या कांग्रेस इस प्रकार के निर्णयों से अपनी राजनीतिक मौत बुला रही है? परम्परागत वोट बैंक नाराज हो चुके हैं। विधायकों पर नियंत्रण छूट गया है। वे भी जनहित की बात अब नहीं सोचते। डर निकल चुका है मन से। समय बहुत नहीं है। समय से पहले मृत्यु को स्वीकार लेना कायरता है।

 

गुलाब कोठारी

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