Gulabkothari's Blog

मई 27, 2012

जन्नत का इंतजार..

जम्मू प्रवास वैसे तो बहुत ही छोटा था, किन्तु जीवन की एक यादगार बन गया। ऎसे अनेक तपस्वी, संघर्षरत और जर्जर शरणार्थियो के दर्शन हुए, जिन्होंने सन् 1947 के युद्ध में एक सपना लेकर भारत की भूमि तक पहुंचने का साहस किया था। भारतवासियों की धर्मपरायणता का मोहभंग हो चुका है। आज की उनकी स्थिति इस बात का प्रमाण है कि भारत ने उनको क्या दिया।

 

 

कई हिन्दूवादी संगठन भी समय-समय पर आगे आए होंगे, किन्तु स्थिति से किसी को उबार नहीं पाए। कई संस्थागत लोगों ने अपनी सेवाओं को लेकर दंभ भरे स्वर में दावे किए। कोई यह नहीं बता पाया कि जो भारत तीन करोड़ अनाघिकृत बांग्लादेशियों को झेल सकता है, वह 4-5 लाख पाकिस्तानी शरणार्थियों को क्यों नहीं खपा सका।

 

यदि एक-एक परिवार भी एक व्यक्ति को गोद लेता तो साठ साल में सभी शिक्षित एवं समृद्ध हो सकते थे। मैंने कश्मीरी पंडितों के शिविर भी देखे जम्मू एवं कश्मीर में। आंसू बहा रहे थे। किन्तु जब उनसे प्रश्न किया कि क्या आपने साठ साल में किसी शरणार्थी को एक गिलास पानी भी पिलाया, तब सभी निरूत्तर थे।

 

पिछले विधानसभा चुनाव में मैंने भाजपा अध्यक्ष को फोन पर पूछा था कि जिन कश्मीरी पंडितों को निष्कासित कर दिया गया है, उनके मतदान की क्या व्यवस्था रहेगी? क्या भाजपा चुनाव आयुक्त कार्यालय के बाहर धरने पर बैठेगी अथवा जो कुछ होगा, उसमें भाजपा की मौन स्वीकृति होगी? फोन बन्द हो गया।

 

कान तो शायद फोन से भी पहले बन्द हो गए थे। देश में हिन्दुत्व के नाम पर लाखों संत समाज पर बोझ बने हुए हैं। हजारों संगठन अपनी-अपनी सेंक रहे हैं। इनको अपना चोला उतार फेंकना चाहिए। जैसे आम भारतवासी रहता है वैसे ही रहना चाहिए। जब आप साठ साल में लोगों की सहायता तक नहीं कर पाए, आन्दोलन नहीं कर पाए, संसद को नहीं हिला पाए, तब क्या जरूरत है अमरनाथ के नाम पर विवाद उठाने की? कभी जाकर तो देखो इन शरणार्थियों की स्थिति।

 

हम भी सरकार की तरह फाइलों का पेट भरकर सो जाते हैं। हमारे ऋषियों ने हिन्दुत्व के नाम से जो जीवन शैली दी है वह धर्म और नाम बदलने से मिटने वाली नहीं है। कश्मीरी पण्डितों के शिविर में एक महिला ने बताया कि हम एक छोटी सी रसोई में चार परिवार चार चूल्हे जलाते हैं। एक कमरे के लेट में चार परिवार रहते हैं। सरकार कुछ नहीं करती। मुझे भी कुछ आवेश आ ही गया। मैंने कहा कि तुहारे सामने तुहारी ही बहन-बेटियों की इज्जत लूटी जा रही थी, तुम अपनी जान बचाकर भाग आए! पहले तुमको मरना चाहिए था। तुम मांग भी उन्हीं से रहे हो?

तभी उनमें से एक बोला कि जब से हम यहां से गए हमारे ऊपर प्रेशर था। टेंट में रहना, पढ़ाई करना। ग्रेज्युएशन होने तक हम लोग थोड़ा कंफर्टेबल हो गए।  एक कमरा बन गया, किसी ने मकान बना लिया दो कमरे का। अघिकांश ने अपने-अपने घर बना लिए। मैंने उनसे कहा कि ये जो आप कम्फर्ट शब्द बोल रहे हैं न ये ही आज आपका शत्रु है।

 

अगर वो कम्फर्ट नहीं मिलता, आपका स्ट्रगल जारी रहता तो हालात ये नहीं होते। आपके पास इतना साहस है क्या कि सारे के सारे आदमी एक साथ इस्तीफा दे दें और दिल्ली में जाकर प्रेस कान्फ्रेंस करें और बताएं कि, हम सब लोग इस कारण से नौकरी छोड़कर वापिस आ गए हैं। बात आपके साहस और संकल्प की है? रास्ता हमें निकालना होगा और मिलकर निकालना होगा। अकेले का संकल्प कहीं भी काम नहीं आएगा। आपको आगे आने वाले बच्चों के लिए, पीढियों के लिए अपने आपको दांव पर लगाना ही होगा। याद रखिए कोई घर बैठे आकर हमको मदद नहीं करेगा।

 

हमें हर चीज के लिए लड़ना होगा। बात करने से कोई नतीजा नहीं आने वाला। मैं खूब लोगों से मिला हूं लेकिन मुझे इस बात का बड़ा अफसोस है कि यहां किसी के चेहरे पर संकल्प नहीं है,  किसी की आवाज में संकल्प नहीं है।

 

एक स्त्री खड़ी हुई। उसने बताया कि कुछ दिन पहले एक मुस्लिम महिला शिविर में आई थी। वह हमारे मर्दो को गालियां दे रही थी। हमको बहुत बुरा लगा, तो उससे कारण पूछने लगे। कुछ ठहर कर स्त्री की आंखों में पानी बह चला। ‘मुस्लिम महिला ने कहा कि तुम्हारे ये मर्द बेशर्म हैं। इनको जीने का हक नहीं है।

 

एक टुकड़ा डाल दिया इनके आगे और ये भूल गए, हमारे लोगों ने इनकी बहन-बेटियों के साथ क्या सलूक किया था?’ इस देश में मानवता की   संवेदना सदा आगे रही है। साम्प्रदायिकता बहुत बाद की बात है। उसी देश में धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर कैसी राजनीति होती है, उसका जीता-जागता नमूना शरणार्थियों के शिविर हैं। कितने विद्वान और सेवा भावी हैं हमारे नेता और अघिकारी, आप इनकी हालत देखकर अवश्य समझ जाएंगे। ये नहीं होते तो शायद हालात ज्यादा बेहतर होते।

 

गुलाब कोठारी

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