Gulabkothari's Blog

मई 30, 2012

पहले जो बसे वो फंसे

मंगलवार को इंदौर के लघु उद्योग क्षेत्र के उद्यमियों के साथ वार्तालाप करके यह अनुभूति हुई कि मध्यप्रदेश सरकार का उद्योग विभाग किसके लिए कार्य कर रहा है। कम से कम उद्यमियों के लिए तो नहीं कर रहा है। ऎसी ही तस्वीर भोपाल के लघु उद्योग क्षेत्र में देखने को मिली थी। एक ओर शासन की तस्वीर है, तो दूसरी ओर प्रशासन की।

 

 

यहां तक सुनने को मिला कि 40 साल में कोई माई-बाप नहीं मिला। यह दर्द भी एक कमाऊ पूत का है। इनको इस बात का विश्वास हो चला है कि सरकार अब इनकी बात नहीं सुनेगी। उसका ध्यान तो बड़े उद्योगों पर अटक कर रह गया है। सबकी आंखों में ग्लोबल इन्वेस्टमेंट का ग्लैमर छाया हुआ है। किसी ने इनको पूछा क्या कि खजुराहो वाली मीट के क्या परिणाम आए? क्या हमारी हालत को समझे बिना कोई भी सरकार के भरोसे धन लगा देगा? हमारी आज की स्थिति ही तो उनका भविष्य होगा।

 

आज 60 साल बाद भी औद्योगिक क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। न सड़कें, न बिजली, न पानी, न मजदूर, न ही कच्चे माल की सुचारू व्यवस्था। सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं। थूकती रहती है और चाटती रहती है। पता नहीं, उद्यमी कोर्ट में क्यों नहीं जाते? शायद, अफसरों के व्यक्तिगत संत्रास से डरते हैं। इससे तो उपेक्षित रहना ही ठीक है। इनका कोई आयोग तो हो जैसे कि महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, जहां ये फरियाद कर सकें।

 

पिछले 6 साल में 12 इन्वेस्टर्स मीट हो चुकी हैं। विकास कुछ हुआ नहीं है। यदि कोई नया मुर्गा पकड़ में आ भी गया, तो उपलब्ध साधनों को ही तो बांटेगा। वो भी डूबेगा, हम भी डूबेंगे। लगता है जो पहले बस गए, सो फंस गए। लोगों को शिकायत है अटलजी मध्यप्रदेश में रहे। उनको यहां गरीबी दिखाई नहीं दी। हिमाचल जैसे प्रांतों की तो दिख गई। प्रधानमंत्री सड़क योजना इस तरह बनी कि चारों दिशाओं से कॉरिडोर में से कोई मप्र को नहीं छूता।

 

हमारा गोल्डन त्रिकोण भी नहीं। रेलवे में भी पीछे। माही से पीथमपुर पानी लाने की मांग की तो शर्त रख दी कि 35 रूपए प्रति हजार लीटर देना होगा। देश में आज भी 21 रूपए से ज्यादा दर कहीं नहीं है। योजना आगे ही नहीं बढ़ पाई। जमीनों के भाव तीन से चार गुना। बिजली दरें 130 प्रतिशत बढ़ चुकी। न्यूनतम मजदूरी पंजाब और कर्नाटक से अधिक। जनसुविधाएं मिलती नहीं। स्कूल-अस्पताल के अभाव में इंदौर जाना है। ईएसआई अस्पताल में कोई सेवा नहीं। टेस्ट के लिए भी इंदौर जाओ। मजदूर मानता है मालिक तो ईएसआई के पैसे काटता है।

 

सबसे बड़ी शिकायत तो यह कि घोषित नीतियों के नोटिफिकेशन जारी नहीं होते। जब कभी जारी करना पड़ता भी है तो कई तरह के कॉमा, फुलस्टॉप लगाकर मतलब ही बदल देते हैं। स्टाम्प ड्यूटी अधिकतम 50 हजार रूपए तथा आधा प्रतिशत पंचायत टैक्स का प्रावधान था। मुख्यमंत्री से मिले तो पंचायत टैक्स चौथाई प्रतिशत कर दिया तथा स्टाम्प ड्यूटी 5 लाख कर दी। लाइसेंस का प्रतिवर्ष नवीनीकरण न हो और पांच साल में एक बार हो जाए तथा उसके लिए सारी राशि एकमुश्त जमा कर दी जाए, इस पर स्वीकृति हो गई। जब आदेश जारी हुआ तो उसमें लाइसेंस राशि पांच गुना करना लिखा था। न जाने किस माटी के बने हैं ये अधिकारी। इनको मिलता कुछ नहीं, किंतु दूसरों को रूला-रूलाकर हंसने में मजा आता है।

 

पहले जो बसे वो फंसे ञ्च पेज 9

आज हर उद्योग का कोई न कोई प्रकरण सरकार के साथ चल रहा है। क्यों नहीं सरकार इनके निराकरण के लिए शिविर लगा दे?

सन् 2004 में नीति बनी कि किसी उद्यमी की मृत्यु पर उसके वारिस के नाम सारी स्थानांतरण प्रक्रिया एक हजार रूपए में पूरी हो जाएगी। आज तक तो लागू नहीं हो पाई। बिजली की दरें पहले ही 8-9 रूपए हैं। ऊपर से 12 प्रतिशत वैट? किसी को यह दर्द नहीं है कि सन् 2005 में इंदौर में 4000 लूम थे, जो आज 1000 रह गए। हुकमचंद मिल मजदूरों को वेतन नहीं मिलता, क्योंकि विभाग भुखमरा है। डबल टैक्स सिस्टम से छुटकारा नहीं मिला।

 

बड़े उद्योगों के लिए तो 4-5 अधिकारी चिलम भरते हैं। हमारे लिए तो फूड पार्क में भी राजनीति होती है। फसल कहीं होती, फूड पार्क कहीं और। गुना, ग्वालियर, छिंदवाड़ा में। कैसे कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिग संभव हो। कानून में तो आज लहसुन-प्याज भी सब्जी में नहीं आते।

 

खाद वाले कह रहे थे कि 60 प्रतिशत आयात करना पड़ता है। सब्सिडी के सहारे बेच पाते हैं। भाव 600-700 से बढ़कर 1100-1200 हो गए। बड़े कारखानों की कमी हम पूरी करते हैं, तो हमारे काम को बंद कराने का भी षड्यंत्र चल रहा है। अभी आनन-फानन में कानून बना दिया कि सालभर का सारा कच्चा माल एक ही बार खरीद सकेंगे। बाद में बाजार बढ़ता भी है तो आपको माल के खरीद-बेच की स्वीकृति भी नहीं मिलेगी। लगता है कि हम आजाद हिंदुस्तान के गुलाम लोग हैं।

 

अंत में एक उद्यमी तो यहां तक कह पड़े कि हमारी तो मति मारी गई थी जो उद्योग लगाया। अब तो बंद करने के लिए भी रिश्वत मांगते हैं। कई उद्योगों में तो कोर्ट द्वारा जारी स्टे की भी अवज्ञा हो रही है। सड़कों पर अतिक्रमण हो रहे हैं, दमकल जा नहीं सकती। कोई बात नहीं, जल जाओ। सन् 2009 में संधारण शुल्क की व्यवस्था लागू की थी। इस राशि को विकास में (उद्योगों के) लगाने के लिए। राघव ने कहा कि यह तो वित्त विभाग में जमा होनी थी।

 

यह सही है कि इसका एक उत्तर न्यायालय जाना ही रह गया है। विभाग के नेता-अधिकारी पथरा गए हैं। मानवीय संवेदना नहीं बची उनमें। इसीलिए इतने उद्योग बंद भी हो गए। किसी अफसर का वेतन तो कटा नहीं। उद्यमी के पास कोई विकल्प ही नहीं है। ईश्वर यदि प्रदेश का विकास चाहता है तो या तो अफसरों को सद्बुद्धि दे या न्यायपालिका को प्रसंज्ञान लेने की प्रेरणा दे।

लौटकर संभागीय आयुक्त को सारी बात बताई तो उन्होंने तुरंत ही उद्योगपतियों से मिलकर कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।

 

गुलाब कोठारी

 

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