Gulabkothari's Blog

जून 3, 2012

स्त्रीत्व का विकास

शिक्षित वर्ग की एक सामाजिक कार्यकर्ता ने पूछा कि क्या राजस्थान पत्रिका के साथ जुड़कर कोई बड़ा कार्य हाथ में लिया जा सकता है? अभी जो कार्य आपके हाथ में है, उसके लिए भी तो प्रायोजक नहीं मिल रहे आपको! इसके प्रायोजक आप ही बन जाइए और नए के लिए भी आप ही बन जाना। “चंूकि आप मुम्बई में रहती हैं, तब आपको राष्ट्रीय स्तर के किसी शैक्षणिक गतिविघि पर विचार करना चाहिए। उदाहरण के लिए “स्त्रीत्व का विकास”।

 

 

इतना सुनते ही वह महिला चौंक पड़ी “क्या कहना चाहते हैं आप? यह भी कोई विषय है?” मैंने पलटकर हामी भरी “क्यों नहीं” क्या आपको लड़कों की जीवन शैली में, चिन्तन में, धर्म, समाज और परिवार के प्रति सोच में अन्तर नजर आया? क्या लड़कों ने ससुराल जाकर रहना शुरू कर दिया अथवा लड़कियों की जीवन शैली स्वीकार कर ली? इसके विपरीत क्या लड़कियों का मूल चिन्तन और जीवन के प्रति अवधारणा नहीं बदली? क्या यह परिवर्तन एक पक्षीय नहीं है? लड़के तो लड़कों जैसे और लड़कियां भी लड़कों जैसी।

 

क्या इससे संतुलन नहीं बिगड़ रहा? प्राकृतिक रूप, सामाजिक स्वरूप तथा गृहस्थी का केन्द्र, क्या येे तीनों स्तर प्रभावित नहीं हो गए हैं? लड़को की स्थिति तो आगे यही रहने वाली है। सुख और शान्ति का जीवन चाहिए तो लड़की को पहले अच्छी स्त्री बनने का प्रयास करना चाहिए। उसे स्त्रैण भाव देने की जिम्मेदारी उसकी माता की भी है। आज उसके पुरूष रूप में जीने की ललक ही तलाक बढ़ा रही है। एक नारी के लिए विवाह करके सन्तान पैदा कर देना ही काफी नहीं है। वह तो सभी प्राणियों को मादा करती ही है। स्त्रैण का वात्सल्य रूप हर मादा में रहता ही है। हर मादा अपनी सन्तान को प्यार करती है।

 

किन्तु चिन्तन से स्वतंत्र नहीं होने के कारण अघिभूत, अघिदेव तथा आध्यात्म के धरातल को नहीं समझ सकती। महिला ने मुझे रोका। बोली-“यह सारी बातें क्या पुरूषों पर लागू नहीं होती?” “नहीं”! प्रकृति में ब्रह्म निष्काम कहलाता है। माया ही गतिशील और क्रियात्मक तžव है। जन्म, पोषण, जीवन, मृत्यु सभी तो माया के हाथ है। पुरूष का स्वरूप निर्घारण भी माया के हाथ में हैं। विवाह के बाद ही पुरूष का स्वरूप निर्माण कार्य शुरू होता है। स्त्री को संकल्पवान कहा है। क्या किसी गृहस्थी का स्वरूप बिना स्त्री के बन सकता है! बच्चे, बूढ़े, रिश्तेदार सभी तो उसके चारों ओर रहते हैं। समाज का निर्माण पुरूष तो कर ही नहीं सकता। यह दक्षता केवल स्त्री में, माया भाव में, शक्ति रूप में परिलक्षित होती है।

 

मैं आप से सवाल करना चाहता हूं कि क्या पुरूष भगवान से अच्छी पत्नी पाने के लिए प्रार्थना करता है? और इसके विपरीत एक महिला? “चुप” टकटकी लगाए मेरी ओर देखती रही। “क्या पुरूष जान सकता है कि जो जीव इस परिवार में आ रहा है, वह किस योनि की देह त्यागकर आया है?”

“क्या स्त्री जान सकती है?” विस्मित सी आवाज में दोनों ओर बैठी अपनी मित्रों को बारी-बारी से देखने लगी। कुछ असहज भी लग रही थी। उसको विश्वास नहीं हो पा रहा था कि ऎसा कभी संभव है।

“उसको यह तो पता चल जाता है कि कब गर्भ में जीव का प्रवेश हुआ?”

“कोई उत्तर नहीं।”

 

“जब भीतर हाथ-पांव चलने लगते हैं।”

“चुप्पी।”

 

“तब क्या उसके विचारों में, खान-पान की इच्छाओं में, स्वप्न-सुषुप्ति में भी अन्तर आता है! इन्हीं में जीव के स्वरूप की सारी सूचनाएं रहती हैं। जब कोई भी तीर्थकर गर्भ में आता है, तो माता को चौदह स्वप्न आते हैं।  भावनाओं में विशेष प्रकार की निर्मलता, आद्रता आ जाती है। “विषय तो रोचक लग रहा है। विचार करना तो अवश्य चाहिए।” सहमति की शुरूआत हुई। “आपने सुना होगा कि अभिमन्यु ने गर्भ में ही चक्रव्यूह में प्रवेश करना सीख लिया था।” पेट के जीव की उम्र और मां-बाप की उम्र में भी अघिक अन्तर नहीं होता। दोनों ही चौरासी लाख योनियों में भटक चुके होते हैं। गर्भस्थ शिशु भी उतना ही समझता है, जितना कि माता-पिता। अभिव्यक्ति का ही अन्तर है। गर्भस्थ अवस्था में माता-सन्तान एक-दूसरे के भाव स्पन्दनों को समझ लेते हैं। माता उसे भी मानवीय संवेदनाओं से परिचय करवाती है। गुरू बनकर सन्तान का रूपान्तरण करती है। उसे मानव बनाती है। भले ही वह किसी नृशंस योनि से ही क्यों न आया हो।

“आश्चर्य जनक लग रहा है। किन्तु तारतम्य भी दिखाई

देता है।”

 

“दिक्कत का स्थान भी तो यही है।”

“वह कैसे?”

“यदि स्वयं मां के जीव का उसकी मां ने रूपान्तरण नहीं किया हो, तब? स्वयं माता के भीतर ही मानव की आत्मा नहीं होगी।” जिस योनि से जीव ने आकर माता की देह में प्रवेश किया, वही जीव इस जीव को पैदा करने जा रहा है। यदि माता की आत्मा वन्य पशु की देह से आई है, तब वह नारी देह को भी उसी पशु की तरह काम में लेगी। उसे न मन का पता, न मानव का। न संस्कार जानती है, न ही मर्यादा। तब उसे सन्तान के बारे में क्या पता चलेगा। अच्छे पति अथवा अच्छी सन्तान के लिए वह कैसे ईश्वर से प्रार्थना करेगी।

 

कैसे समझ सकेगी कि जीव कहां से आया और इसको क्या सिखाना है। उल्टे अपना पशु स्वभाव ही देगी। “आहार-निद्रा-भय-मैथुन”। सन्तान को मानव के संस्कार तो दे ही नहीं पाएगी। जैविक सन्तान ही पैदा करेगी। तब मानव समाज का निर्माण कैसे होगा। नर हो या नारी, देह तो जड़ है। उसका उपयोग करने वाला चेतन जीव सदा आक्रामक ही रहेगा। हर तरफ स्वच्छन्दता और अशान्ति छाएगी।

 

इसका एक अर्थ तो स्पष्ट हो जाना ही चाहिए कि सन्तान को जन्म पूर्व संस्कार तो केवल मां ही दे सकती है। पिता नहीं दे सकता। वह पत्नी के पास स्नेह का वातावरण बनाकर रख सकता है। ताकि वह मातृत्व के सुख को भोग सके। सन्तान पर कुछ सकारात्मक प्रभाव पड़ सके। प्रश्न यहां भी वही उठता है कि यदि पिता की मां ने भी पिता को गर्भ में संस्कारित नहीं किया हो तब? पुरूष देह में भी कोई अन्य जीव रह रहा होगा। आने वाली सन्तान के लिए वही बीज का काम करेगा। जैसी गुठली-वैसा आम! “वाह, क्या विषय बन पड़ा है!” अब उसके चेहरे पर कुछ सहजता आ गई थी।

 

क्या अब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि मां का भूमिका ही सृष्टि का स्वरूप है। लड़का हो अथवा लड़की उन्हें मानवता देना, संघर्ष की शक्ति देना, पहचान देना केवल माता के हाथ में है। वही माता बनने से पहले पति को संवेदनशील भी बना देती है, ताकि उसका बीज भी परिष्कृत हो सके। तब बीज के धारण और पोषण की प्रार्थना करती है। आने वाले जीव को पति एवं परिवार के अनुरूप ढालने का संकल्प दोहराती है।

“वाह, वाह! बहुत ही रोचक है।”

 

नारी की यह सारी क्षमताएं आज की शिक्षा ने छीन ली। उसे मात्र देह तक समेटकर छोड़ दिया है। उसका स्त्रैण भाव, शक्ति रूपता सब समाप्त हो रहे हैं। पुरूष में तो कभी थे ही नहीं। वह तो खुश है कि अब वह स्वच्छन्द होकर स्त्री सुख भोग सकता है। समय के साथ हर नर-नारी देह में पशु अवतार लेते जा रहे हैं। सिलसिला तब तक जारी रहेगा, जब तक नारी फिर से स्त्रैण रूप ग्रहण कर लेगी। अग्नि में सौम्या का समर्पण नहीं हो जाएगा। वरन् यह धरती मानव-शून्य हो जाएगी। कलयुग के नाम पर मानव के प्रथम गुरू को भी गुरू की तलाश है। धर्म के साथ, अर्थ और काम के रास्ते होकर मोक्ष तक पहुंचना तभी संभव है जब, बीज (पिता), धरती (माता) भी संस्कारित हो और सन्तान भी। ये केवल माया ही कर सकती है।

 

गुलाब कोठारी

 

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