Gulabkothari's Blog

जून 6, 2012

नम्बर दो

भारत जैसे सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में नेतृत्व का अभाव दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। स्व. इन्दिरा गांधी के लिए यह कहा जाता था कि वह किसी अन्य नेता को उभरते हुए देखना नहीं चाहती थीं जो आगे जाकर उनके लिए चुनौती खड़ी कर दे। इसी का प्रभाव है कि राष्ट्रीय स्तर पर नेता उपलब्ध ही नहीं हैं। राज्यों में कहीं-कहीं स्थानीय नेता भी दिखाई पड़े, किन्तु वे भी ज्यादा दिन स्वतंत्र नहीं रह पाए।

 

केन्द्र ने वहां तक अपने पंख फैलाकर उनको समेट लिया। बाद में तो वहां भी चुनाव बन्द होकर मनोनयन का दौर शुरू हो गया। बिना विरोध के लोकतंत्र खो गया। एक दिन पूर्व ही मीडिया ने प्रचारित किया है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के नाम सोनिया गांधी तय करेंगी। क्या यही लोकतंत्र है? आज सत्ता का यही नया, भयावह चेहरा उभरकर आया है। सत्ता में चुनाव का दौर हर एक दल में लगभग समाप्त हो चुका है। मनोनीत व्यक्ति को ही सर्वसम्मति से चुन लिया जाता है। लोकतंत्र के इस आत्मघाती रूप की छाया आज हर जगह देखी जा सकती है।

 

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी नम्बर दो कहां तैयार किया। कांगे्रस में प्रश्न उठने लगे हैं कि सोनिया गांधी के बाद कौन? राहुल अभी स्वीकार्य नहीं हैं। इस परम्परा का प्रभाव कांग्रेस शासित राज्यों में देखा जा सकता है। आलाकमान यदि किसी मुख्यमंत्री के कार्यो से संतुष्ट नहीं है, तो भी उसे हटा पाना सहज नहीं है। कहीं भी नेतृत्व रूप में नम्बर दो दिखाई नहीं पड़ता। जो बैठा है वह इस मानसिकता के साथ बैठा है कि उसे कभी भी हटाया जा सकता है। अत: जी भरकर लूटने में व्यस्त है। कांगे्रस अपने भ्रष्ट लोगों को कभी सजा नहीं देती। यही नेतृत्व की सुरक्षा का मूल आधार है।

 

भाजपा की स्थिति तो और भी खराब है। वहां राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं है। नेतृत्व के रूप में आज भी गडकरी ही पार्टी की मजबूरी हैं। उन्हीं की पुनर्नियुक्ति की चर्चा हो रही है। इनके चहेतों की सूची देखें तो शिवजी की पूरी बारात है। आपराघिक तत्वों ने जगह-जगह डेरा डाल रखा है। इनके निर्णयों से अनेक बार भाजपा की जगहंसाई और किरकिरी हो चुकी है। राष्ट्रीय स्तर का ग्राफ नीचे गिरता ही जा रहा है, किन्तु सच्चाई यह भी है कि भाजपा में नम्बर एक भी यही हैं और नम्बर दो भी यही हैं। भाजपा का भविष्य खतरे में हो तो हो।

 

क्षेत्रीय दलों की स्थिति तो पूर्णरूप से सामन्तवादी ही है। मायावती, लालू प्रसाद, मुलायम, जयललिता और अब ममता बनर्जी। इनकी मर्जी के बिना इनकी पार्टी में कुछ हो ही नहीं सकता। तब नम्बर दो कहां से आएगा? क्या ये दल अपने नेता के साथ ही सिमट जाएंगे? यह तो स्पष्ट है कि इन दलों में नम्बर दो कभी तैयार नहीं होगा। मुलायम के पीछे जरूर अखिलेश खडे दिखते हैं, भले परिवारवाद की छाया है।

आज अन्ना हजारे और बाबा रामदेव सरकार के विरोध में धरने पर बैठे हैं। अन्ना स्वयं पका हुआ पत्ता हैं। उनके बाद नम्बर दो कहां है, जिसको इस देश का युवा स्वीकार कर ले?

 

तब क्या अन्ना का आन्दोलन अन्ना के साथ ही सिमट जाएगा? केजरीवाल, हेगडे या किरण बेदी तो उनका स्थान नहीं ले पाएंगे। यही हालत बाबा रामदेव की है। पहली बात तो यह है कि उनका आचरण न तो पूर्णतया साधु सम्मत है, न ही गृहस्थी जैसा। उद्योगपति की छवि भी है। उनका ग्राफ भी झटकों के बीच झूलता रहा है। उनके पीछे भी नम्बर दो नहीं है। इतने बड़े स्तर के राष्ट्रव्यापी अभियान क्या एक-एक व्यक्ति के सहारे लम्बी उम्र झेल पाएंगे? तब इस गठजोड़ पर भी आशंकाएं तो बनी ही हैं। जहां देश के प्रति लगाव नहीं होता, वहां नम्बर दो कैसे पनप सकता है। यही आज का कड़वा सच है।

 

इसका कारण बस एक है। विकास के इस दौर में सभी गृहस्थाश्रम में ही जीना चाहते हैं। भौतिकवाद का तकाजा भोग ही है। नम्बर दो को तैयार करने के लिए नम्बर एक को स्थान खाली करना पड़ेगा। स्वयं को बीज की तरह जमीन में गाड़कर अपने अस्तित्व को भूल जाना होगा। तब नया निर्माण संभव है। हाथ-पांवों के चलते पद से हट जाना असंभव है। सुविधा में निर्माण नहीं हो सकता। तपना ही पकना है। नम्बर दो बनाने के लिए पहले स्वयं को तपना होगा, नम्बर दो को तपाना होगा, फिर एक नम्बर पर प्रतिष्ठित करना होगा। देश तब बनेगा।

 

आज देश के बड़े औद्योगिक घरानों में भी चिंतन शुरू हो गया है कि, समय रहते कैसे घराने का उत्तराघिकारी तैयार किया जाए। इसका जीता-जागता उदाहरण रतन टाटा द्वारा अपना उत्तराघिकारी तैयार करना है। आज सरकारी उपक्रमों में तो किसी को ऊंचा उठने की चिंता ही नहीं है। वहां का साम्राज्य तो घाटे पर ही आधारित रहता है। यदि सरकार वहां भी योग्य एवं अनुभवी लोगों को सीधे भर्ती करके काम सौंप दे तो सभी उपक्रम मुनाफे में आ जाएंगे। देर तो हो चुकी है किन्तु विकल्प न होने के कारण राजनीतिक दलों को तो तुरंत ही अपने-अपने ‘नम्बर-दो’ तैयार करने में जुट जाना चाहिए।

 

 

गुलाब कोठारी

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