Gulabkothari's Blog

जून 8, 2012

अन्न देवता का अपमान

आज प्रात: पढ़ा कि गंगानगर में बारिश हुई और मण्डी में रखी गेहूं की बोरियां भीग गई। क्या किसी को इस बात को सुनकर दु:ख हुआ? अफसर शायद इस बात से खुश भी होंगे कि एक ओर गेहूं सड़ा तथा दूसरी ओर पशु आहार में इसे बेच भी देंगे। 

क्या कारखानों के उत्पाद और कृषि उत्पाद के बीच उनके लिए कोई भेद नहीं है! संवेदना की भाषा क्या इतनी पथरा गई? मुझे एक पूर्व मुख्यमंत्री बताते थे कि किस प्रकार अघिकारी अच्छी किस्म के सरकारी अनाज को बाजार में बेचकर घटिया गेहूं खरीदकर वितरण करवा देते थे। अपनी सारी समझदारी इन्हीं कार्यो में लगाते हैं। रामगढ़ बांध नहीं सूखता तो बीसलपुर योजना कैसे बन सकती थी?

 

बरसात मेें गेहूं का भीगना कोई नई बात नहीं है। राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक सभी राज्यों की कहानी एक जैसी है। परन्तु पिछले दस वर्षो में जिलेवार कितने गोदाम बनाए गए? राज्य में भण्डारण की क्षमता कितनी है और खरीद कितनी हुई? फसल आने के समय कितने गोदाम अन्य मदों (सामग्री—दवाइयां, फल आदि) में किराए दे रखी थी।

 

निजी क्षेत्र में भी कई गोदाम बनवाए गए थे। उनमें से कितने उपलब्ध हो पाए और अन्य के साथ समझौता नहीं था क्या? सरकार क्या उचित किराया नहीं देती; वरना इस क्षेत्र के कई निवेशक आगे आ सकते थे। भण्डारण के साथ क्या 24 घंटे बिजली मिलती है?

 

राज्य सरकार, कृषि विभाग, जिला प्रशासन का दायित्व है कि जिले एवं राज्य की फसलों का योजनाबद्ध नियंत्रण करे, ताकि कोई फसल इतनी अघिक भी न हो कि किसान को पूरी लागत भी न मिले। मेहनत का लाभ पूरा मिले। यही गेहूं यदि बुवाई के समय रोक दिए जाते, भण्डारण तथा बाजार के उठाव का ध्यान रखा जाता, तो कई क्षेत्रों में गेहूं के स्थान पर अन्य महंगी फसलें भी बोई जा सकती थीं।

 

इस तरफ सरकार एवं अघिकारी गंभीर नहीं दिखते। सरकार को जांच करानी चाहिए कि खरीदी के समय और बरसात के बीच अंतर इतना कम क्यों रहा। जिला स्तर पर फसलों की मॉनीटरिंग क्यों नहीं हुई तथा दोषी लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? यह बात जनता को बताई जानी चाहिए। मध्यप्रदेश में बारदाना की कमी का मामला सामने आया। किन्तु सारे मुद्दे आग लगने के बाद कुएं खोदने जैसे हैं। यह अचानक नहीं हुआ।

 

हर साल ऎसा ही होता है, किन्तु समय रहते कोई तैयारी नहीं की जाती। अगले महीने ही देख लेना पानी बरसेगा, नुकसान होगा और सबसे पहले बाढ़ राहत की सामग्री बह जाएगी। लोग बस एक-दूसरे की मदद करते दिखाई देंगे। आज तक किसी को भी दोषी नहीं पाया जाता।

 

एक और अच्छा कार्य हो सकता था। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत ने एक योजना शुरू की थी— काम के बदले अनाज। आज जैसे हालात राजस्थान तथा मध्यप्रदेश में हैं, वहां तुरन्त नरेगा श्रमिकों के लिए इस योजना को लागू कर देना चाहिए। आधी मजदूरी अनाज के रूप में। हां, आधे धन का बड़ा हिस्सा भ्रष्ट लोग खा जाएंगे।

 

उन्हें गेहूं की क्या जरूरत पड़ेगी। किन्तु राज्य सरकार गेहूं को सड़क पर सड़ने से रोक सकती है। खून-पसीने की कमाई काम तो आएगी। इसमें किसी प्रकार की राजनीति नहीं होनी चाहिए। मनरेगा में गोदाम बनवाने जैसे स्थाई और उपयोगी काम भी करवाए जा सकते हैं।

 

आगे से फसलों की योजना बनाई जाए, भण्डारण के अभाव से सरकार पल्ला नहीं झाड़े तथा पहली खरीद के साथ ही काम के बदले अनाज शुरू हो जाए तो अन्न देवता का ऎसा अपमान नहीं होगा।

 

गुलाब कोठारी

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