Gulabkothari's Blog

जून 10, 2012

पानी का नाटक

राजस्थान से अधिक कौन-सा राज्य जल का महत्व समझता होगा। आज यदि यहां का नागरिक सर्वाधिक त्रस्त है, तो पानी की समस्या से। सरकारें सदा ही ‘उधार लेकर घी पीने’ का मार्ग अपना रही हैं। नौकरशाह पानी के प्रति कभी संवेदनशील रहे ही नहीं। पानी की कमी होती जान पड़े, तो तुरन्त करोड़ों की योजना बनाकर मंत्रिमंडल के आगे रख देंगे। कहीं से भी जल ले आएंगे। भले ही वहां के किसान, पशु एवं अन्य आबादी प्यासी रह जाए। खेती सूख जाए। ज्यादा दबाव बढ़ा तो वहां कहीं और स्थान से पानी ले आएंगे। नई योजना का बजट मिल जाएगा।

आज राज्य की दुर्दशा का कारण राजनीति भी है। भ्रष्टाचार भी है। अधिकारियों की क्षुद्र मानसिकता भी है। संवेदनहीनता तो है ही। क्या पचास फीट के भराव वाला रामगढ़ बांध अपने आप सूख गया? इसकी जमीन पर हल चलाते हुए, मकानों की नींवें खोदते हुए किसी का सीना फट क्यों नहीं गया? बीसलपुर का पानी भी रामगढ़ में डालते तो पचास कि.मी. तक के गांव हरे हो जाते। जमीन में जल का स्तर बढ़ गया होता, परन्तु इनका ध्यान तो मकान बनवाने पर टिका था। तीस लाख लोगों की बद्दुआओं का इनके लिए कोई महत्व नहीं था। जो नुकसान मुगलों और अंग्रेजों ने नहीं किया, हमारे अपनों ने कर दिखाया। सन् 1982 के एशियाड में यहां नौकायन की प्रतियोगिताएं हुई थीं। आज असुर प्रदेश बन गया है।

ठीक यही दुर्दशा राज्य के अनेक बांधों की हो चुकी है। उच्चतम तथा उच्च न्यायालय के फैसलों को स्थानीय न्यायपालिकाएं लागू नहीं कर पा रही हैं। झीलों के किनारे भवन, होटल निर्माण स्थानीय पालिकाओं के सहयोग से ही होता है। शहर की गन्दगी उन्हीं में मिलती है। पर्यटन और बीमारी दोनों को निमंत्रण है। ऎसी ही स्थिति बांधों-तालाबों और नदियों के बहाव क्षेत्रों में बसने वाली कॉलोनियों अथवा सूखने पर उनमें शहर भर का सीवरेज डालने की है। जयपुर का तालकटोरा और इंदौर की खान नदी इसके उदाहरण हैं। बहाव क्षेत्रों में निर्माण, सीवरेज पर तो सख्ती से रोक लगनी चाहिए।

राज्य स्तर पर कोई जल नीति सार्वजनिक नहीं है। हर सरकार में चोरों की तरह काम होता है। पता चलता है, तब तक देर हो चुकी होती है। हमारे इंजीनियरों की क्षमता भी फाइलें चलाने तक सिमट चुकी हैं। जोधपुर में पानी की ऎसी व्यवस्था की, कि पानी अभिशाप बन गया। राज्य का मास्टर प्लान बनता ही नहीं। पिछली सरकार के जल मंत्री जागरण या जन चेतना के नाम से ही करोड़ों निपटा गए। उत्तरी राजस्थान में नहरें आई तो उनकी बपौती बन गईं। वे प्यासे जिलों को पानी छोड़ने को ही तैयार नहीं, भले उनकी जमीन में सेम की समस्या हो जाए।

कण-कण में कीटनाशक-रासायनिक खाद के अवशेष हर जीवन में विष घोल रहा हो। अशुद्ध, फ्लोराइड युक्त, विषाक्त जल पीना लोगों की मजबूरी बन गया। इसका उत्तर सरकार के पास नहीं है। साठ सालों में कितना बजट लगा होगा इस मद में! आज भी भू-जल का स्तर गिरता जा रहा है। क्यों? इसका कारण आबादी नहीं है, भ्रष्टाचार है। वर्षा का जल भी यदि प्रदेश रोक पाए तो बहुत कुछ समस्या कम हो सकती है।

जमीन में जल स्तर बढ़ाने के स्थायी कार्य कभी नहीं किए गए। लोगों को शिक्षित नहीं किया जाता। पानी की आवक का मार्ग अवरूद्ध करने वालों को कठोर दण्ड का प्रावधान भी नहीं है। न्यायालयों के फैसले तो जनहित में हैं, विभाग नहीं है। सरकार ने बांधों एवं बड़े तालाबों की मिट्टी निकालना ही छोड़ दिया है। इंजीनियर्स भी पाल को थोड़ा ऊंचा करके जनता को बेवकूफ बनाते रहते हैं। यदि नीचे की मिट्टी नहीं हटेगी, तो नदी की ढलान समाप्त हो जाएगी।

राज्य में जल-जमीन के कानून भी बाबा आदम के जमाने के हैं। गांव के तालाब की जमीन पंचायत की, पानी जलदाय विभाग का, खेती का रकबा राजस्व विभाग का। मौज केवल भ्रष्टाचारियों की। अब तो एनिकट ने पानी का गला घोंट दिया। पानी का बहाव रोकने की स्वीकृति देशद्रोह जैसा अपराध माना जाना चाहिए। इसके लिए किसी भी मद में राशि स्वीकृत नहीं होनी चाहिए। फिर भी यदि कोई यह दुस्साहस करता है, तो उसके विरूद्ध आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

जो भी सरकार लोगों को पीने का जल नहीं उपलब्ध करा सकती, वह कितनी भी कसमें खा ले, जनता की हमदर्द नहीं हो सकती। सरकारें चाहें तो एक वर्ष का सारा बजट पानी पर खर्च दे (आवश्यक सेवाओं को छोड़कर), तो पानी की समस्या पर बहुत कुछ नियंत्रण हो सकता है। एक साल स्वास्थ्य वर्ष हो सकता है। किन्तु इच्छाशक्ति के समाचार तो हर दिन पढ़ रहे हैं। सरकार की हालत  देखकर तो तरस आता है। नंगा क्या धोए, क्या निचोड़े? भ्रष्टों के खिलाफ मुकदमे वापस ले लिए। रामलाल जाट जैसे अपराधियों के विरूद्ध न खनन घोटालों की जांच, न पारस देवी के मुद्दे पर कोई एफ.आई.आर.। सरकार को अल्पमत में आने का इतना डर है सबको खुली छूट है। लूट सके तो लूट।

गुलाब कोठारी

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