Gulabkothari's Blog

जून 17, 2012

आई लव यू, पापा

सुना है सत्रह जून को फादर्स-डे है। फादर यानी कि पिता। शेष 364 दिन पिता की रातें? ईसाई मत वाले पादरी को भी फादर कहते हैं। वहां तक तो ठीक है, किन्तु अपने माता-पिता-गुरू के दिवस तो कैसे मना सकते हैं! पश्चिमी सभ्यता कुछ भिन्न है, जहां माता-पिता बदलते रहते हैं—अपने जीवन साथी। बच्चों को ढूंढ़ना पड़ता है कि मां किसके साथ है और बाप किसके साथ।

 

 

एक बच्चे ने छुट्टी मांगी कि उसकी माता का देहान्त हो गया है। छुट्टी मिल गई। कुछ दिन बाद छुट्टी मांगी कि पिता का देहान्त हो गया है। छुट्टी मिल गई। फिर कुछ दिन बाद माता के और फिर पिता के देहान्त के लिए छुियां ले गया। अगली बार जब फिर मां के देहांत की अर्जी लाया, तो शिक्षक ने पूछ ही लिया कि छुट्टी तो मिल जाएगी, किन्तु तुम्हारे माता-पिता कितने हैं? बच्चे का उत्तर था— ‘बस एक मां-एक बाप।’ ‘किन्तु इससे अधिक तो मर चुके।’ बच्चे ने तपाक से कहा— ‘सर, वो भी सही थे। जब मां मरी, तब पिता ने दूसरी शादी कर ली और जब पिता मरते, मां दूसरी शादी कर लेती।’

 

यह मदर्स डे-फादर्स डे जैसे उत्सव किसी अभावग्रस्त संस्कृति के हो सकते हैं। भारत जैसे सु-संस्कृत देश में हर्गिज नहीं होने चाहिए। हमारे जगत का पिता सूर्य है। सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति के उपादान कारण -रेत या बीज- सूर्य में ही पैदा होते हैं। वही बीज माता-पिता के माध्यम से संग्रहित रहता है। वहां पैदा नहीं होता। बीज की पूर्णता का माध्यम बनते हैं—माता-पिता।

 

किस देश में ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ कहा जाता है? केवल भारत में। इसलिए नहीं कि वे हमको शरीर देते हैं, जिसमें हमारा आत्मा आकर सौ साल रहता है। शरीर को पैदा करने के लिए किसी प्रशिक्षण की जरूरत किसी भी मां को नहीं पड़ती। किसी भी प्राणी की मां क्यों न हो। धरती के पास बीज का विकल्प भी नहीं होता। सच्चाई यह भी है कि गुठली के अनुरूप ही आम लगते हैं। यही तो वंशवाद का आधार है।

 

सृष्टिकर्ता—पितृ प्राणों के कारण पिता को पितृ कहा जाता है। श्राद्ध पक्ष के पितर से इन्हीं को सम्बोधित किया जाता है। वंश परम्परा ही पुत्रैष्णा का कारण है और इसी कारण पुत्र एवं पुत्र कामेष्टि यज्ञ का महत्व है। अज्ञानवश इसी का विपरीत प्रभाव कन्या भ्रूण हत्या बन गया है। कन्या भ्रूण हत्या के पीछे नारी का अपमान, उसके साथ दुराचार एवं सामाजिक असुरक्षा का भाव है। शिक्षित वर्ग में और अधिक बढ़ रहा है।

 

मूल बात यह है कि जब तक आम पक नहीं जाते, माता-पिता (गुठली) पेड़ में कार्यरत रहते हैं। पिता आम देता है, मां मिठास देती है। जब तक आम लग नहीं जाते, मिठास नहीं आ जाती, माता-पिता, गुठली बनकर शरीर में बहते रहते हैं। जीवन भर प्राण रूप में शरीर में प्रवाहित रहते हैं। तब कौन-सा दिन मेरे लिए मदर्स-डे हो? कौन-सा दिन फादर्स-डे हो? उनके कारण ही मैं हूं, मैं दिखाई दे रहा हूं। इसी में ज्ञान रूप ‘आचार्य देवो भव’ भी बह रहे हैं। टीचर्स-डे रोज होता है मेरा। उनको प्रणाम किए बिना तो मेरा कोई दिन शुरू ही नहीं होता।

 

जिनके जीवन में अज्ञान का अंधकार होता है, वहां माता-पिता अभाव सूचक होते हैं। कभी-कभी उनकी याद में मोम पिघलता है। आज हमारे शिक्षक, शिक्षाशास्त्री तथा शिक्षा नीतियों के निर्धारक इसीलिए निरर्थक हो गए कि उनको प्राण रूप बहना नहीं आता। ज्ञान का यह अभाव ही मेरी जिन्दगी के सपनों को, आदर्शो को, एक दिन में समेट जाता है। जुग-जुग जिएं ऎसे माता-पिता, असली जो सिखाते नहीं! नकल करके जीने को मजबूर करते हैं!

 

गुलाब कोठारी

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